मूंडवे वालों का जलवा (कहानी : पंकज सुबीर)

मूंडवे वालों का जलवा
(कहानी : पंकज सुबीर)

सामयिक सरस्वती के अक्टूबर-दिसम्बर 2018 अंक में प्रकाशित
छज्जू जी मूंडवे वाले.... या अच्छी तरह से कहा जाए तो छज्जूमल मूंडवे वाले। मूंडवा से आकर यहाँ बसे थे इसलिए उनके नाम के साथ यह मूंडवे वाले हमेशा के लिए ही जुड़ गया है। हमारे यहाँ हर वह स्थान जिसके अंत में बड़े आ की मात्रा लगी हो, उसे देशज में ए की मात्रा में बदल दिया जाता है। जैसे भेलसा को भेलसे, आगरा को आगरे, आदि आदि आदि, उसी प्रकार मूंडवा का भी हो गया मूंडवे। तो छज्जू जी के परदादा या लक्कड़ दादा जब मूंडवा से आकर यहाँ बसे तो अपने साथ बस व्यापार की समझ ही लेकर आए थे। बसे थे यहाँ पर; क्योंकि उन्हें अंग्रेज़ों ने लाकर बसाया था यहाँ पर। अंग्रेज़ों ने या यूँ कहें कि ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यहाँ पर इस छावनी की स्थापना पूरे मध्य भारत पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से की थी। उद्देश्य बड़ा था, इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि छावनी बड़ी थी, रेजिमेंट बड़ी थी। जब छावनी बसाई तो सैनिकों के, अधिकारियों के लिए रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सामान की भी आवश्यकता होने लगी। जहाँ छावनी बसाई थी वहाँ बस बड़ा मैदान था, जिस पर छावनी छा दी गई थी। आस-पास दूर-दूर (उस समय पाँच-दस किलोमीटर को भी दूर-दूर माना जाता था।) कोई क़स्बा या शहर नहीं था, जहाँ से सामान की व्यवस्था हो सके। अंग्रेज़ों के बारे में मशहूर था कि वे हर समस्या का समाधान अपने साथ लेकर चलते थे। तो हुआ यह कि अंग्रेज़ों ने मारवाड़ से व्यापारियों को ला-लाकर यहाँ पर बसाया। जितने हिस्से में छावनी थी, उसके अलावा भी बहुत सी ज़मीन ख़ाली पड़ी थी, आख़िर को पूरा का पूरा मैदान था वहाँ पर। अंग्रेज़ों ने मारवाड़ी व्यापारियों से कहा कि जितना हिस्सा घेर सकते हो उतना घेर लो और अपना मकान दुकान बना कर यहाँ व्यापार शुरू करो। मारवाड़ियों ने बात की बात में अच्छा-ख़ासा क़स्बा बना डाला वहाँ पर। इस क़स्बे को छावनी ही नाम मिला। इसके दोनो तरफ़ भिंड और मुरैना से कुछ परिवारों को लाकर बसाया गया, इन परिवारों के युवाओं को सेना में भर्ती किया गया। इस प्रकार देखते ही देखते मिली-जुली सभ्यता का एक क़स्बा वहाँ पर बस गया। इस क़स्बे का नाम बरसों-बरस तक छावनी ही रहा, अब छावनी इस शहर के मध्य के इलाक़े को कहते हैं, शहर का नाम कुछ और हो चुका है।
छज्जू मल जी के लक्कड़ दादा भी अंग्रेज़ों द्वारा लाए गए थे। लाए गए थे मारवाड़ के मूंडवा क़स्बे से। मूंडवा से आए थे, सो हो गए मूंडवे वाले। मूंडवे वाले में अमिधा और व्यंजना दोनो हैं। असल में छावनी के बीचों-बीच बसाए गए ये मारवाड़ी परिवार, व्यापार के साथ-साथ सैनिकों के परिवारों को वक़्त-ज़रूरत सूद पर पैसा भी देते थे। उसमें भी छज्जू जी मूंडवे वाले के लक्कड़ दादा तो कोई व्यापार करते ही नहीं थे, वे विशुद्ध रूप से ब्याज़ का ही काम करते थे। अच्छी भाषा में महाजनी और ज़रा बुरी भाषा में सूदख़ोरी। उनकी पेढ़ी ब्याज़ की सबसे चलती हुई पेढ़ी थी। पेढ़ी तो आज भी है, मगर अब उसका स्वरूप बदल गया है, अब दुकानें हो गई हैं उनकी। कपड़े की दुकान, किराने की दुकान, खाद-बीज की दुकान; इन दुकानों से शहर के कमज़ोर तबक़े के लोग और आस-पास के गाँव वाले उधार में सामान लेते हैं, और फिर उस उधारी पर सूद-दर-सूद चुकाते रहते हैं। इन दुकानों पर नक़द में ख़रीदने आए ग्राहक को हेय दृष्टि से देखा जाता है और उसे टरकाने का प्रयास किया जाता है, जबकि उधारी वाले को चाय-पानी पहले पिलाया जाता है, सामान की बाद में पूछी जाती है। सूदख़ोरी की पेढ़ी है, सूद ही नहीं मिलेगा तो काहे की पेढ़ी। अब तो ख़ैर उस प्रकार की निरक्षरता नहीं रही, मगर पहले तो बस यह था कि जो हिसाब पेढ़ी के मुनीम ने बना कर दे दिया वही अंतिम होता था। अँगूठा लगाओ और घर जाओ। चुकाते रहो, चुकाते रहो।
'मूंडवे वाले' यह नाम छज्जू जी के लक्कड़ दादा के साथ जो लगा, तो आज तक लगा चला आ रहा है। मूंडावा (क़स्बे) से थे इसलिए मूंडवे वाले; और दूसरे अर्थ में सूद के उस्तरे से क़र्ज़दार का सिर बेरहमी से मूंडते थे, इसलिए भी मूंडवे वाले। लक्कड़ दादा से लेकर आज तक इस मूंडवे वाले परिवार ने पैसा तो बहुत कमाया, इतना की उसे अथाह भी कह सकते हैं; मगर मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा इस परिवार को कभी नहीं मिल पाया। सब कुछ होने के बाद भी वे रहे मूंडवे वाले ही। अपने पिता की इकलौती संतान छज्जू जी मूंडवे वालों के यहाँ तीन बेटे हुए, बेटी एक भी नहीं हुई। मतलब यह कि पिता की संपत्ति का कोई बँटवारा नहीं हुआ, क्योंकि कोई हिस्सेदार ही नहीं था। छज्जू जी ने अपने सक्रिय समय में ही व्यापार को तीन गुना कर लिया, और ऐसा करके ही बेटों के हाथ में अलग-अलग बागडोर सौंप दी। छज्जू जी के तीन बेटों में बड़े अशोक, मंझले अनिल के मन में तो परंपरा अनुसार ही मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा की कोई चाह नहीं रही, वे भी बस पैसों को आने वाली पीढ़ी के लिए और बढ़ा कर छोड़ने के कार्य में ही जुट गए। तीनो बेटे अलग-अलग रहते थे और तीनो ने अलग-अगल दुकानों पर काबिज़ होकर अलग-अलग व्यापार शुरू कर दिया। छज्जू जी की पत्नी बहुत पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं और छज्जू जी छोटे बेटे सुनील के साथ रहते थे। रहते थे और देखते थे कि जो साम्राज्य अभी कल तक उनका था, उस पर अब बेटों का, बल्कि अब तो पोतों का कब्ज़ा हो चुका था। छज्जू जी को बस यह संतुष्टि थी कि उन्होंने अपने पिता से जितना पाया था, उतना ही अलग-अलग तीनों बेटों को दिया।
सबसे छोटे बेटे सुनील के मन में यह चाह जाने कब और कैसे घर बना गई कि पैसा अपनी जगह है लेकिन मान-प्रतिष्ठा भी होनी चाहिए। अभी तक तो यह होता था कि पीढ़ी दर पीढ़ी मूंडवे वालों के परिवार के उत्तराधिकारी बस पैसे कमाने के लिए ही पैदा होते थे। बाक़ी कुछ और उनको दीन-दुनिया से मतलब नहीं होता था। मूंडवे वाले, यह नाम यदि आपके साथ जुड़ गया है, तो बस आपको सुबह आकर दुकान पर बैठना है और दिन भर वहीं रहना है। दो के चार, चार के आठ करना है। उसके अलावा और कुछ नहीं करना है। दो के चार, चार के आठ करते-करते जब यूँ ही आप मर जाओ, तो दुकान को अपने बाद की पीढ़ी को सौंप जाना है, आठ के सोलह और सोलह के बत्तीस करने के लिए। मर जाओ, खप जाओ। मगर सुनील को यह ढर्रा पसंद नहीं आया। वह इससे हट कर कुछ करना चाहता था; लेकिन चार-पाँच पीढ़ियों का जो किया हुआ सर पर था, उसे धोने में सुनील मूंडवे वाले को बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी। छज्जू जी सुनील के साथ ही रहते थे, इसलिए देख-देख कर कुढ़ते रहते थे कि बेटा किस प्रकार फालतू के कामों में पैसा ख़र्च कर रहा है।
सुनील न केवल अपने वैश्य समाज के संचालक मंडल का सदस्य था, बल्कि लायंस क्लब का भी सदस्य था और क़स्बे के ऐसे ही एक-दो और संस्थानों का भी सदस्य था, जहाँ सदस्य बनने हेतु मोटा पैसे वाला होना आवश्यक था। मगर सुनील की दौड़ अभी भी संगठनों के सदस्य पद तक ही हो पा रही थी, अध्यक्ष बनने का दाँव हाथ में नहीं आ रहा था। वह चाहता था कि वह भी किसी संस्था का अध्यक्ष बने, ज़िला कलेक्टर संस्थापन समारोह में आकर उसे अध्यक्ष पद की शपथ दिलवाए, और उस फ़ोटो में वह सुनहरी फ्रेम में मढ़ कर दुकान और घर की दीवार पर टाँगे। लेकिन यह हो नहीं पा रहा था। नहीं हो पा रहा था, तो उसके पीछे एक कारण सुनील को समझ आता था कि वह अपने अंदर का पूरा टेलेंट दुनिया को बता नहीं पा रहा है, लोगों को पता ही नहीं है कि वह इन पदों के लिए सबसे योग्य व्यक्ति है। सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होने के शौक़ के चलते, अपनी बढ़ी हुई तोंद के बाद भी, सुनील नई उम्र के लड़कों वाले कपड़े पहन कर, बाल को स्याह काले रंग की खिजाब में रँग कर चकाचक बना रहता था। पीठ पीछे उसे लोग उसे ‘रँगीला रतन’ भी कह कर बुलाते थे। पत्नी शीला भी क़स्बे के अधिकांश महिला संगठनों की या तो सदस्य बनी हुई थी, या संरक्षक जैसा कोई पद पास था। शीला उस छोटे क़स्बे की पहली महिला थी, जो अपनी स्कूटी दनदनाते हुए घूमती थी। उस समय जब लड़कियाँ ही बड़ी मुश्किल से स्कूटी पर दिखाई देती थीं, साड़ी पहन कर, सिर पर पल्लू लिए शीला सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में घूमती रहती थी। सुनील के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मूंडवे वाले के साथ जुड़ा अपयश मिटाने के लिए शीला भी प्रयासरत थी। हालाँकि ऐसा हो नहीं पा रहा था।
कहानी उस समय की है जब छज्जू जी के बेटों के बच्चों की भी शादी हो चुकी थी। उनके भी बच्चे, मतलब छज्जू जी मूंडवे वाले के घर पड़पोते भी आ चुके थे। पोते ख़ानदानी कमाई को प्रॉपर्टी, गल्ले की आढ़त, जैसे कामों में लगा कर ख़ानदान का नाम रौशन कर रहे थे। सुनील का एक ही बेटा था, उसकी शादी भी हो चुकी थी। यह कहानी ठीक उस समय शुरू होती है, जब सुनील के इकलौते बेटे मनोज के घर बेटा पैदा हुआ। मनोज की शादी के लगभग छह-सात साल बाद उसके यहाँ बच्चा हुआ था, इसलिए घर में आनंद का माहौल बन गया था। जुलाई के पहले सप्ताह में बालक आया था। मारवाड़ी परंपरा के अनुसार सवा महीने बाद जलवा पूजन होना था। मारवाड़ियों में जलवा पूजन बच्चे के जन्म के महीने-सवा महीने बाद होता है, इसमें नव प्रसूता सोलह सिंगार कर सर पर पानी की मटकी रख, उसमें नीम की पत्तियाँ डाल कर अन्य महिलाओं के साथ, बैंड-बाजे, मंगल गीत के साथ किसी भी जल स्रोत, कुँआ, बावड़ी, तालाब पर जाती है, वहाँ जाकर जल की पूजा करने के बाद अपनी मटकी को पानी से धोकर जल स्रोत के पानी से उसे भर कर लाती है। मटकी को लाकर रसोईघर में रखती है, इसके साथ ही उसका रसोईघर में प्रवेश प्रारंभ हो जाता है, जो प्रसव के कारण बंद हो गया था। बच्चे के जन्म का आनंद होने के कारण इस प्रसंग को ख़ूब धूमधाम से आयोजित किया जाता है। इसके बहाने बच्चे के जन्म का भी उत्सव मना लिया जाता है।
सुनील के यहाँ तो सात साल बाद; और वह भी बेटा पैदा हुआ था, ज़ाहिर सी बात है अत्यंत भव्य आयोजन की रूपरेखा बना ली गई थी। पन्द्रह अगस्त की छुट्टी का उपयोग करने के लिए उसी दिन आयोजन रखा गया था। व्यापारी थे, इसलिए पन्द्रह अगस्त से तो कुछ लेना-देना था नहीं उनको। सारे रिश्तेदार भी व्यापारी वर्ग से ही थे, इसलिए सबसे मुफ़ीद दिन पन्द्रह अगस्त ही था सबके लिए। पूरे दिन भर का आयोजन था। क़स्बे से लगा हुआ एक पूर्ण वातानुकूलित शादी घर तथा उसके सामने का बड़ा-सा मैदान चौदह से सोलह अगस्त तक पूरा का पूरा बुक कर लिया गया था। मेहमान एक दिन पहले से आने थे और जाना तो सबको अगले दिन ही था। सारे कमरे, सारे सुइट्स, लॉन, सब कुछ मूंडवे वालों के नाम पर बुक था। सुबह पूजा- पाठ के बाद से कार्यक्रम प्रारंभ हो जाने थे। जलवा पूजन का कार्यक्रम सुबह से ही होना था। उसके लिए पूरी व्यवस्था की गई थी। शादी घर से क़रीब आधा किलोमीटर की दूरी पर ही नदी थी, जहाँ जलवा पूजन के लिए जाना था। जितनी भी महिलाओं को नव प्रसूता के साथ जाना था, सबके लिए एक ही डिज़ाइन और एक ही केसरिया रंग की राजस्थानी लहरिया साड़ियों की व्यवस्था की गई थी। सुनील ने थोक में क़रीब दो सौ साड़ियों की व्यवस्था कर ली थी। समय रहते उन साड़ियों को परिवार और जान पहचान के घरों में भिजवा दिया गया था, जिससे महिलाएँ ब्लाउज़ वग़ैरह सिलवा कर तैयार करवा लें। जलवा पूजन के प्रोसेशन के लिए नरसिंहगढ़ की सुप्रसिद्ध बैंड पार्टी को बुलवाया गया था, जो इतना महँगी है कि उसे अपने यहाँ बुलवाने की हिम्मत लोग शादियों तक में नहीं कर पाते। एक स्थानीय महावत से दो हाथियों की भी व्यवस्था की गई थी, जिनको सज-धज कर आगे-आगे चलना था प्रोसेशन के।
