मुठ्ठी भर उजास

       दूर गहरे सिंदूरी रंग का सूरज क्षितिज की रेखा को छू रहा है ,ओर इसी सिंदूरी सूरज के सामने से कभी कभी घर लौटते हुए हुए परिंदो का कोई झुंड उड़ता हुआ निकलता है तो एसा लगता है मानो एक बड़े सिंदूरी से मेज़पोश पर किसी ने परिंदों की आकृतियाँ काढ़ दी हैं । पूरा आसमान किसी बच्चे द्वारा कैनवास पर ब्रश और रंग से कुछ बपापे के प्रयास में किये गए प्रयोगों के समान नज़र आ रहा है । दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा शाम ,एक और शाम अपने भरपूर यौवन के रंग बिखेरती हुई गुज़र रही है । मुंडेर पर दोनों कुहनियों की टेक लगाए खड़ा अखिलेश एक टक दूर क्षितिज पर धीरे धीरे अस्त हो रहे सूरज को देख रहा है ।
    आहिस्ता आहिस्ता सूरज क्षितिज की सीमा रेखा के नीचे उतर गया ,सूरज के अस्त होते ही अखिलेश ने एक ठंडी सांस छोड़ी ,और धीरे धीरे चलता हुआ छत के दूसरी तरफ आ गया । छत के इस कोने से विनीता के घर का पूरा ऑंगन साफ दिखाई देता है ,आंगन में ख़ामोशी और उदासी बिछी हुई है ,मानो समय का कोई क्षण आंगन की देहरी पार ना कर पाया हो और वहीं ठहर कर रह गया हो । उतरती सांझ के झुटपुटे में डूबा है पूरा आंगन ।
    अखिलेश ने उस सूने से आंगन से छत को जोड़ने वाली सीढ़ियों को देखा ,यूं लगा अभी बंदरों की तरह कूदती फांदती बिन्नी सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर आ जाएगी ,बालों में ढेर सारा तेल चुपड़े और उन्हें कस कर दो दो लाल रिबनों से बांधे ,ऑंखों में ढेर सा काजल लगाए और बैंगनी फूलों वाली फ्राक पहने हुए । आते ही कहेगी ''चल अक्कू चपेटे खेलें'' और वो प्रतिरोध करेगा '' चल हट्ट..... मैं कोई लड़की हूँ क्या ? '' ,उसके इतना कहते ही बिन्नी की ऑंखों से दो मोटे मोटे आंसू ढलक पड़ेंगे ,और कुछ ही देर बाद छत की पानी की टंकी के पास वो दोनों चपेटे खेलते नज़र आऐंगे । अखिलेश ने टंकी के पास के कोने पर नज़र डाली ,वहां पर भी एक मौन पसरा हुआ है ,मानो किसी अद्भुत शोक गीत की समाप्ति के बाद का सन्नाटा फैला हो । आहिस्ता आहिस्ता सीढ़ियां उतरता हुआ अखिलेश नीचे आ गया ।
    घर में आया तो देखा वहाँ भी एक अजीब तरह की उदासी वातावरण में घुली है ,हवा तक थके पांवों से बोझिल-बोझिल चल रही है ।
    '' कहाँ चला गया था .......?'' अखिलेश को चुपचाप आते हुए देखा तो मां ने पूछा ।
    '' कहीं नहीं छत पर खड़ा था '' अखिलेश ने नज़रें चुराते हुए जवाब दिया ।
    छत का सुनते ही सब्ज़ी काटते मां के हाथ एक पल को कांप गए । अखिलेश ने देखा तो चुपचाप अपने कमरे की तरफ चला गया । कमरे में चारों तरफ़ बिन्नी मौजूद है । टेबल पर रखा बिन्नी के हाथों बना रूई का गदबदा सा जोकर  और दीवार पर टंगी ढलते सूरज की पेंटिंग जिसके एक कोने पर बिन्नी लिखा है , सब के सब अपनी सृजनकर्ता के इंतज़ार में स्तब्ध से लग रहे हैं । अखिलेश कुछ देर तक तो सब को देखता रहा ,फिर अचानक ही उसके अंदर का बाँध टूट गया ,वह पलंग पर गिर गया और फूट फूट कर रोने लगा ।
    ''अक्कू .... नहीं बेटा इस तरह कमज़ोर होने से कुछ नहीं होगा ''अखिलेश के सर पर हाथ फेरते हुए मां ने कहा जो अखिलेश की तेज़ सिसकियों की आवाज़ सुनकर सब्ज़ी काटना छोड़ कर दौड़ती हुई आ गईं थीं।
    '' नहीं बेटा अब तो उसके बिना जीने की आदत डालनी पड़गी '' कहते हुए मां ने उसका सर उठा कर अपनी गोद में रख लिया ,मां की गोद में सर रखते ही अखिलेश फफक फफक कर रो पड़ा । मां कभी उसकी पीठ सहलाती ,कभी सर , और बीच में चुपके से आंचल से अपने आंसू भी पोंछ लेती ।
    '' मां ...बिन्नी चली गई ...'' रोते रोते टूटती सी आवाज़ में अखिलेश ने कहा ।