भोजन के लिए राजस्थान से विशेष रूप से हलवाई बुलवाए जा रहे थे। पूरा पारंपरिक मारवाड़ी खाना बनाने के लिए। सुबह के नाश्ते में ही लगभग भोजन जितनी व्यवस्था की जानी थी। नाश्ते के बाद जलवा पूजन का कार्यक्रम होना था, उसके बाद पूजा-पाठ। पूजा पाठ के लिए वेद पाठी ब्राह्मण भी बाहर से बुलवाए जा रहे थे। पूजा के बाद दाल-बाटी, चूरमा का भोजन होना था। भोजन के बाद विश्राम और शाम को एक बार फिर से अच्छे-ख़ासे नाश्ते की व्यवस्था थी, वह क्या कहते हैं उसे... हाई टी।  हाई टी के बाद कई सारी ब्यूटीशियन्स बुलाई गई थीं, आए हुए मेहमानों की महिलाओं को तैयार करने हेतु। उसके बाद रात का भव्य आयोजन होना था। अगस्त का महीना चूँकि बरसात का मौसम था, इसलिए कार्यक्रम स्थल को पूरा वाटरप्रूफ टैंट से ढँका जाना था। यह विशाल टैंट विशेष रूप से गुजरात से मँगवाया जा रहा था। बड़ी राजनैतिक सभाओं में उपयोग होने वाला टैंट था यह, पहली बार किसी निजी कार्यक्रम में लगने वाला था। जहाँ गाड़ियाँ पार्क होनी थीं, वह हिस्सा भी वाटरप्रूफ टैंट से ढँका जाना था। कोई भी मेहमान कार से उतर कर भीगते हुए आए, तो फिर मतलब ही क्या रहा व्यवस्था का। रात के भोजन में क्या-क्या शामिल था, यह बताना ही मुश्किल था। यदि केवल मिठाई की ही बात की जाए तो आटे का मालपुवा, केसर पेड़ा, गौंद के लड्डू, चूरमा लड्डू, छेना मालपुआ, बूँदी-पायस, घेवर, लापसी, जोधपुरी लड्डू, बादाम का हलवा, मूँग हलवा, मावा कचौड़ी, बेसन चक्की, कुल मिलाकर राजस्थानी-मारवाड़ी मिठाई की पूरी दुकान सजनी थी। मारवाड़ियों की सबसे ख़ास केर-साँगरी बनाने के लिए विशेष एक एक्सपर्ट बुलवाया जा रहा था। मेन कोर्स भी किसी होटल के मेन्यू की तरह ही था, क्या नहीं था उसमें। उसके अलावा संगीत और नृत्य की भी व्यवस्था थी। टीवी धारावाहिकों में नज़र आने वाली दो अभिनेत्रियों को बुलाया जा रहा था, इस संगीत कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देने के लिए। कुछ नर्तकियाँ भी बाहर से बुलवाई गई थीं, मगर बीच-बीच में मूंडवे वाले परिवार के सदस्यों को भी मंच पर आकर नृत्य करना था।
सुनील और शीला को इस अवसर पर अपने उद्गार भी व्यक्त करने थे। दोनो ने अपने-अपने भाषणों की तैयारी पन्द्रह दिन पहले से करनी शुरू कर दी थी। एक स्थानीय कवि की मदद से यह भाषण लिखवाए गए थे। कवि ने ही उनको प्रशिक्षण भी दिया था कि आवाज़ में किस प्रकार उतार-चढ़ाव लाना है, कहाँ भावुक होना है, कहाँ आँखें पोंछने का अभिनय करना है, कहाँ कितना मुस्कुराना है, कहाँ हँसना है, कहाँ चुटकी लेना है। यह भाषण असल में दोनो को सामजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से विशेष रूप से रखवाया गया था। छोटे क़स्बों में सबसे बड़ी समस्या होती है अच्छा भाषण देने वाले की। अगर किसी के बारे में पता चल जाए कि वह तो अच्छा बोल लेता है, तो सम्मान समारोह से लेकर मय्यत तक और स्कूल के वार्षिक उत्सव से लेकर पन्द्रह अगस्त तक, वह डिमांड में आ जाता है। चूँकि रात के कार्यक्रम में शहर के लगभग हर वर्ग के लोग आमंत्रित थे, इसलिए अच्छा भाषण देकर यह दोनो भविष्य में और भाषण देते रहने और उसके बहाने संस्थाओं के, कार्यक्रमों के अध्यक्ष अथवा मुख्य अतिथि की कुर्सी पर आँख लगाए हुए थे। जलवा पूजन का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यही था। यह भी कहा जा सकता है कि जलवा पूजन का समारोह शायद इस भाषण के बहाने स्थापित होने के लिए ही हो रहा था। छोटे क़स्बों में कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनना या कार्यक्रम की अध्यक्षता करना, मान-सम्मान का विषय होता है।
सुनील को पूरे दिन में चार बार कपड़े बदलने थे। मगर सबसे ख़ास रात के मुख्य समारोह के लिए कपड़े जोधपुर से मँगवाए गए थे। सफ़ेद पर कशीदाकारी की सेल्फ़ एम्बोज़्ड धारियों वाला घुटनों से नीचे तक का बंद गले वाला जोधपुरी कुरता, पैरों से कस कर चिपका चुन्नटों वाला चूड़ीदार सफ़ेद पायजामा, गले में काला-सफ़ेद कशीदाकारी वाला स्टोल, पैरों में काली मोजड़ियाँ और सिर पर केसरिया-लाल बड़ी-बड़ी बुंदकी वाला जोधपुरी पाग या पगड़ी। पगड़ी सामान्य से एक मीटर लम्बी बुलवाई गई थी। जोधपुर के छुरंगेदार साफे की तरह उसे बाँधा जाना था। छुरंगा मतलब साफे से पीठ पर अतिरिक्त लटकने वाला कपड़ा। साफे का छुरंगा सुनील की पीठ से होता हुआ एड़ियों तक लटकना था इसीलिए पगड़ी का कपड़ा सामान्य से लंबा बुलवाया गया था। और सामने कलफ़ लगा हुआ लाल तुर्रा जो केसरिया साफे में से मोर के फैले हुए पंखों की तरह दिखाई देना था। शीला को भी दिन में चार बार कपड़े बदलने थे, और सारे कपड़े ज़ेवर जोधपुर से ही मँगवाए गए थे। रात के लिए लहरिया का सुनहरी-लाल-पीला घाघरा, ज़री के भारी काम वाली ओढ़नी। कुंदन के काम वाले ज़ेवर, बोर, नथनी, बाजूबंद, कंठी, कमरबंद,हथफूल। कलाइयों से कोहनी तक भरे लाख के चूड़ले, जिनमें बीच-बीच में कुंदन के कड़े।
कुल मिलाकर बात यह कि जश्न का पूरा इंतज़ाम पन्द्रह-बीस दिन पहले से ही प्रारंभ हो गया था। मूंडवे वाले परिवार में ‘न भूतो न भविष्यति’ टाइप का महाउत्सव मनाए जाने की तैयारियाँ ज़ोरों-शोरों से चल रही थीं। निमंत्रण पत्र, कपड़े, ज़ेवर, कोरियोग्राफी, भाषण, भोजन सूचि, इतने काम थे कि सुबह कब होती थी और शाम कब हो जाती थी, पता ही नहीं चल रहा था। इस बीच बस एक समस्या आ गई थी कि छज्जू जी मूंडवे वाले का स्वास्थ्य नरम-गरम होने लगा था। कुछ तो अस्सी पार की उमर के कारण बीमारियाँ और कुछ घर में होने वाले कार्यक्रम पर पैसा पानी की तरह बहाए जाने का संताप, छज्जू जी पर दो-तरफ़ा मार पड़ रही थी। कल्पना कीजिए कि वह पैसा, जो आपने कौड़ी-कौड़ी, दमड़ी-दमड़ी कर के जमा किया था, अपने ऊपर ख़र्च करने तक से परहेज़ किया, उस पैसे को आपके बाद की पीढ़ी आपकी आँखों के सामने ही पानी की तरह बहा कर और आग की तरह जला कर उड़ाए। सत्ता हाथ से जाने का सबसे बड़ा दुख यही होता है कि आप एक तरफ़ पड़े-पड़े उस सारी व्यवस्था को बदलता हुआ देखते हैं, जो आपने अपनी सर्वश्रेष्ठ समझ से बनाई थी। वह, जो कल आपके लिए ग़लत था, आपके बाद वाली पीढ़ी नियम बदल कर उस ग़लत को सही कर देती है। व्यवस्था बनाने और बदलने का राजदंड जब हाथ से चला जाता है, तो हथेलियों में उम्र भर उसको फिर से पकड़ने की सलबलाहट होती रहती है। यह सलबलाहट ही धीरे-धीरे आपको अशक्त और बीमार कर देती है।
पन्द्रह अगस्त के सप्ताह भर पहले छज्जू जी थोड़े बीमार से बहुत बीमार वाली अवस्था में प्रवेश कर गए। इधर कार्यक्रम के सारे कार्यों को अंतिम रूप देने का भार परिवार के सिर पर आया और उधर छज्जू जी के लगभग बिस्तर पकड़ लेने के कारण वह अतिरिक्त कार्य, या कार्य से अधिक उनके बीमार हो जाने का तनाव परिवार के सिर पर आ गया। तनाव भी इस बात का नहीं था कि परिवार के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य का स्वास्थ्य ख़राब है, बहुत ज़्यादा ख़राब है। तनाव इस बात को लेकर था कि कहीं छज्जू जी चौदह पन्द्रह अगस्त  के आस-पास...। इधर तारीख़ पास आ रही थी और उधर छज्जू जी मूंडवे वाले की स्थिति और बिगड़ती जा रही थी। सुनील और परिवार एक और विचित्र स्थिति से जूझ रहे थे। परेशानी यह थी कि यदि छज्जू जी को अस्पताल में भर्ती भी किया जाता है, तो भी यह चर्चा तो होगी ही कि देखो उधर तो पिता अस्पताल में भर्ती है और इधर इनको उत्सव मनाने की पड़ी है। अस्पताल में भर्ती किया जाना, मतलब गंभीर स्थिति। इसलिए अस्पताल में भर्ती किए जाने को परिवार के लोग टाल रहे थे। लगभग सारे चिकित्सकीय उपकरण धीरे-धीरे, एक-एक कर के छज्जू जी के कमरे में आते जा रहे थे। क़स्बे के उन्हीं डॉक्टर की सेवाएँ ली जा रही थीं, जिनके घर के क्लिनिक में सभी जीवन रक्षक उपकरणों के पोर्टेबल, मिनी संस्करण उपलब्ध थे। वे कहने को सरकारी डॉक्टर थे, मगर अपने घर में ही छोटा-मोटा नर्सिंग होम खोल रखा था। दिन भर मरीज़ों को भर्ती रखते थे और रात में छुट्टी कर देते थे। उन्हीं की सेवाएँ लेकर बाहर वालों को अभी अंदाज़ा भी नहीं लगाने दिया जा रहा था कि उत्सव की तैयारियों के पीछे उधर सबसे सीनियर मूंडवे वाले के कमरे में क्या कुछ चल रहा है। घर असल में एक बाखल की तरह था। बाखल का मतलब एक अंग्रेज़ी के यू अक्षर के आकार की हवेली, जिसके सामने उल्टे यू आकार का बड़ा-सा आँगन, आँगन के चारों ओर दस-बारह फिट की चौहद्दी और उसके आगे हाथी दरवाज़ा हो। दोनो यू मिल कर अंग्रेज़ी का ओ अक्षर बना रहे हों। बाखल में अंदर की बात अंदर और बाहर की बात बाहर ही रहती है। आने वाली कारें तो क्या अगर छोटा ट्रक भी आ रहा है, तो वह भी दरवाज़े से अंदर जाकर समा जाए। डॉक्टरों, मशीनें ला रही गाड़ियों की आवाजाही हो रही थी लेकिन ऊपर से सब कुछ सामान्य बनाए रखने, या दिखाने की पूरी चाक-चौबंद व्यवस्था थी। गाड़ियाँ हाथी दरवाज़े के अंदर जातीं थीं और दरवाज़ा बंद हो जाता था। घर में इतना बड़ा कार्यक्रम होना था तो गाड़ियों की, लोगों की आवाजाही तो सामान्य बात थी। चूँकि तीन दिवसीय कार्यक्रम तो शादी घर में होना था, इसलिए यह चिंता तो थी नहीं कि नातेदार-रिश्तेदार आएँगे, तो वह छज्जू जी को गंभीर रूप से बीमार देख कर चार बातें करेंगे। यह जो चार बातें किये जाने का डर था, वह भी इस मामले में नहीं था। यहाँ चार बातें होनी ही नहीं थीं।
आगे की कहानी अब डायरी की तरह ही प्रस्तुत की जाए तो अधिक सुविधाजनक होगा। चूँकि आगे की कहानी बस तीन ही दिनों की कहानी है, चौदह, पन्द्रह और सोलह अगस्त की। इसलिए बस यह कि तीनों दिनों का लब्बो-लुआब डायरी के नोट्स की तरह जान लिया जाए। हमें क्या मतलब किसी के घर के परदे उघाड़ने से ? और हम तो कुछ कहना भी नहीं चाह रहे हैं, हम तो बस आपको यह बताना चाह रहे हैं कि कितनी धूमधाम से सारा कार्यक्रम हुआ। तो आइए तीनों दिन की डायरी पढ़ते हैं।
चौदह अगस्त- आज सुबह ग्यारह बजे से ही छज्जू जी मूंडवे वालों का पूरा परिवार, मतलब तीनों बेटों का परिवार शादी घर में शिफ़्ट हो गया है। दोपहर बाद से मेहमानों के आने का सिलसिला भी प्रारंभ हो गया है। जो क़रीब के रिश्तेदार हैं, वे तो ज़ाहिर सी बात है कि एक दिन पूर्व ही आएँगे। जा आ रहे हैं उनके स्वागत और उन्हें उनके सर्व सुविधायुक्त वातानुकूलित कमरों में व्यवस्थित किया जा रहा है। सबको यह बताया जा रहा है कि छज्जूमल जी कमज़ोरी के कारण वे पन्द्रह की रात के कार्यक्रम में ही शामिल हो पाएँगे, और फिर घर पर भी तो कोई चाहिए, इतना बड़ा घर है। उन्होंने ख़ुद ही मना कर दिया है कि वो रात के कार्यक्रम में आ जाएँगे। हर बार शीला द्वारा यह वाक्य जोड़ दिया जाता है -आपको तो पता ही है कि बुज़ुर्गों की ज़िद के आगे किसकी चलती है ? कल बाबूजी यहीं आएँगे तो यहीं मिल लेना आप लोग। पता है कि कल कार्यक्रम की धूमधाम में किसको याद रहेगी बाबूजी से मिलने की। दोपहर का भोजन होते-हवाते शाम हो गई, और शाम को मेंहदी लगाने वाली लड़कियाँ आ गईं। मेहमानों की सारी महिलाओं को, लड़कियों को मेंहदी लगाने के लिए बहुत सी लड़कियाँ बुलाई गई थीं। शाम को जब आए हुए पुरुष मेहमान आराम करने जा रहे थे, तो सुनील ने हाथों को बोतल का आकार देते हुए कुछ शरारती अंदाज़ में व्यवस्था हेतु जाने की इजाज़त माँगी। सुनील घर गए और उधर सारे पुरुष आराम करने चले गए। रात को रात्रि जागरण का संकेत तो सुनील की व्यवस्था के संकेत से मिल ही चुका था। शीला इधर महिलाओं को मेंहदी लगवाने की व्यवस्था में जुटी थी।
रात लगभग आठ बजे शीला का मोबाइल बजा, सुनील का नाम डिस्प्ले हो रहा था मोबाइल की स्क्रीन पर। शीला अपनी भाभियों से घिरी बैठी थी। सुनील का नंबर देखकर वहाँ से उठ खड़ी हुई। अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। क़रीब दस-पन्द्रह मिनट बाद शीला बाहर निकली। जहाँ चौक में महिलाओं को मेंहदी लग रही थी, वहाँ जाकर उसने घोषणा की कि जब तक रात का खाना तैयार हो रहा है, तब तक एक चक्कर मैं घर का लगा आऊँ, बाबूजी के खाने वग़ैरह का देख आऊँ। इससे पहले कि कोई दूसरी महिला भी साथ चलने को कहे, शीला चौक से बाहर निकल अपनी कार में बैठ चुकी थी। यह जा, वह जा।
शीला की कार घर के हाथी दरवाज़े में समाई और दरवाज़ा तुरंत बंद भी हो गया। अंदर बिलकुल ख़ामोशी थी। चौहद्दी के अंदर रौशनी बिलकुल माँद-माँद हो रही थी। अंदर जहाँ छज्जू जी का कमरा था उसके ठीक बाहर शीला, सुनील और डॉक्टर खड़े हुए थे। तीनों के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। कुछ देर तक तीनों में बात होती रही फिर सुनील ने एक तरफ़ जाकर अपने मोबाइल से कुछ कॉल्स किए। एक के बाद दो या तीन कॉल्स। कॉल करने के थोड़े ही देर में ही अशोक और अनिल अपनी-अपनी पत्नियों के साथ वहाँ पहुँच गए। जहाँ पर पहले तीन लोग खड़े थे, वहाँ अब सात लोग खड़े थे। खड़े रहे.... खड़े रहे.... काफी देर तक खड़े रहे। फिर एक-एक कर सब वहाँ से चले गए, अशोक को छोड़कर बाक़ी सब।
शादीघर में सुनील की व्यवस्था ने रंग जमा दिया था। एक दिन पहले केवल ख़ास ही मेहमान आए थे, इसलिए सुनील ने व्यवस्था भी बहुत अच्छी की थी। सबसे महँगी वाली। महिलाएँ हॉल में जमा होकर बधावे गाने लगीं और पुरुष सारे सुनील के कमरे में डेरा जमा कर बैठ गए। ठहाकों और क़हक़हों से उस कमरे की छत कई बार ऐसा लगा कि अब उड़ी कि तब उड़ी। महिलाओं का भोजन तो बूफे में बाहर लगा दिया गया, मगर पुरुषों का भोजन वहीं कमरे में ही सर्व किया गया। वह भी देर रात क़रीब डेढ़ बजे। उसके पहले तो पनीर और ड्राय फ्रूट्स से बने हैवी स्टार्टर ही चलते रहे। जब रात डेढ़ बजे पुरुष भोजन कर रहे थे, उसी समय वहाँ घर पर एक बड़ी-सी वैन हाथी दरवाज़े से अंदर गई। अंदर जाकर वैन बिलकुल छज्जू जी के कमरे से सट कर खड़ी हो गई। सफ़ेद-सफ़ेद से कुछ लोग उतर कर अंदर गए। कुछ देर बाद वैन हाथी दरवाज़े से बाहर आई और तेज़ गति से क़स्बे से साठ किलामीटर दूर स्थित महानगर की दिशा में बढ़ गई। उसी समय सुनील के मोबाइल पर एक कॉल वहाँ शादी घर में आया। सुनील ने एक तरफ़ जाकर बात की और चेहरे के भाव कुछ रिलैक्स होने के हो गए।
पन्द्रह अगस्त- सुबह से ही मेहमानों का आना शुरू हो गया। बाहर के मेहमानों का भी और शहर की उन महिलाओं का भी जो जलवा पूजन के प्रोसेशन में शामिल होने आ रही थीं। लॉन में बूफे लगा दिया गया था सुबह के नाश्ते का। दक्षिण से लेकर उत्तर और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के सारे व्यंजन उस नाश्ते में सम्मिलित थे। पोहे से लेकर पराँठे तक और इडली से लेकर खमण तक। जो आ रहा था, उसे सीधे नाश्ते की ओर चलने का इशारा किया जा रहा था।
सुनील के कमरे में अत्यंत निकटस्थ रिश्तेदारों की पुरुष मंडली वेटरों द्वारा वहीं सर्व किए गए नाश्ते का आनंद ले रही थी। सुनील और अनिल वहीं थे, जबकि अशोक बाहर मेहमानों की आवभगत में लगे हुए थे। जब लगभग सारे कोर ग्रुप के रिश्तेदार आ गए तो अनिल ने बहुत धीमे से सबको सूचना दी कि रात को पिताजी का ब्लडप्रेशर अचानक बहुत कम हो गया था, उनको रात में ही भोपाल के अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा है। अभी सुबह ख़बर आई है कि अब उनकी स्थिति ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं है। सुनील ने आँखों में आँसू भरकर कहा कि शाम का कार्यक्रम रद्द कर देते हैं, पिताजी अस्पताल में हैं, ऐसे में कार्यक्रम नहीं किया जा सकता। लेकिन मनोज के श्वसुर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जब अस्पताल से ख़बर आ गई कि स्थिति ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं, तो कार्यक्रम रद्द करने का कोई मतलब नहीं। ब्लड प्रेशर तो इस उम्र में ऊपर-नीचे होता रहता है, वह इतनी बड़ी बात नहीं है। अनिल के श्वसुर ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि इतना बड़ा ताम-झाम है, इतना पैसा लगा है, सब लोग आ गए हैं, अब कार्यक्रम रद्द करना ठीक नहीं होगा। सुनील के साले ने कहा कि जब डॉक्टरों ने कह ही दिया है कि चिंता की कोई बात नहीं, तो अब यह बात इस कमरे से बाहर ही नहीं जाने दी जाए कि छज्जू जी अस्पताल में भर्ती हैं। अस्पताल में हैं तो वैसे भी डर की कोई बात नहीं है, कार्यक्रम किया जाए और वैसे ही किया जाए, जैसे किया जा रहा था। सुनील ने कुछ ना-नुकुर की तो उसके श्वसुर ने आदेशात्मक स्वर में कहा कि छज्जू जी की अनुपस्थिति में अब हम यहाँ के बड़े हैं, आपका निर्णय नहीं चलेगा, हमारा चलेगा और हमारा निर्णय यह है कि  कार्यक्रम वैसे ही होगा जैसे होना था, इस मामले में अब और कोई बात नहीं होगी। कहते हुए वे उठकर खड़े हो गए। सुनील हाथ जोड़े खड़ा था बस।
जलवा पूजन का प्रोसेशन ऐसा था कि सचमुच रंग ही जम गया। बरसात ने भी साथ दिया। मौसम एकदम खुल गया। आगे-आगे चलते हुए सजे-धजे हाथी और एक ही रंग की साड़ियों में सजी हुई महिलाएँ जब बैंड पार्टी के पीछे मंगल गीत गाती हुई चलीं, तो ऐसा लगा जैसे किसी फ़िल्म का दृश्य हो। सड़क केसरिया-लाल रंग में रँग गई पूरी। आगे-आगे मनोज की पत्नी सर से पैर तक ज़ेवरों में लदी हुई कलश लिए चल रही थी। पीछे एक केसरिया-लाल बादल उमड़ रहा था जैसे। सुनील पीछे अपनी कार में चल रहा था दोस्तों के साथ। सुनील के चेहरे पर अब कल वाली चिंता के बादल नहीं थे। उसका चेहरा उल्लास से भरा हुआ था।
दिन के सारे कार्यक्रम वैसे ही हुए जैसे तय किए गए थे। जलवा पूजन से लौटी महिलाओं और सारे मेहमानों के लिए दोपहर भोज में दाल-बाटी चूरमा की व्यवस्था थी। नाम दाल-बाटी चूरमा था, मगर जाने कितने व्यंजन उसके साथ परोसे गए थे। दोपहर के इस भोजन के लिए विशेष रूप से चाँदी के पॉलिश वाले बरतन मँगवाए गए थे। चौकियों पर थालियाँ सजा कर भोजन करवाया गया। मूंडवे वाले परिवार ने मनुहार कर-कर के परोसा और खिलाया। पूरा परिवार, महिलाएँ, पुरुष, बच्चे सब परोसने में लगे थे। भोजन के बाद क़स्बे से जो महिलाएँ आईं थीं, वो अपने-अपने घर चली गईं और मेहमानों की महिलाएँ ब्यूटीशियंस के हवाले हो गईं। इस पूरी आपाधापी में किसे याद रहना था कि छज्जू जी कार्यक्रम शुरू होने से अब तक दिखे ही नहीं हैं। जिनको पता होना था उनको पता था कि छज्जू जी कहाँ हैं।
रात को मानों सितारे ही ज़मीन पर उतर आए। ऐसा जलवा पूजन का समारोह कि सचमुच भूतो न भविष्यति ही हो गया वो। राग-रंग और संगीत का समाँ, उस पर व्यंजन इतने कि गिनती ही न हो पाए। जिधर मिठाई का स्टॉल था उधर ऐसा लग रहा था कि पूरी दुकान ही उठा कर सजा दी गई है। नव प्रसूता ने अपने बच्चे और मनोज के साथ मंच पर थोड़ा नृत्य किया। बाक़ी परिवार के सदस्यों ने भी अपनी-अपनी बारी आने पर अपनी प्रतिभा दिखाई। बीच-बीच में नर्तकियों ने और टीवी की अभिनेत्रियों ने आकर मोर्चा सँभाला और ऐसा सँभाला कि सत्तर पार के बुज़ुर्ग पुरुष मेहमान भी भोजन वाला इलाक़ा छोड़ कर इधर मंच के आस-पास ही जमा हो गए। कुछ नौजवान साथ में नृत्य करने के लिए मंच पर भी पहुँच गए और कमर को अत्यंत बेहूदे तरीक़े से मटका कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगे। सुनील और शीला का भाषण कवि महोदय के सहयोग के कारण ज़बरदस्त रहा। सामने बैठी महिलाओं में बड़ी-बूढ़ियों की आँखें कई बार भाषण में गीली हो गईं। अत्यंत भावुकता से भरा हुआ भाषण था सुनील का और प्रस्तुतिकरण भी अच्छा रहा। इतना तो रहा ही कि जिस प्रयोजन से किया गया था, वह प्रयोजन पूरा हो जाने की पूरी संभावना थी। उस पर सुनील का जोधपुरी साफा जिसका छुरंगा एड़ी तक लहरा रहा था, मानों सारी कसर पूरी कर रहा था। बड़ी-बूढ़ियाँ क़सम खा-खाकर कह रही थीं कि ऐसा जलवा पूजन तो सात पीढ़ियों में न हुआ न आगे सात पीढ़ियों में होगा। ऐसी तो लोग शादी भी नहीं करते हैं, जैसा जलवा पूजन हुआ है ये। रात, देर रात तक जलवा पूजन का जलवा चलता रहा।
सोलह अगस्त- देर रात के थके हुए मेहमान कुछ देर से ही जागे। वे जिनको सुबह ही निकलना था, वे नाश्ता कर के निकलने लगे। उनकी गाड़ियों में मिठाइयों के बड़े बॉक्स रखवाए जा रहे थे। जो थोड़ा नज़दीक के रिश्तेदार थे, वे भोजन के बाद निकलने वाले थे।
दोपहर के भोजन के ठीक बाद जब नज़दीक के कुछ रिश्तेदार ही शेष रह गए थे, और वो सब कार्यक्रम के ठीक प्रकार से हो जाने को लेकर चर्चारत थे, तब ही अचानक सुनील ने बाहर से आकर बताया कि अस्पताल से ख़बर आई है, पिताजी का ब्लडप्रेशर एक बार फिर से बहुत लो हो गया है। परसों रात से बिलकुल ठीक थे, मगर अभी आधे घंटे पहले से तबीयत फिर ख़राब होने लगी है। आनन-फानन में सारी महिलाओं को घर रवाना किया गया और वहाँ उपस्थित सारे पुरुष गाड़ियों में बैठकर महानगर की तरफ़ रवाना हो गए।
आधे घंटे बाद ही सारी गाड़ियाँ महानगर के सबसे महँगे और अत्याधुनिक पाँच सितारा निजी अस्पताल के पार्किंग एरिया में पहुँच चुकी थीं। अस्पताल पहुँच कर सब तेज़ी के साथ लपकते हुए अंदर भागे। सुनील की गाड़ी का ड्रायवर चाय की दुकान पर जाकर खड़ा हो गया। रात को वह भी देर तक जागा था, ड्रायवर था इसलिए जागना तो था ही, मालिक के यहाँ कार्यक्रम था। अस्पताल का एक वार्ड ब्वाय जो उन सारी महँगी-महँगी चमचमाती कारों के क़ाफ़िले को अस्पताल में आता हुआ देख चुका था, ड्रायवर के पास आकर खड़ा हो गया।
अंत में बस उन दोनो की बातचीत
‘‘कौन मरीज़ के लिए आया है ये जुलूस भाई?’’ वार्ड ब्वाय।
‘‘छज्जूमल जी हैं छावनी के, परसों रात में भर्ती करवाया है उनको।’’ ड्रायवर।
‘‘परसों.....’’ वार्ड ब्वाय सोचने लगा ‘‘आई. सी. यू. में..... रात में लाए थे न दो-ढाई बजे ?’’