    अखिलेश और बिन्नी की कहानी तब से ही शुरु होती है जबसे उनका जीवन शुरू होता है। दोनों के घर बिल्कुल लगे होने से ,और छतें एक होने से दोनों परिवारों में शुरू से ही अच्छी मित्रता रही । लगभग हम उम्र होने के कारण दोनों का जीवन क्रम भी एक सा ही चला ,दोनों ने एक साथ ही स्कूल जाना शुरु किया ,तो यह सिलसिला कालेज तक चलता रहा , टूटा तो केवल बिन्नी के चले जाने से ।
    इस कहानी में अगर प्रेम के तत्वों की खोज की जाए ,मसलन पीली पीली चाँदनी से भरी रातें ,गुलमोहर के फूलों से लदे हुए पेड़ों के बीच से गुज़रती पगडंडियाँ ,और ऑंखों ही ऑंखों में होने वाली ख़ामोश सी बातें , तो ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। बिन्नी के चले जाने तक भी दोनों को यह पता नहीं चल पाया था कि उनका आपस में रिश्ता क्या है ?
    गुलमोहर का फूल उन दोनों के लिए प्रेम का प्रतीक ना होकर बॉटनी का प्रेक्टिकल होता था ,और वही गुलमोहर का फूल ,चर्चा से बहस और फिर बहस से अच्छे खासे युध्द का कारण बन जाता था। जब छोटे थे तब बाकायदा गुत्थम गुत्था होकर लड़ते थे ,चपेटे की बेईमानी या दूसरी किसी बात पर शुरु हुई लड़ाई ,हाथा पाई में बदल जाती ,और पता चलता इसके हाथ में उसकी चोटियाँ हैं ,तो उसके हाथ में इसके बाल। वही रिश्ता बाद में भी बना रहा ,अंतर केवल इतना हुआ था कि हाथापाई की जगह जुबानी युध्द होने लगा था।
    घर में आकर अखिलेश गुस्से में किताबें टेबिल पर फैंकता ,और माँ पूछतीं '' आज किस बात पर लड़ाई हुई '' जवाब पड़ोस के ऑंगन से बिन्नी का आता '' चाची साइंस पढ़ना हर किसी के बस की बात नही , यहां रटने से काम नही चलता , सब पता होना चाहीए ।''
    पिछले साल वैलेन्टाइन डे पर रुई का गदबदा जोकर बनाकर लाई थी बिन्नी ,सुर्ख लाल रंग का जोकर जिसके सर पर पीली फूलदार टोपी लगी थी ,और सीने पर एक छोटा सा दिल जिस पर ''अक्कू '' लिखा था। सुबह सुबह वह सो ही रहा था ,जब शोर शराबा करते हुए बिन्नी जोकर को लेकर उसके कमरे मे घुसी । उसे झंझोड़कर उठा दिया ,और उसके उठते ही हाथों में जोकर देकर बोली '' हैप्पी वेलेन्टाइन डे '' कुछ  आश्चर्य से कहा था अखिलेश ने ''मुझे .....? ''
    ''नहीं तो क्या दीवार से कह रही हूँ , इत्ती मेहनत से तुम्हारा पुतला बनाया है ,उसको तो देखो , '' गुस्से में बोली थी बिन्नी ।
    '' समझती भी हो यह वेलेन्टाइन डे क्या होता है '' अखिलेश ने उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा था ।
    '' में समझती हूँ  ,तुम नहीं समझते '' फिर अखिलेश के सिर पर हाथ रखते हुए बोली '' तुम्हारा ये ऊपर का माला खाली जो पड़ा है क्या समझोगे ''।
    '' अच्छा तुम क्या समझती हो '' मुस्कुरा कर तकिये को गोद में रखते हुए कहा था अखिलेश ने ।
    ''जो रिश्ता नाम की सीमाओं से ऊपर उठ गया हो ,जिसके लिए कोई नाम नहीं सूझ रहा हो ,उस रिश्ते को एक नाम देने का दिन है । या कोई हो ,जो आपका दोस्त हो ,जो आपके साथ हो ,जो ना आपका रिश्तेदार हो ,ना प्रेमी हो ,ना और कुछ हो । एक रिश्ता जो आपके जीवन में उस तरह से फैला हो ,जैसे वादियों में कोहरे की चादर फैली होती है ,जिसके होने का अहसास तो किया जा सके पर जिसे छुआ नहीं जा सके '' कहते कहते बिन्नी की दोनो ऑंखो में दो सितारे चमक गए थे ,अखिलेश चुपचाप उसकी तरफ देखता रहा ।
    '' तुमने गुनाहों का देवता पढ़ा है ..?'' कुछ उत्सुकता से पूछा था बिन्नी ने ।
    अखिलेश के इन्कार में सर हिलाने पर बोली '' फिर तुम क्या समझोगे ,कोई होता है ,जिससे आप सारी बातें  कर सकते हैं ,और.......।'' कह कर रुक गई थी बिन्नी ।
    ''और क्या...?'' अखिलेश ने उत्सुकता से पूछा था। 
    '' और जिससे यह भी कहा जा सके '' कह कर बिन्नी फिर चुप हो गई थी ।
    ''क्या ...?'' फिर से पूछा था अखिलेश ने ।