‘‘अब कितने बजे यह तो पता नहीं, मगर लाए रात में ही थे।’’ ड्रायवर।
‘‘वही हैं, परसों रात को तो आई. सी. यू. में बाहर से बस एक ही केस आया था। बहुत बूढ़े थे न, अस्सी पार के ?’’ वार्ड ब्वाय।
‘‘हाँ वही।’’ ड्रायवर।
‘‘तो उनके लिए इतनी हबड़-दबड़ में दौड़ कर अंदर क्यों गए हैं। उनका खेल तो परसों रात को ही खल्लास हो गया था। यहाँ पर आते-आते वो रास्ते में ही फिनिश हो गए थे, या कौन जाने घर से ही फिनिश हालत में लेकर चले थे। ख़ाली बॉडी ले जाने के लिए ऐसे दौड़ कर गए हैं जैसे कोई सीरियस मामला हो।’’ वार्ड ब्वाय।
अगले दिन छज्जू जी मूंडवे वाले की अंतिम यात्रा इतनी शान से निकली कि एक बार फिर बड़ी-बूढ़ियाँ क़सम खा-खाकर कह रही थीं कि ऐसी यात्रा तो आज तक किसी की नहीं निकली होगी, बेटों ने धन्य कर दिया पिता को। सारा शहर इस बात पर निहाल था कि अब, जब कि अधिकांश अंतिम यात्राओं में मृतक के परिवार वाले भी वाहनों से ही क़स्बे से तीन-चार किलोमीटर दूर स्थित विश्राम घाट जाते हैं, छज्जू जी के तीनो बेटे अंतिम यात्रा में पूरे तीन चार किलोमीटर नंगे पैर पैदल चले। सारे शहर के फूल ख़रीद कर पूरे रास्ते छज्जू जी पर पुष्प वर्षा की गई। सारे रास्तों पर फूल ही फूल बिछते जा रहे थे। सारे शहर से एक ही आवाज़ आ रही  थी ‘‘धन्य हो, धन्य हो, धन्य हो...... ऐसे बेटे धन्य हों......।’’
***
समाप्त

पत्थर की होदें और अगन फूल (कहानी : पंकज सुबीर)

पत्थर की होदें और अगन फूल
(कहानी : पंकज सुबीर)
भारत में जितने भी सर्किट हाउस, रेस्ट हाउस, डाक बँगले, विश्राम गृह आदि पाए जाते हैं, वो अधिकांश अंग्रेज़ों के बनाए हुए हैं। इनमें से भी अधिकतर शहर से दूर एकांत में बनाए गए हैं। कुछ-कुछ तो घने जंगल के अंदर भी हैं। बहुत से कारण होते थे इनके एकांत में होने के। अंग्रेज़ तो वैसे भी एकांतप्रिय होते थे। एकांत की तलाश में जाने कहाँ-कहाँ निकल जाया करते थे। ऐसा ही कोई अंग्रेज़ शायद डोडी में भी पहुँच गया होगा और नैसर्गिक सुंदरता पर रीझ कर डाक बँगला बनवा दिया होगा। डोडी का डाक बँगला। जाने कौन सी भवन सामग्री उपयोग करते थे अंग्रेज़ कि बरसों बीतने के बाद भी पूरे देश में डाक बँगले जस के तस खड़े हैं। दरार तक नहीं पड़ी है। डोडी का डाक बँगला भी अंग्रेज़ों का ही बनाया हुआ है। मटमैले-पीले और सफ़ेद रंग से पुता हुआ भवन, और उस पर लाल-कत्थई कवेलुओं की ढलवाँ छत। पूरे भवन के चारों तरफ़ लोहे के खम्बों का बरामदा। बरामदे पर छाई हुई बोगनबेलिया और रंगून क्रीपर की लतरें। घनी लतरें। बरामदे से अंदर झाँकती हुईं और कहीं-कहीं ज़मीन से बरामदे की छत तक जाकर वापस ज़मीन पर लौटी हुईं।  बरामदे में भवन की चारों दिशाओं में सीढ़ियाँ, भवन में जाने के लिए। पत्थर की सीढ़ियाँ। भवन के चारों तरफ़ बग़ीचे में कुछ फूलदार पौधे और कुछ फलदार पेड़। चारों तरफ़ आड़ी-तेढ़ी लकड़ियों की डिज़ाइनर फेंसिंग। फेंसिंग के किनारे-किनारे लगे नीलगिरी, अमलतास, वनचम्पा, शीशम और गुलमोहर के दरख़्त। पीछे की फेंसिंग से सटा हुआ डाक बँगले के चौकीदार का छोटा-सा मकान। डाक बँगलों के चौकीदार वास्तव में पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर होते हैं। सब कुछ इनको ही करना होता है। बँगले की साफ-सफाई, आने वालों के लिए चाय-नाश्ता, खाना-पीना, और बाकी का सारा काम भी।
सड़क से कुछ अंदर को है डोडी का डाक बँगला या रेस्ट हाउस, अगर आपको वहाँ जाना है तो मुख्य मार्ग को छोड़ कर नीचे उतरना होता है और क़रीब एक-डेढ़ किलोमीटर कच्चे-पक्के रास्ते पर चलने के  बाद आता है डाक बँगला। आस-पास कहीं कोई आबादी नहीं है, फिर भी डोडी डाक बँगला कहते हैं। ज़ाहिर-सी बात है डोडी उस गाँव के नाम पर होगा, जहाँ रेस्ट हाउस स्थित है। सारे डाक बँगलों के नाम इसी प्रकार तो रखे गए हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि आस-पास इस नाम का कोई गाँव नहीं फिर क्यों रखा गया होगा नाम डोडी डाक बँगला ? चारों तरफ़ जंगल है, कम घना और छोटे पेडों, झाड़ियों का जंगल। जहाँ जंगल ख़त्म होता है, वहाँ से पहाड़ शुरू हो जाते हैं। काले, नीले, धूसर पहाड़, दिशाओं की धुंध में खोए हुए पहाड़। डोडी का डाक बँगला बरसों-बरस तक शिकार खेलने के काम आता रहा। अंग्रेज़ों और नवाबों के शिकार खेलने के। पहाड़ों के पार जंगल बहुत ज़्यादा घना हो जाता है। उसी जंगल में शिकार खेला जाता था। पहाड़ों के पार जंगल में आदिवासियों के गाँव हैं। उन्हें गाँव भी क्या कहें, बस इधर-उधर बिखरे हुए टप्पर हैं। जंगल के बीच-बीच में जहाँ जगह मिली वहीं टप्पर बना कर ये आदिवासी बस गए हैं। आज़ादी के पहले तक जँगली जानवर बहुतायत में थे लेकिन अब बस नाम को ही हैं। शिकार पर रोक लगने के बाद भी हुआ यह कि उस जंगल को रिज़र्व फॉरेस्ट नहीं घोषित किया गया, तो अंग्रेज़ों के जाने के बाद भारतीय काले अंग्रेज़ों ने शिकार कर-कर के जंगली जानवरों का सफाया कर दिया।
अरे....! मैं यह तो आपको बताना ही भूल गया कि यह सब कुछ जो आपको बता रहा हूँ, यह एक फ़्लैश-बैक है। शायद आठ या दस वर्ष पूर्व का फ़्लैश-बैक। मेरी अपनी स्मृतियों का एक छोटा-सा अध्याय। मैं....? मैं कौन...? मैं जो आपको यह कहानी सुना रहा हूँ। मैं पीताम्बर गुदेनिया.... साल भर पहले तक जब मैं सरकारी नौकरी में था, मुझे पीजी बाबू कह कर बुलाया जाता था। पीताम्बर गुदेनिया का शॉर्ट फार्म। अब बाबूगिरी तो नहीं रही, बस पीजी ही बचा हूँ मैं। बहुत से लोगों के लिए पेइंग गेस्ट। पेइंग गेस्ट, क्योंकि सरकारी पेंशन तो मिल ही रही है न मुझे। जब रिटायर हुआ, तब ज़िला कलेक्टर या डीएम के ऑफ़िस में उनका पीए कम बड़ा बाबू कम स्टेनो सब कुछ ही था मैं। सामान्यतः पीए का काम ऑफ़िस तक ही सीमित होता है, लेकिन यह भी कुर्सी पर बैठे अधिकारी पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार का है। कुछ अधिकारी ज़िले के दौरों में पीए को साथ ले जाना पसंद करते हैं, तो कुछ गोपनीयता के चलते अकेले ही चलना पसंद करते हैं। तो होता यह था कि मैं कभी कार्यालय में रहता था, तो कभी साहब के साथ उनकी गाड़ी में बैठ कर दौरे करता था। जब गाड़ी में बैठ कर दौरे करता था, तो कहावत के अनुसार अपने आप को नाक का बाल महसूस करता था। प्रशासनिक व्यवस्था की नाक का बाल।
अब ज़रा आपको कहानी के वर्तमान कालखण्ड से भी परिचित करवा दूँ। अगर कहानी फ़्लैश-बैक में जा रही है, तो आपको पता भी तो होना चाहिए कि पीताम्बर गुदेनिया आज अचानक डोडी के उस रेस्ट हाउस को याद करके कहानी क्यों सुना रहा है। (अब हम इसे डोडी का रेस्ट हाउस या विश्राम गृह ही कहेंगे, डोडी डाक बँगले का अनुप्रास ज़रा टंग ट्विस्टर है।) याद बिना कारण तो आती नहीं। वह सब कुछ जो अब अतीत है, उसकी कोई घटना, या व्यक्ति, या स्थान, हमें तभी याद आता है, जब हम वर्तमान में कहीं उस विस्मृत का कोई संकेत पाते हैं। वरना तो हमें अब समय ही कहाँ है कि हम यूँ ही बस किसी दिन आँगन में लेट कर उस बीते हुए को याद करें। अरे.... फिर भटका.... ये पीताम्बर गुदेनिया इसी प्रकार विषय से भटक-भटक कर इधर-उधर घुसता रहेगा, आपको डोडी के रेस्ट हाउस की कहानी सुननी है, तो आपको इसे झेलना ही पड़ेगा। बात अचानक इस कहानी के याद आ जाने की चल रही है, तो लगे हाथों आपको यह भी बता दूँ कि मैं अभी एक कार में सवार हूँ। कार, जो मुझे लेकर भोपाल से इन्दौर लौट रही है। लौटना इसलिए क्योंकि मैं इन्दौर में रहता हूँ। यह कार एक टैक्सी है, जितनी पेंशन मुझे मिलती है, उतने में इतना तो अफोर्ड कर ही सकता हूँ कि टैक्सी से घूमूँ। जीवन भर बाबूगिरी की, तो कार चलाना सीख नहीं पाया। अब रिटायरमेंट के बाद कहीं जाना होता है, तो ट्रेवल्स की कार लेता हूँ और निकल पड़ता हूँ। तो मैं भोपाल से इन्दौर लौट रहा हूँ। लौट रहा हूँ अपने घर। भोपाल में बहन रहती हैं, आज रक्षाबंधन पर उनसे राखी बँधवाने गया था। बहन ने रात का खाना खाए बिना नहीं निकलने दिया, तो ये देर हो गई है। रात हो चुकी है।
पीताम्बर गुदेनिया फिर भटक गया है। असल में आज श्रावण की पूर्णिमा होने के बाद भी मौसम पूरी तरह से खुला हुआ है। श्रावण तो मूसलाधार बरसात, नदी-नालों के उफनने, बादलनों के गरजने-बरसने का महीना होता है। इस साल सावन कुछ सूखा बीत रहा है। दो-तीन दिन पहले तक तो हल्की-फुल्की बरसात हो भी रही थी मगर अब बिल्कुल बंद है। आसमान एकदम खुला हुआ है। कार से देखने पर हर तरफ़ तारे छिटके हुए दिखाई दे रहे हैं। और श्रावण पूर्णिमा का ज़र्द चाँद भी दूर आसमान पर टँका हुआ है। चाँद...? हाँ चाँद से ही तो याद आई थी मुझे डोडी के विश्राम गृह की। डोडी का विश्राम गृह इसी रास्ते पर तो पड़ता है। इसी रास्ते पर, मतलब डोडी के विश्राम गृह को जाने वाला रास्ता इसी हाइवे से फूटा है। थोड़ी देर बाद ही उल्टे हाथ पर एक पतली-सी सड़क इस मुख्य मार्ग को छोड़कर, दूर पहाड़ों में, अँधेरों में बिला जाएगी। वही सड़क डोडी विश्राम गृह को जाएगी। लेकिन पीताम्बर गुदेनिया को याद तो चाँद को देखकर आई थी, रास्ते के कारण नहीं ? हाँ... भई हाँ, चाँद को देखकर ही आई थी। तो चलिए एक बार फिर से हम फ़्लैश-बैक में चलते हैं। वहीं आपको पता चलेगा कि पीताम्बर गुदेनिया को चाँद देखकर डोडी की याद क्यों आई थी।
डोडी का विश्राम गृह जैसा कि बताया गया कि एकदम वीराने में है। न आदमी, न आदमी की ज़ात। भूतहा फ़िल्मों के लिए एकदम मुफ़ीद। बात आठ-नौ साल पहले की है। राकेश सक्सेना उस समय कलेक्टर थे। हँसमुख और आत्मीय स्वभाव के धनी थे राकेश सक्सेना। पीताम्बर गुदेनिया, यानी मुझको हमेशा साथ लेकर दौरे करते थे। रास्ते भर बातें करते रहते, नई-नई जानकारियाँ प्राप्त करते रहते। ऐसा लगता था जैसे दुनिया छोड़ने के पहले दुनिया के बारे में सब कुछ जानना चाहते थे। मानों मरने के बाद भी दुनिया के बारे में आई. ए. एस. की परीक्षा देनी हो। कोई भी नई जानकारी मिलती, तो खोद-खोद कर देर तक उसके बारे में पूछते रहते। जब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाते, पूछते रहते। दो ही शौक़ थे उनके, एक तो जानकारियाँ प्राप्त करना और दूसरा बाग़वानी। जब भी कलेक्टरी से फुरसत मिलती, तो खुरपी लेकर बँगले के बग़ीचे में काम करने जुट जाते। दो-तीन महीने पहले ही इस ज़िले में पदस्थ हुए थे। दो-तीन महीने में ही मुझसे अच्छी तरह से घुल-मिल गए थे। लगभग हमउम्र होना भी शायद इसका एक कारण था। मित्रतावत् व्यवहार करते थे मेरे साथ। पहला एक महीना तो ज़िले भर की राजनैतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक जानकारी प्राप्त करने में ही बीत गया था उनका। कौन क्या है ? कैसा है ? कहाँ है ? सब कुछ बताना पड़ा था मुझको। उत्तर में फिर एक प्रश्न और प्रश्न के उत्तर में फिर एक प्रश्न। जब किसी जानकारी से बहुत प्रसन्न हो जाते तो बस एक ही बात कहते -पीजी यू आर ग्रेट।
राकेश सक्सेना का परिवार उनके साथ नहीं आया था यहाँ। पत्नी भोपाल के निजी मकान में बच्चों के साथ रहती थीं। अमूमन सारे आई. ए. एस. अधिकारी यही करते हैं। पत्नी और बच्चों को राजधानी में मकान ख़रीद कर वहाँ रख देते हैं, और ख़ुद प्रदेश भर में स्थानांतरित होकर घूमते रहते हैं। राजधानी में इसलिए क्योंकि सात-आठ साल की कलेक्टरी के बाद तो राजधानी में ही सचिवालय, मंत्रालय में बैठना होता है। इसलिए ये पहले से ही अपने परिवार को राजधानी में रख देते हैं, बच्चों की पढ़ाई लिखाई डिस्टर्ब नहीं होती है और राजधानी में उनकी हैसियत के पाँच-सात सितारा स्कूल भी मिल जाते हैं। बाक़ी कलेक्टर को अकेले रहना होता है, तो कलेक्टर अकेला होता कब है, वो जब चाहे उसका अकेलापन तो दूर हो ही जाता है। राकेश सक्सेना भी कलेक्टर निवास के उस बड़े-से बँगले में अकेले ही रहते थे। रात को दौरे से लौटते समय जहाँ रेस्ट हाउस मिल जाता, वहीं खाना खा-पीकर बँगले को लौटते। मेरा तो परिवार था लेकिन अगर अफ़सर छड़े-सा हो तो मातहत को भी छड़ा होना ही पड़ता है और कोई ऑप्शन होता भी नहीं है।
बात उन्हीं दिनों की है जब राकेश सक्सेना को आए हुए दो-तीन महीने हो चुके थे और अब ज़िले में दौरे चल रहे थे। उन्हीं दौरों के क्रम में कहीं से किसी गाँव से लौटते हुए हम दोनों डोडी के उस रेस्ट हाउस में पहुँचे थे। जैसे ही रेस्ट हाउस के चौकीदार ने कलेक्टर की लाल बत्ती लगी (उस समय कलेक्टर की गाड़ी पर लाल बत्ती लगी होती थी।) गाड़ी को रेस्ट हाउस में प्रवेश करते देखा, वह पीछे के अपने मकान से नंगे पैर दौड़ता हुआ आ गया था। अधेड़, या यूँ कहें कि लगभग बूढ़ा-सा आदिवासी चौकीदार था वह। नाम था मोन्या। माँ-बाप ने नाम तो मोहन रखा था, पर अब वह मोन्या होकर रह गया था। राकेश सक्सेना कार से उतर कर रेस्ट हाउस के अंदर चले गए थे। पीछे-पीछे मोन्या भी चला गया था। मैं वहीं बरामदे में पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया था। कुछ ही देर में मोन्या भी अंदर से आया और बरामदे में नीचे बैठ गया। पूर्व के कलेक्टरों के साथ मैं वहाँ आता रहता था, इसलिए मोन्या से परिचित था। समय काटने के लिए मैं मोन्या से बातें करने लगा था।
अभी शाम का झुटपुटा होने में भी समय था। सूरज ढल रहा था लेकिन अभी उजाले की आँखों में इतना काजल नहीं लगा था कि उसे शाम कह सकें। बरसात का मौसम था, चारों तरफ़ रेस्ट हाउस में हरियाली की चादर बिछी हुई थी। मौसमी फूल भी खिल उठे थे बरसात का स्पर्श पाकर। राकेश सक्सेना बाथरूम से फ्रेश होकर बाहर आए, तो मैं और मोन्या दोनों उठ कर खड़े हो गए थे।
‘‘बहुत सुंदर जगह है पीजी यह तो...! एकदम शांत जगह और आसपास कितनी नेचुरल ब्यूटी बिखरी हुई है....। वाह.... सुंदर...!’’ राकेश सक्सेना के चेहरे पर प्रशंसा के भाव थे। वो मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए थे। उनके इशारे पर मैं भी सकुचाता हुआ बैठ गया था।
‘‘क्या नाम है तुम्हारा...?’’ राकेश सक्सेना ने मोन्या की तरफ़ देखते हुए कुछ मीठे स्वर में पूछा था।
‘‘जी मोन्या..... जी मोहन....।’’ कुछ हड़बड़ाते हुए उत्तर दिया था मोन्या ने। शायद पहली बार किसी अधिकारी ने उससे उसका नाम पूछा था।
‘‘हमें क्या खिलाओगे मोहन जी ...?’’ राकेश सक्सेना ने मोन्या की उमर को देखते हुए जी लगा दिया था नाम के आगे।
‘‘जो साहब जी कहें!’’ कहता हुआ मोन्या झुककर लगभग दोहरा हो गया था।
‘‘हम क्या बताएँ..? तुम बताओ, हम तो तुम्हारे मेहमान हैं, जो खिलाओगे खा लेंगे हम तो।’’ राकेश सक्सेना ने कुछ मुस्कुराते हुए कहा था।
‘‘तीतर पका लूँ साहब ?’’ मोन्या ने प्रश्न किया था।
‘‘तीतर....? वह तो प्रतिबंधित है, क़ानूनन जुर्म है तीतर का शिकार करना..।’’ राकेश सक्सेना का स्वर एकदम अधिकारियों वाला हो गया था।
‘‘सारे साहब लोग तो यहाँ तीतर खाने ही आते हैं साहब जी।’’ मोन्या ने घबराते हुए बहुत ही अदब के साथ उत्तर दिया था।
‘‘नहीं... नहीं... वो ग़लत है, ग़ैरक़ानूनी है, तीतर संरक्षित पक्षी है। कुछ और बनवा लो, कुछ भी वेज बनवा लो, नानवेज नहीं।’’ राकेश सक्सेना ने सामान्य होते हुए कहा था।
मोन्या हाथ जोड़ घबराया हुआ खड़ा था। हैरत में भी था कि आज तक तो जो भी अधिकारी यहाँ आता है, वह तीतर खाने ही आता है। यहाँ उसके अलावा और है ही क्या। यहाँ से तो तीतर राजधानी भोपाल तक भेजा जाता है। ये कौन आ गया जो यहाँ तीतर खाने नहीं आया है। मैंने मोन्या की उलझन समझ ली थी और उससे पूछताछ करके मैंने तिक्कड़ रोटी, आलू-भटे का कच्चा भुरता, टमाटर-हरीमिर्च  का झोल और धनिये की हरी चटनी बनाने को कह दिया था। मेरे कहते ही उसने एक बार राकेश सक्सेना की तरफ़ देखा था। मुतमईन होने के लिए कि पीताम्बर गुदेनिया ने जो घास-फूस पकाने को कहा है, उसे आप खाएँगे भी? राकेश सक्सेना की तरफ से सकारात्मक संकेत पाकर वह हाथ जोड़े जाने लगा था।
‘‘सुनो...।’’ राकेश सक्सेना की आवाज़ पर ठिठक गया था मोन्या ‘‘जा कहाँ रहे हो, ये पैसे तो लेकर जाओ, सब्ज़ी और दूसरा सामान भी तो लाना होगा।’’ कहते हुए राकेश सक्सेना ने अपनी जेब से पर्स निकाला और उसमें से कुछ नोट निकाल कर मोन्या की तरफ़ बढ़ा दिए थे। मोन्या ने झिझक कर मेरी तरफ़ देखा था, मेरे इशारे पर उसने बढ़कर पैसे ले लिए थे।
‘‘तुम ख़ुद बनाओगे या कोई और बनाएगा ?’’