    ''यह कि गुलमोहर के फूल की पाँचवी पंखुड़ी के बारे में तुम्हारा बॉटनीकल नालेज बिलकुल गलत है बेवकूफ कहीं के '' कह कर हंसती हुई उठ कर चली गई थी बिन्नी , हाथों में जोकर को थामे देर तक बैठा रहा था वो।
    सेमेस्टर एग्ज़ाम के बीच में ही बिन्नी की तबीयत खराब हो गई थी । यहां के डाक्टरों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि बीमारी क्या है । जब बिन्नी के घर वालों ने उसे मुंबई इलाज के लिए ले जाने की तैयारी की ,तो अखिलेश ने भी अपनी तैयारी कर ली थी ,लेकिन बिन्नी ने ही उसे रोक दिया था ,यह कहकर कि तुम सेमेस्टर देकर आ जाना ,अपना साल मत खराब करो । बिन्नी को लेकर जब ट्रेन धीरे धीरे प्लेटफार्म से आगे बढ़ी थी ,तब उसने बिन्नी की ऑंखों में वही मोटे मोटे आंसू देखे थे ,जैसे बचपन में होते थे । वो दो बूंद आंसू उसे अंदर तक चीर गए थे।
     अखिलेश आख़िरी पेपर देकर घर लौटा तो बिन्नी के घर लगी भीड़ ने उसके पैरों को बाँध दिया था । बिन्नी वापस आ चुकी थी ,लेकिन जा चुकी थी । एक रोज़ पहले ही  मुंबई में बिन्नी की सांसें थम गई थीं ,लेकिन अखिलेश का आखिरी पेपर होने के कारण उसको ये खबर घर वालों ने नहीं दी थी । कहते हैं किसी के चले जाने के बाद पता चलता है ,कि वो आपके लिए क्या था ,बिन्नी के जाने के बाद अखिलेश को उस रिश्ते का अहसास हुआ । बिन्नी के जाने के बाद पत्थर हो गया अखिलेश ,एक बार भी फूटफूट कर नहीं रोया ,मानो अंदर से ऑंसुओं का सोता ही सूख गया हो । बिन्नी को गए भी दो महीने हो गए ,उसके जाने के बाद पहला वेलेन्टाइन डे है ,पिछले वर्ष की स्मृतियों के कारण अखिलेश सुबह से ही उदास था और आठ नौ माह का रुका हुआ दर्द अब ऑंसुओं के रूप में फूट कर बह रहा है ।
    मां ने देखा अखिलेश का रोना कम हुआ है तो बोलीं '' चल मुंह धो ले , मैं चाय बना लाती हूँ '' अखिलेश आंसू पोंछता हुआ उठ गया ,मां भी चली गयीं । बोझिल कदमों से चलता हुआ अखिलेश टेबिल के पास आया ,देखा जोकर हाथों को खोले मुस्कुरा रहा है उसने जोकर को हाथों में उठाया और उसे लेकर ऑंगन में आ गया ,बाहर फरवरी की गुलाबी रात बिखरी हुई है । जोकर को लेकर वो छत पर चला गया ,आसमान टिमटिमाते हुए छोटे बड़े सितारों से भरा है ,और उनके बीच खिला हुआ है चाँद ,अखिलेश ने जोकर को सीने में भींच लिया और आसमान की और मुंह करके धीरे से बोला '' हैप्पी वेलेन्टाइन डे बिन्नी '' उसने देखा उसके कहते ही दूर कोने में एक छोटा सा सितारा अचानक ज़ोर से झिलमिला उठा है ,ठीक उसी तरह जिस तरह से  बिन्नी की ऑंखों में दो सितारे झिलमिला गए थे पिछले बरस ,आज ही के दिन ।
                             -समाप्त-

7 comments:

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
कलम के पुजारी अगर सो गये तो
ये धन के पुजारी
वतन बेंच देगें।


होली की पूर्व संध्या पर मिलना खूब रहेगा .... कहें तो अपने संग ढोल-झाल भी ले आयेंगे ..... फागुन का रंग खूब जमेगा
हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में प्रोफेशन से मिशन की ओर बढ़ता "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ ,

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

shama said...

Aapne to rula diya...

Amitraghat said...

"पंकज जी बहुत भावनात्मक प्रेम कहानी लिखी आपने
.."
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

vinay said...

बहुत ही मार्मिक कहानी ।

Ankit Joshi said...

दिल को छु देने वाली कहानी है ये..................
आपकी जादुई कलम ने लफ़्ज़ों को ऐसे पिरोया है की शुरू से आखिरी तक बिना ध्यान हटाये पढ़ गया.
कहानी में आपने कुछ ऐसे छुए और अनछुए पहलू डालें हैं जो है तो बहुत सामान्य मगर कही और किसी लेखनी में नहीं मिलते यही पे यह कहानी दिल छु लेती है.

गौतम राजरिशी said...

रूला दिया..बिन्नी ने या अक्कु ने, ये नहीं पता? बस रो रहा हूँ।