‘‘साहब जी बेरा मानस बनाएगी खाना...।’’ मोन्या के उत्तर पर राकेश सक्सेना ने अचरज से मेरी तरफ़ देखा था।
‘‘बेरा मानस मतलब इसकी घरवाली...।’’ मैंने उत्तर दिया था।
‘‘ठीक है... तो उनको खाना तैयार करने का कह कर आ जाओ। हमें ज़रा आसपास का इलाक़ा दिखाओ।’’
‘‘जी साहब जी।’’ इतना कह कर मोन्या मेरी तरफ़ मुड़ गया था ‘‘और भी कुछ लाना है क्या साहब ? या कुछ और भी व्यवस्था करनी है क्या ?’’ यह प्रश्न उसने मुझसे किया था।
‘‘नहीं कुछ और नहीं, बस तुम जल्दी जाओ और जल्दी से सामान की व्यवस्था करके जल्दी से आओ, साहब को घूमने जाना है।’’ मेरे आदेश पर मोन्या हैरत में डूबा चला गया था।
उसके जाने के बाद राकेश सक्सेना के पूछने पर मैंने बताया था कि मोन्या के ‘और कुछ’ का मतलब आदिवासियों की बनाई हुई शराब और ‘और कुछ व्यवस्था’ का मतलब आदिवासियों की कन्याएँ। राकेश सक्सेना का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा था मेरी बात सुनकर।
कुछ देर बाद हम तीनों रेस्ट हाउस के पीछे के झुरमुट में टहल रहे थे। शाम होने में अभी भी समय था। रेस्ट हाउस की सीमा के बाहर आते ही बरसाती जँगली फूल चारों तरफ़ खिले हुए मिल रहे थे। हर तरफ़ हरियाली की सब्ज़ चादर बिछी हुई थी। आज मैं राकेश सक्सेना के लिए अनुपस्थित-सा था, वे आज मोन्या से जानकारी प्राप्त करते हुए चल रहे थे। आदिवासियों के बारे में, उनकी संस्कृति के बारे में, रीति-रिवाज़, पर्व-त्योहार। जंगल के बारे में, जँगली जानवरों के बारे में, शिकारियों के बारे में। मतलब सब कुछ जानने की जो जिज्ञासा उनके स्वभाव में थी, उसके अनुसार जानने की कोशिश कर रहे थे। मोन्या भी उत्साह के साथ उनको जानकारी दे रहा था। वह ख़ुद भी आदिवासी था, इसलिए उसके पास तो देने की लिए बहुत जानकारी थी। झाड़ियों के किनारे से होकर एक बरसाती नदी बह रही थी। बरसात होने के कारण उसमें भरपूर पानी था। ऊपर पहाड़ से उतर कर रेस्ट हाउस के पीछे से बहती हुई जा रही थी वह। नदी के किनारे-किनारे पत्थर की बड़ी-छोटी चट्टानें बिखरी हुई थीं। पहाड़ वहाँ से शुरू हो रहा था। राकेश सक्सेना ने नदी को देखा और वे उन चट्टानों की तरफ़ बढ़ गए थे। ज़ाहिर-सी बात है कि उनके पीछे-पीछे मैं और मोन्या भी बढ़ गए थे। अब हम नदी के किनारे-किनारे पत्थरों पर सँभलते हुए चल रहे थे। इस बीच यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि राकेश सक्सेना ने मोन्या से नदी का नाम जान लिया था कि इस नदी का नाम कमानी नदी है।
हम लोग नदी से अब पहाड़ की तरफ़ बढ़ रहे थे कि एक बड़ी चट्टान की ओट में कुछ मानव निर्मित आकृतियाँ देखकर राकेश सक्सेना रुक गए थे।
‘‘ये क्या है...?’’ उन्होंने मोन्या की तरफ़ प्रश्नवाचक नज़रों से देखते हुए पूछा था।
‘‘ये होदें हैं साहब जी..। पत्थर की होदें...।’’ मोन्या ने उत्तर दिया था।
चट्टान की ओट में समतल ज़मीन पर पत्थर की दो होदें बनी हुई थीं। आजकल के बाथटब जैसी और लगभग उतनी ही बड़ी थीं वो होदें।
‘‘वो तो मुझे भी दिख रही हैं, पर ये यहाँ क्यों बनी हैं ? यहाँ जंगल में इनका क्या काम, जो इनको यहाँ बनवाया गया। पास में ही तो नदी है फिर ये होदें किसलिए।’’ राकेश सक्सेना ने पूछा था।
‘‘वो साहब जी....।’’ कुछ कहते हुए मोन्या रुक गया था और सिटपिटा भी गया था।
‘‘क्या हुआ ? ’’ मोन्या की सिटपिटाहट को देखकर राकेश सक्सेना की उत्सुकता और बढ़ गई थी।
‘‘थोड़ी ख़राब बात है साहब जी।’’ मूल्या ने झिझकते हुए और मेरी तरफ़ देखते हुए उत्तर दिया था।
‘‘अच्छा....? फिर तो सुनना और ज़रूरी है। चलो सुनाओ पूरी कहानी। आओ पीजी यहाँ पत्थर पर बैठ कर सुनते हैं इनकी कहानी।’’ कहते हुए वो ख़ुद एक पत्थर पर बैठ गए थे और पास के दूसरे पत्थर पर मुझे बैठने का इशारा कर दिया था। मैं ख़ुद भी इन होदों को पहली बार देख रहा था। आश्चर्यचकित था कि आज तक तो इन होदों के बारे में कभी सुना नहीं। होदें देखने में बहुत पुरानी लग रही थीं, युगों पुरानी। मैं आश्चर्यचकित-सा कुछ दूर के एक छोटे पत्थर पर बैठ गया था।
बरसात की उस खुली और धुली शाम में मैंने और राकेश सक्सेना ने मोन्या उर्फ़ मोहन से जो कहानी सुनी थी, उसका लब्बा-लुआब अब आप संक्षिप्त में मेरी ही ज़बानी सुनें। मोन्या की भाषा में कहानी यहाँ सुनाई नहीं जा सकती क्योंकि वह बहुत असंसदीय हो जाएगा। मोन्या ने अपने ठेठ आदिवासी लहजे में कहानी राकेश सक्सेना को सुनाई थी, उसीमें सारी क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ कही गईं थीं। ठेठ देशी अंदाज़ में। ख़ैर मोन्या ने जो कहानी सुनाई, उसका साहित्यिक भाषा में रूपांतरण यहाँ प्रस्तुत है (आप अनुमान लगा सकते हैं कि जहाँ मैंने किसी कठिन साहित्यिक शब्द का उपयोग किया है, वहाँ असल में मोन्या ने किस शब्द का उपयोग किया होगा।)-     

सैंकड़ों साल पहले वहाँ पहाड़ के पीछे आदिवासियों के टप्परों से कुछ दूर पर एक साधु का आश्रम था। साधु गृहस्थ साधु थे। कुछ शिष्यों की कुटियाएँ आसपास थीं और बीच में साधु की कुटिया थी। साधु और उनकी पत्नी दोनों रहते थे वहाँ। कोई आस-औलाद नहीं थी दोनों को। साधु की नामर्दी के कारण औलाद नहीं हुई थी। कहा ये भी जाता था कि नामर्दी के कारण ही साधु जवानी में घर से भागकर साधु हो गए थे। बाद में जब आश्रम बनाया तो चूल्हे-चौके के लिए पत्नी की ज़रूरत पड़ी और गृहस्थी के कामों के लिए एक ग़रीब महिला को पत्नी बना लिया उन्होंने। पत्नी वही काम करती थी, जिसके लिए उसको लाया गया था। कहानी में मोड़ तब आया, जब एक दिन साधु दिशा-मैदान से लौट रहे थे। भोर के तारे का झुटपुटा अभी था ही। साधु जब लौटे तो उन्होंने अपनी पत्नी को किसी आदिवासी शिष्य के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया। साधु के तन-बदन में आग लग गई मगर फिर तुरंत अपनी कमी, अपनी कमज़ोरी का ध्यान आया। साधु उल्टे पैरों लौटे और यहाँ इस चट्टान पर आकर तप करने बैठ गए। नामर्दी दूर करने के लिए तप। बैठे रहे, बैठे रहे, बरसों तप पर बैठे रहे। बरसों के तप के बाद एक श्रावण की पूर्णिमा को अचानक यहाँ ये पत्थर की दो हौदें प्रकट हुईं और साथ ही आसपास चारों तरफ़ अगन फूल के पौधे अपने आप ही उग आए। उसके बाद आकाशवाणी हुई ‘‘श्रावण पूर्णिमा की रात को जब आसमान पर पूरा चाँद खिला हो, तब नामर्द पुरुष अपने हाथों से पास से बहती कमानी नदी से पानी ला-लाकर इन हौदों को भरे। फिर चाँद के महीनों के दिनों बराबर संख्या अर्थात तीस अगन फूल के पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर लाए और उनको धोकर अच्छी तरह से पीस ले। लेप बना ले उनका। इसके बाद लेप को चार हिस्से कर ले बराबर-बराबर। दो हिस्सों को एक-एक करके दोनों हौदों में घोल दे। बचे हुए दो हिस्सों में से एक हिस्सा पूरी तरह से नग्न होकर अपने पूरे शरीर पर लगा ले। चौथे और अंतिम हिस्से को किसी अक्षत यौवना वन कन्या के शरीर पर अपने हाथों से लगाए। यह सारा काम उसे स्वयं ही करना है, किसी की मदद इसमें नहीं लेना है। उसके बाद दोनों मिलकर पत्थर का चूल्हा बना कर आग जलाएँ और उस आग पर तीतर का माँस पकाएँ। वन कन्या पकाए और पुरुष चूल्हे की आग का सेंक ले। पकने के बाद दोनों आधा-आधा बाँटकर वहीं आग के पास बैठकर खाएँ। खाने के बाद दोनों अलग-अलग हौदों में बैठ जाएँ। चंद्रमा की किरणों, तीतर का माँस और अगन फूल के रस से पुरुष के शरीर में धीरे-धीरे पुरुषत्व पैदा होना शुरू होगा। जब उसके शरीर में पूर्ण पुरुषत्व आ जाए, तो वह उठकर जाए और दूसरी हौद में बैठी वन कन्या के साथ रमण करे। उसकी नपुंसकता हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। उसकी उम्र भले ही कुछ भी हो, वह रमण के लिए नौजवान हो जाएगा।’’ साधु ने उसी रात आकाशवाणी में बताए अनुसार सब कुछ किया और उसी रात पूर्ण पुरुष बन कर अपने आश्रम लौट गया। तब से ये दोनों पत्थर की हौदें यहीं हैं। और ये अगन फूल के पौधे भी आसपास तभी से लगे हुए हैं।
कहानी सुनकर राकेश सक्सेना कुछ देर तक ख़ामोश रहे थे फिर बोले थे ‘‘क्या मूर्खतापूर्ण कहानी है...? ऐसा भी होता है कहीं...?’’
मोन्या चुप हो गया था सुनकर। मैं हैरत से पत्थर की उन हौदों को देख रहा था कि कहाँ छिपी थीं ये अब तक?
‘‘ये अगन फूल को पौधा कौन सा है, बताओ ज़रा।’’ कुछ देर की ख़ामोशी के बाद कहा था राकेश सक्सेना ने।
उनके कहते ही मोन्या उठकर चला गया था। कुछ देर बाद लौटा, तो उसके हाथ में एक टहनी थी, जिसमें कुछ फूल खिले हुए थे। आग की लपटों के समान फूल। लाल, पीले, नारंगी फूल। उनकी आकृति भी आग की लपट जैसी ही थी। पंखुड़ियाँ लपटों के समान मुड़ी हुई थीं जगह-जगह से। अंदर के पराग तंतु इस फूल में उल्टे थे, सारे फूलों में बाहर पंखुड़ियाँ और अंदर पराग तंतु होते हैं, इसमें बाहर तंतु और अंदर पंखुरियाँ थीं। दूर से देखने में ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने लकड़ियाँ इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी है। अगन फूल, शायद इसी कारण इसका नाम अगन फूल था।
‘‘ये.....? ये तो ग्लोरियोसा लिली है। ग्लोरियोसा सुपर्बा। ये अफ्रीका के जंगलों का पौधा है, हमारे देश में भी कहीं-कहीं मिलता है... लेकिन ये यहाँ ? स्ट्रेंज़... आजकल नर्सरी वाले इसे बेचते हैं हमारे यहाँ, लेकिन यहाँ जंगल में लाकर किसने लगाया इसको।’’ राकेश सक्सेना टहनी हाथ में लेकर अचरज में डूब गए थे।
‘‘यहाँ तो बरसात शुरू होते ही इतने इलाक़े में अपने आप इसके पौधे उगने लगते हैं। सावन लगते तक तो इसमें फूल भी आ जाते हैं। बरसात ख़त्म होते ही पौधा भी ख़ुद ही ख़त्म हो जाता है। अगली बरसात में फिर उसी जगह से फूट आता है।’’ मोन्या ने राकेश सक्सेना को हैरत में डूबा देखकर कहा था।
‘‘ये लिली है, बल्ब से निकलती है। बरसात ख़त्म होते ही पौधा सूख जाता है और बल्ब ज़मीन में ही रह जाता है। अगली बरसात में फिर फूट निकलता है। इसकी मेडिसनल वेल्यू तो है, बहुत सी दवाएँ बनती हैं इसकी जड़ से। और हाँ यह पेड़ और इसके फूल तो ज़हरीले होते हैं, बहुत ज़हरीले। कुछ इलाक़ों में इस झगरा फूल भी कहते हैं, कहा जाता है कि इसके फूलों को जिसक घर रख दो उसके घर झगड़ा शुरू हो जाता है, इसीलिए इसे झगरा फूल कहते हैं। लेकिन ये कहानी....। यह तो बहुत अजीब कहानी है। यहाँ कितने इलाक़े में खिलता है ये?’’ राकेश सक्सेना ने उत्तर भी दिया और प्रश्न भी किया था।

     ‘‘बस पहाड़ी के इस तरफ़, इन होदों के चारों तरफ़ आधा-आधा कोस में ही मिलता है ये, उसके बाद इसका नाम-निशान भी नहीं है।’’ मोन्या ने उत्तर दिया था।
‘‘तुमने जो कहानी सुनाई उसमें जो करने को कहा गया है, वह तो कोई भी कर लेगा और ऐसे में दुनिया में कोई नामर्द ही नहीं रहेगा।’’ राकेश सक्सेना ने कुछ झुँझलाहट भरे स्वर में कहा था।
‘‘नहीं कर सकता साहब जी। एक तो ये अगन फूल बस महीने दो महीने ही खिलता है बरसात में। और दूसरा ये कि ऐसा होना भी बहुत मुश्किल होता है कि सावन की पूनम को आसमान पर चाँद पूरा खिला हो। बरसात में ऐसा होना नसीब की बात होती है।’’ मोन्या ने अदब के साथ उत्तर दिया था।
राकेश सक्सेना हाथ में अगन फूल उर्फ़ ग्लोरियोसा सुपर्बा लिली की टहनी लिए अचरज में डूबे थे और मैं उर्फ़ पीताम्बर गुदेनिया उसे अचरज के अचरज में डूबा था।
‘‘बड़े-बुज़ुर्ग बताते हैं कि पहले नवाब और फिर अंग्रेज़ों में से बमुश्किल एक-दो की ही क़िस्मत से चाँद की पूरी पूनम मिल पाई थी यहाँ। ये रेस्ट हाउस यहाँ बनाया ही इन होदों के कारण गया था। पहले नवाब के समय यहाँ एक झोंपड़ी-सी थी, किसी अंग्रेज़ को इन होदों के बारे में पता चला, तो उसने यहाँ ये रेस्ट हाउस बनवा दिया था। नवाबों के समय नवाब और अंग्रेज़ों के समय अंग्रेज़ यहाँ हर साल सावन की पूनम पर अकेले आते थे। एक आदिवासी लड़की भी उस रात रेस्ट हाउस में बुलाई जाती थी। बुज़ुर्ग बताते हैं कि चार-पाँच साल मे एकाध बार किसीको क़िस्मत से चाँद की रात मिल पाती थी। नहीं तो कभी-कभी तो यह भी होता था कि मूसलाधार बरसात होती रहती थी और चढ़ी हुई नदी में पत्थर की होदें भी डूबी रहती थीं।’’ मोन्या की आवाज़ गहरे रहस्य से भरी थी।
‘‘तीतर के माँस के बारे में तो कहा जाता है कि उसमें पुरुषत्व बढ़ाने की तासीर होती है और ग्लोरियोसा लिली की जड़ें भी दवाई के काम आती हैं, इन फ़ैक्ट इट इज़ ए मेडिसनल प्लांट.... मगर ये सब.....!’’ राकेश सक्सेना की आवाज़ में अभी भी अचरज घुला हुआ था।
शाम अब गहरा गई थी। राकेश सक्सेना उठकर एक बार उन पत्थर की होदों के पास गए थे। उन पर हाथ फेरते रहे। देर तक हाथ फेरते रहे थे। उनके जैसे व्यक्ति के पास बहुत से अनुत्तरित सवाल थे उस दिन।
फिर हम वापस रेस्ट हाउस आ गए थे। मोन्या की बेरा-मानस ने बहुत अच्छा खाना बनाया था। हमने खाया और छककर खाया था। रेस्ट हाउस से चलते समय राकेश सक्सेना ने मोन्या और उसकी पत्नी दोनों को ईनाम में पैसे दिए थे। फिर हम लौट आए थे उस रहस्य को साथ लेकर।
उसके बाद समय की तेज़ हवा ने बीच के आठ-नौ बरसों को अपने साथ तिनके की तरह उड़ा दिया। सब कुछ विस्मृत हो गया पीताम्बर गुदेनिया को। मैं एक साल पहले रिटायर हो चुका हूँ।
मैं पीताम्बर गुदेनिया अब उस फ़्लैश बैक से वापस आ चुका हूँ। कार अब रात के अँधेरे को चीरते हुए सड़क पर दौड़ी जा रही है। कुछ ही देर में डोडी रेस्ट हाउस का जोड़ आने वाला है। पीताम्बर गुदेनिया ने आसमान में खिले पूरे चाँद को देखा, तो उसे याद आया कि ढलती उम्र और डायबिटीज़ के कारण वह भी तो धीरे-धीरे......। एक-दो बार कोशिश भी की थी, तो असफलता हाथ लगी थी। शर्मिंदगी और लिहाफ़ को चेहरे पर ओढ़कर चुपचाप करवट करके सोना पड़ा था। आज ये श्रावण पूर्णिमा का चाँद उसकी क़िस्मत से ही तो नहीं खिला है?
‘‘सुनो दिनेश.... थोड़ा आगे चलेंगे तो लेफ़्ट पर एक बोर्ड आएगा डोडी रेस्ट हाउस का, उस तरफ़ मोड़ लेना। रेस्ट हाउस होते हुए चलते हैं।’’ मैंने अपने ड्रायवर दिनेश से कहा। उसने सिर हिला कर स्वीकृति प्रदान कर दी। ट्रेवल्स में दिनेश मेरा फेवरेट ड्रायवर है, कहीं भी जाना होता है तो ट्रेवल्स के मालिक को पता होता है कि गुदेनिया साहब केवल दिनेश को ही लेकर जाएँगे।
कुछ ही देर में कार मुख्य मार्ग को छोड़कर डोडी रेस्ट हाउस की कच्ची-पक्की सड़क पर दौड़ रही थी। मेरे अंदर जाने क्या-क्या ठाठें मार रहा था। क्या सचमुच यह हो सकता है ? साठ-बासठ की उमर में भी क्या यह होना संभव है? यदि हो जाए तो..!
अचानक रुक गई कार के कारण उत्सुकता की एक लहर किनारे से टकरा कर बिखर गई।
‘‘क्या हुआ ?’’ मैंने पूछा।
‘‘टायर पंचर हो गया है साहब। बस ज़रा देर में बदल देता हूँ। आप बैठे रहिए कार में, उतरिए मत।’’ कहता हुआ दिनेश कार का हेंड ब्रेक खींच कर नीचे उतर गया।
दिनेश के उतरने के बाद मैं आसमान में खिले चाँद को कार के काँच से देखने लगा। सड़क के किनारे अगन फूल के पौधे दिखाई दे रहे थे। हवा में धीरे-धीरे हिलते हुए।
काफी देर बाद भी जब टायर खुलने की आवाज़ नहीं आई तो मैं नीचे उतर गया। दिनेश असमंजस में खड़ा था डिक्की खोलकर।
‘‘क्या हो गया अब ?’’ मैंने पूछा।
‘‘साहब डिक्की में जैक नहीं है, शायद ट्रेवल्स की किसी दूसरी गाड़ी के ड्रायवर ने निकाल लिया और वापस नहीं रखा।’’ दिनेश ने कुछ झिझकते हुए कहा।
‘‘अब...?’’ मैं असहज हो गया।
‘‘करता हूँ कुछ व्यवस्था, माँगता हूँ किसी से।’’ दिनेश ने उत्तर दिया।
‘‘यहाँ...? यहाँ किससे माँगोगे ?’’ मैंने कुछ झुँझलाते हुए पूछा। उत्तर दिया दूसरी तरफ़ मतलब रेस्ट हाउस की तरफ़ से आ रही किसी कार की हैड लाइट ने।
कार पास आई तो दिनेश ने लगभग सड़क पर खड़े होकर उसे रुकने का इशारा किया। कार रुक गई। उस कार में बस एक आदमी ही था, जो गाड़ी चला रहा था। दिनेश ने अपनी परेशानी बताई तो उसने कार साइड में लगाकर रोक दी। डिक्की से जैक निकाल कर वह दिनेश की मदद करने लगा। वह भी ड्रायवर ही है शायद। गाड़ी भी किसी ट्रेवल्स की ही गाड़ी थी। गाड़ी की नंबर प्लेट से तीन जानकारियाँ मिल रही थीं, पहली ये कि गाड़ी प्राइवेट है सरकारी नहीं, दूसरी ये कि गाड़ी टैक्सी कोटे की है और तीसरी ये कि गाड़ी भोपाल की है। अब मेरे मन में कुलबुलाहट होने लगी थी, कौन है ये और कहाँ से आ रहा है ?
‘‘इतनी रात को कहाँ से आ रहे हो भाई ?’’ मैंने उसकी टोह लेते हुए पूछा। उत्तर मिलने की संभावना कम ही थी। ट्रेवल्स के ड्रायवर इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर नहीं देते हैं। उनको सिखाया जाता है कि अपनी पार्टी के बारे में कोई भी जानकारी किसी को न दें। कहाँ से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, यह भी किसी को नहीं बताया जाए।
‘‘रेस्ट हाउस तक गया था साहब।’’ उसने उत्तर दिया।
‘‘तो इतनी रात को वापस क्यों जा रहे हो, वहीं रुक जाते ?’’ मैंने और टोह ली। सीधे बात पर आ गया, तो फिर यह कुछ भी जवाब नहीं देगा।
‘‘किसी काम से जा रहा हूँ।’’ उसने उत्तर दिया। पक्का झूठ बोल रहा है, किसी काम से नहीं जा रहा है, साहब को रेस्ट हाउस पर छोड़कर वापस जा रहा है, सुबह लेने आएगा। रात को वहाँ नवाब भी अकेले ही रुकते थे और अंग्रेज़ भी। जो करना है वह अकेले को ही तो करना है।
‘‘भोपाल जा रहे हो वापस ?’’ मैंने पूछा।
‘‘जी साहब।’’ उसने बहुत ही संक्षिप्त-सा उत्तर दिया और टायर बदलने में व्यस्त हो गया। मानों बातचीत को विराम देना चाहता हो। मेरी उत्सुकता अब नाम जानने में बढ़ गई थी। उत्सुकता या शायद अकुलाहट। मुझे लगा कि अब एक तुक्का लगाना ही पड़ेगा, नहीं लगाया तो दिक़्क़त हो जाएगी, या तो मुझे या किसी और को। अगला प्रश्न पूछने के लिए बहुत ज़्यादा आत्मविश्वास की आवश्यकता थी। इस प्रकार पूछना था कि वह पूछना नहीं लगे, बल्कि यूँ लगे कि मुझे तो पता ही है ये।
‘‘राकेश सक्सेना जी को लाए हो भोपाल से?’’ मैंने बहुत आत्मविश्वास अपने आवाज़ में भरते हुए अँधेरे में तीर छोड़ा। तीर निशाने पर लगा। उसने आश्चर्य से पलट कर मुझे देखा और फिर रहस्यमय तरीक़े से मुस्कुराते हुए सिर को स्वीकारोक्ति में हिलाया और मुड़कर टायर में लग गया। काटो तो ख़ून नहीं, शायद यही मुहावरा अब मेरे लिए प्रयोग किया जा सकता है या शायद हाथों के तोते उड़ना।
कुछ देर बाद वो उठा और जैक अपनी डिक्की में रखकर, कार स्टार्ट करके चला गया।
‘‘चलिए सर बैठिए।’’ दिनेश ने मुझे असमंजस में खड़ा देखा तो बोला। मैं अकबकाया-सा डोडी रेस्ट हाउस की दिशा में देखे जा रहा था।
‘‘हाँ.... पहले गाड़ी मोड़ लो।’’ मैंने कहा।
‘‘मोड़ लूँ ? पर आप तो रेस्ट हाउस जा रहे थे न ?’’ दिनेश ने उलझन भरे स्वर में पूछा।
‘‘नहीं... अब नहीं चलना वहाँ। आज का यह चाँद किसी और के नसीब में लिखा है।’’ दूसरा वाक्य मैंने बुदबुदाते हुए अपने आप से ही कहा। दिनेश कुछ नहीं समझा और कार में बैठ गया। मैंने सड़क के किनारे लगे एक अगन फूल के पौधे से कुछ फूल तोड़ लिए।
जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहाँ से खिली हुई चाँदनी में दूर डोडी का रेस्ट हाउस एक धब्बे की तरह दिखाई दे रहा है। और मुझे दिखाई दे रहा है एक अधेड़ बूढ़ा, जो हाँफते हुए, थके क़दमों से, पहाड़ी नदी से बाल्टियों में भर-भर कर पानी ला रहा है, लाता जा रहा है होदों को भरने के लिए। होदों के पास रखे हैं कुछ ताज़ा कटे हुए तीतर और अगन फूल के पौधे। जिस पत्थर पर राकेश सक्सेना बैठे थे उस दिन, उस पत्थर पर एक आदिवासी कन्या बैठी है, बैठी है निर्वसन होकर। चाँदनी के कारण उसका काला शरीर साँप की तरह चमक रहा है। और चमक रही हैं उसकी आँखें, उदास-उदास आँखें। वह चुपचाप बैठी बूढ़े को पानी लाते और वापस नदी की ओर जाते देख रही है।
मेरी कार मुड़ गई है और अब पीताम्बर गुदेनिया कार में बैठा वापस जा रहा है हाइवे की तरफ़। पीताम्बर गुदेनिया के दिमाग़ में गूँज रहा है मोन्या का वाक्य ‘‘चार-पाँच साल में एकाध बार किसी की क़िस्मत से चाँद की रात मिल पाती थी।’’
कार हाइवे पर आ गई है और पीताम्बर गुदेनिया सोच रहा है कि नवाबों से अंग्रेज़ और अंग्रेज़ों से अफ़सर, ये चाँद रातें केवल इन्हीं लोगों के हिस्से में क्यों लिखी हुई हैं। क्या कभी कोई आम आदमी उन पत्थर की होदों में चाँद रात गुज़ार पाएगा? कार हाइवे पर पूरी रफ़्तार से दौड़ रही है। पीताम्बर गुदेनिया को अब नींद आ रही है, वह गोद में रखे अगन फूलों को सहलाते हुए धीरे-धीरे , धीरे-धीरे नींद के आग़ोश में बढ़ रहा है।

वेताल का जीवन कितना एकाकी..... (कहानी : पंकज सुबीर)

वेताल का जीवन कितना एकाकी.....
(कहानी : पंकज सुबीर)
("बहुवचन" के कहानी विशेषांक में प्रकाशित कहानी)

वह लगभग बूढ़ा आज भी उसी जगह पर बैठा है। गर्मी की उतरती हुई उदास शाम में किसी भूरे पत्थर से बनाए हुए स्टेचू की तरह स्थिर बैठा है। तालाब का वह किनारा जहाँ पानी हवा के थपेड़ों से समुद्र की लहरों की तरह आ-आकर किनारे को छूता है। ठीक वहीं। तालाब के किनारे एक पगडंडी जैसी कच्ची-पक्की सड़क है। जो सुबह शाम तालाब के किनारे घूमने के लिए बनाई गई है। यह पगडंडी तालाब के किनारे-किनारे साँप की तरह लहर खाकर गई है। दूर पहाड़ की तलहटी में जाकर आँखों से ओझल हो जाती है। पगडंडियों का दूसरा सिरा अक्सर कहीं नहीं होता। वे किसी धुँए की तरह हवा में घुल जाती हैं। पगडंडी के एक तरफ़ तालाब है और दूसरी तरफ़ पेड़ों की कतार है। इन पेड़ों के नीचे कहीं-कहीं कुछ सीमेंट की बेंचें बनी हुई हैं। यह कतार भी पगडंडी का सिरा पकड़ कर पहाड़ तक चली गई है। इस कतार में तरह-तरह के पेड़ हैं। आम, अमलतास, गुलामोहर, शिरीष, अशोक और कुछ अलग-अलग रंगों के फूलों के भी पेड़ हैं। कुछ लगाए गए हैं और कुछ बरसों पुराने हैं। एक पेड़ में लगे हुए फूल सूख कर लकड़ी बन जाते हैं और गिर पड़ते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी ने नक़्क़ाशी कर के लकड़ी के फूल बनाए हों। ज़मीन पर इस प्रकार के बहुत से फूल बिखरे हुए हैं, पाँच पंखुड़ियों वाले लकड़ी के फूल। बच्चे इन्हें बीन कर ले जाते हैं और अलग-अलग रंगों से रँग कर घर में सजा देते हैं। कभी न मुरझाने वाले फूल बना देते हैं इनको। बचपन में संदीप ने भी ख़ूब इकट्ठे किए हैं ये फूल। शाम होते ही तालाब के किनारे दौड़ पड़ता था इन्हें बीनने।
उसी लकड़ी वाले फूल के पेड़ के नीचे उस बूढ़े की स्थाई बैठक है। वह बेंच पर नहीं बैठता, ज़मीन से उभरी हुई पेड़ की जड़ों के बीच बैठने की जगह उसने अपनी बना रखी है। जड़ों पर अधलेटा होकर बैठा रहता है वह। जहाँ वह बैठता है वहाँ से तालाब, उसके पीछे का पहाड़ और किनारे-किनारे जाती पगडंडी, पेड़ों की कतारें, सब किसी लैंडस्केप की तरह दिखाई देता है। गर्मी की उतरती हुई शाम में सड़क से खड़े होकर देखने पर यह पूरा लैंडस्केप बहुत उदास रंगों से रँगा हुआ केनवास दिखाई देता है। हल्के और भूरे रंगों से रँगा हुआ। वह बूढ़ा भी उन रंगों में समाया हुआ ही लगता है। उसके कपड़े भी अक्सर मिट्टी के रंग के, पत्थर के रंग के, पेड़ों के तने या जड़ों के रंग के ही होते हैं। उसका चेहरा भी मिट्टी के रंग का ही है, मिट्टी में गड़ी हुई, उभरी हुई पेड़ की जड़ों जैसा। इसीलिए वो बूढ़ा इस पूरे दृश्य में मर्ज हो जाता है, बिना कोई अतिरिक्त प्रभाव के। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे वहाँ बूढ़ा न होकर पेड़ की कुछ ज़्यादा उभरी हुई जड़ है कोई। या फिर भूरी मिट्टी का बना हुआ डूह है कोई। रंग और स्थिरता के कारण ऐसा लगता है। गिरगिट की तरह वह बूढ़ा अपने आस-पास की चीज़ों के जैसा अपने आप को कर लेता है। मानों वह भी गिरगिट की तरह छिपना चाहता हो, कि कोई उसे देख नहीं ले। और सचमुच अब हो भी ऐसा ही गया है, वहाँ आने-जाने वालों, वहाँ से गुज़रने वालों, किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वह बूढ़ा वहाँ पर बैठा है। वह निस्पृह-सा बैठा रहता है और पेड़ पर लकड़ी के फूल टूट-टूटकर उसके आस पास बिखरते रहते हैं। उन सूखे हुए फूलों के बीच बैठा वह सूखा हुआ बूढ़ा ऐसा लगता है जैसे अज़ल से इसी प्रकार बैठा हुआ है और न जाने कब तक ऐसे ही बैठा रहेगा।
संदीप चूँकि जानता है कि वह बूढ़ा वहाँ पर है, इसलिए उसे वहाँ बूढ़े की आकृति दिखाई दे रही है। संदीप पगडंडी के इस तरफ़ तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठा है तालाब के पानी में पैर डाल कर। बूढ़े के बारे में जो कुछ उसे पता है वह ये है कि ये बूढ़ा कुछ पागल है। अजीब-अजीब सी बातें करता है। संदीप ने तो नहीं की बातें; लेकिन जिन लोगों ने की हैं, उनका कहना है कि बूढ़े की बातें बेसिर-पैर की होती हैं। बातें करते समय जाने कहाँ-कहाँ के संदर्भों पर बातें करने लग जाता है। इन संदर्भों के बारे में बातें करते-करते वो आक्रामक भी हो जाता है। ग़ुस्सा हो जाता है एकदम। ऐसा लगता है जैसे अभी हाथापाई पर ही उतर आएगा। अक्सर मूल बात को छोड़ कर उन संदर्भों पर ही इस प्रकार बातें करने लगता है, मानों मूल चर्चा यही चल रही थी। जाने कौन-कौन से नाम लेता है, जगहों के, व्यक्तियों के, वस्तुओं के। कुछ नाम तो समझ में आते हैं, लेकिन कुछ तो बिल्कुल किसी अन्य भाषा के ही लगते हैं। ऐसी जगह जिसके बारे में पहले कभी सुना ही नहीं गया हो।
संदीप का दोस्त रवि एक बार आधे घंटे तक बूढ़े के पास बैठ कर आया था। आया, तो हैरान-परेशान आया था। जो भी एक बार उससे बात कर लेता है, वो दूसरी बार बूढ़े से बात करने की कोशिश भी नहीं करता। बूढ़ा भी अपनी तरफ़ से ऐसी कोई कोशिश नहीं करता है। उसे तो वैसे भी दुनिया से कोई मतलब है ही नहीं शायद। कोई आए, कोई जाए, उस बूढ़े को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। बस वह उसी प्रकार बैठा अपने आप में खोया रहता है। किसी से उसकी आँखें तक नहीं मिलती हैं, मुस्कुराना या दूसरा भाव व्यक्त करना तो फिर भी बहुत दूर की बात है। संदीप ख़ुद भी यहाँ नियमित शाम को टहलने आता है, लेकिन उसे याद नहीं कि बूढ़े से उसकी कभी नज़रें मिली हों। बूढ़ा वहाँ पर रहकर भी अनुपस्थित ही रहता है। एक-दो बार संदीप ने आते-जाते नज़र मिलाने की कोशिश की, लेकिन बूढ़े की आँखें कहाँ देख रही हैं, ये संदीप को समझ ही नहीं आया। किसी भी एंगल में खड़े हो जाओ, बूढ़े की आँखों से आँखें मिलती ही नहीं हैं। बूढ़ा गिरगिट की तरह भौतिक रूप से अदृश्य रहने के साथ-साथ हर तरह से अदृश्य रहने की कोशिश करता है। संदीप का मन कई बार होता है कि वह जाकर उस बूढ़े के पास बैठे, उससे बातें करे, लेकिन रवि के अनुभव सुनने के बाद डर रहता है। वैसे भी संदीप ख़ुद ही बहुत इण्ट्रोवर्ट है, बस अपने आप में ही खोया रहने वाला। ऐसे में दोनों एक समान ही हो जाएँगे, तो बातें क्या करेंगे। मगर फिर भी वहाँ लकड़ी के फूलों वाले पेड़ के नीचे बैठा हुआ वह बूढ़ा, संदीप के लिए वह दरवाज़ा है, जिस पर साफ लिखा है कि इस दरवाज़े को खोलना मना है और चूँकि यह लिखा है इसलिए ही संदीप का मन सबसे ज़्यादा उत्सुक होता है इस दरवाज़े को खोलने के लिए।
बूढ़ा शाम का झुटपुटा होते ही यहाँ आ जाता है। पैदल आता है। धीरे-धीरे टहलता हुआ आता है। कंधे पर झोला लटकाए। ठंड के दिनों में एक लम्बा ओवरकोट, सर पर ऊनी टोप और गले में मफलर डाले हुए आता है। बरसात में रेनकोट पहने, छतरी लगाए आता है। कोई भी मौसम हो आता ज़रूर है। आता है और चुपचाप जड़ों पर बैठ जाता है। वहाँ बैठ कर दूर तालाब के पीछे डूबते हुए सूरज को देखता है। देखता रहता है। सूरज का डूबना ही वो घटना है, जिसके बारे में कह सकते हैं कि बूढ़ा इसको देखता है। बाकायदा देखता है। वरना तो तालाब के किनारे क्या हो रहा है ? कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, वह आँख उठा कर भी नहीं देखता। लगभग एक घंटे का समय उसी प्रकार वहाँ बैठ कर व्यतीत करता है और फिर उठ कर उसी प्रकार मंथर गति से चलता हुआ पगडंडी से सड़क पर आता है, सड़क पर धीमे-धीमे चलता हुआ विलीन हो जाता है दिशा के धुँधलके में। रहस्य के कुहासे में खो जाता है अगले दिन तक के लिए।
संदीप ने एक नज़र लकड़ी के फूल के पेड़ की तरफ़ देखा, बूढ़ा अपने साथ लाए हुए झोले में से कुछ निकाल रहा है। कपड़े का यह झोला भी जब जड़ों पर रखा होता है, तो जड़ ही हो जाता है। बूढ़ा झोले में से कोई किताब निकाल रहा है। नहीं किताब नहीं है, शायद कोई पत्रिका है। पेड़ के नीचे जो हल्के-भूरे रंग का स्थाई साम्राज्य है उसमें झोले से अचानक निकाली गई यह रंग-बिरंगी पत्रिका किसी कौतुक की तरह आई है। बूढ़ा अब उस पत्रिका को पलट रहा है। यहाँ से देखने पर ऐसा लग रहा है कि वो पढ़ नहीं रहा है पत्रिका को, बस देख रहा है। किसी-किसी पन्ने पर हाथ भी फेर रहा है।
संदीप ने चारों तरफ़ देखा, आज अपेक्षाकृत कम लोग हैं तालाब के किनारे। बस वह बूढ़ा है, संदीप है और कुछ बच्चे हैं जो पेड़ों के पीछे छोटे से मैदान में फुटबाल खेल रहे हैं। इक्का-दुक्का लोग हैं जो आ-जा रहे हैं, लेकिन रुक नहीं रहे हैं। आज सीमेंट की बेंचें भी सारी ख़ाली पड़ी हैं। तालाब का यह किनारा अब कुछ महीनों तक ऐसे ही रहेगा, गर्मी के बीतते ही बरसात आ जाएगी। आने वालों की संख्या और कम हो जाएगी। फिर ठंड का मौसम आते ही तालाब का किनारा एक बार फिर गुलज़ार हो उठेगा। गर्मी आते ही लोग शाम की बजाय सुबह टहलना शुरू कर देते हैं। गर्मी की उमस भरी शाम में अपने-अपने वातानुकूलित घरों से निकलना किसे अच्छा लगता है ? आज तो आने वालों की संख्या और भी कम है। छुट्टियाँ होने के कारण शायद लोग यात्राओं पर भी निकल गए हैं। संदीप ने आस-पास देखा और कुछ देर तक सोचता रहा। फिर कुछ सोचता हुआ वहाँ से एकदम उठ गया और लकड़ी के फूल वाले पेड़ की तरफ़ बढ़ गया।
जब संदीप वहाँ पास पहुँचा तो बूढ़ा पत्रिका को देख कर वापस झोले में रख रहा था। इतनी सावधानी के साथ रख रहा था कि जैसे वह पत्रिका कोई ज़िंदा वस्तु है जिसे चोट लग सकती है। पत्रिका को सँभाल कर झोले में रखने के बाद बूढ़े ने झोले पर लगे बड़े-बड़े दोनों बटन लगा कर उसे बंद कर दिया। संदीप एकदम पास खड़ा था लेकिन बूढ़े ने मानों उसे देखा ही नहीं था। पेड़ की जड़ों पर ही बैठी हुई दो गिलहरियाँ संदीप की उपस्थिति को भाँप कर सजग हो गई थीं। ये गिलहरियाँ बूढ़े की उपस्थिति में बिल्कुल आराम से जड़ों पर फुदक रही थीं, मगर संदीप के आते ही दोनों हाथ हवा में उठा कर, कानों को सीधा खड़ा किए, नथुनों को फड़फड़ाते हुए आसन्न ख़तरे को भाँप रही थीं। कुछ देर तक संदीप को देखते रहने के बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा फिर फुदकती हुई भागीं। संदीप ने देखा कि वो दोनो गिलहरियाँ बूढ़े के ऊपर चढ़ कर फुदकती हुई दौड़ीं और बूढ़े के सिर पर से छलांग लगा कर पेड़ पर कूद कर सरपट ऊपर चढ़ गईं। बूढ़े पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा। जैसे बूढ़े और गिलहरियों दोनों के लिए यह रोज़मर्रा की आम बात हो।
संदीप को पास आकर लगा कि बूढ़ा उतना भी बूढ़ा नहीं है जितना दूर से दिखाई देता है। अधिक से अधिक साठ साल का है वो। वो कपड़े जो दूर से देखने पर मटमैले, गंदे दिखाई देते हैं, वो असल में वैसे हैं नहीं, बस उनके रंग ही वैसे हैं। बूढ़े का चेहरा धूप खाया हुआ चेहरा है।
‘‘नमस्ते अंकल.....।’’ संदीप ने जब बूढ़े की ओर से उसके आने पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आते देखी तो वह ख़ुद ही बोल पड़ा।
उत्तर में बूढ़े ने कुछ नहीं कहा, बस एक बार नज़र उठा कर संदीप की तरफ़ देखा। देखा भी आँखों में नहीं, बस यह देखा कि कौन है। बूढ़े की नज़रें संदीप के पैरों से चलती हुई बस आँखों के ठीक पहले आकर रुक गईं और लौट भी गईं। संदीप ने देखा कि बूढ़े की गर्दन बस एक बार हिली, मानों यही संदीप के अभिवादन का उत्तर हो।
‘‘मैं यहाँ आपके पास बैठ जाऊँ अंकल ?’’ संदीप ने कोई उत्तर नहीं आते देख अपनी तरफ़ से भरसक आवाज़ में नरमी रखते हुए पूछा। उत्तर में बूढ़े ने उस दिशा में एक उचटती-सी दृष्टि डाली जिस दिशा में संदीप खड़ा था। उस दिशा में, संदीप पर नहीं। फिर उसने अपना झोला जो पास ही एक जड़ पर रखा था, उठा कर अपनी गोद में रख लिया। संदीप को लगा कि यही संकेत है इस बात का कि बैठ जाओ। संदीप झोले को हटाने से ख़ाली हुए स्थान पर जाकर बैठ गया।
बैठने के बाद एक बार फिर मौन छा गया। संदीप ने बूढ़े को एकदम से पास से देखा। वह चुप बैठा बस बूढ़े को देखता रहा। देखता रहा या शायद ऑब्ज़र्व करता रहा। दो मिनट, पाँच मिनट, दस मिनट, समय बीतता रहा और संदीप वहाँ बैठा बूढ़े को समझने की कोशिश करता रहा। इससे पहले कि कोई बात शुरू करे, कम से कम समझ में तो आए कि बात किससे करनी है। उस पर बूढ़े को लेकर जो बातें उसके दिमाग़ में पहले से हैं, उनके चलते वह बात शुरू करने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहा है। उसने देखा कि बूढ़ा न कुछ देखता है, न सुनता है, उसकी आँखें किसी भी दृश्य को देखती नहीं हैं। बूढ़ा शायद किसी भी दृश्य को देखना ही नहीं चाहता है। उसके कान किसी भी ध्वनि को सुनते नहीं हैं। संदीप ने देखा कि बूढ़े की आँखें इतनी अभ्यस्त हैं कि वह सब कुछ देख ही नहीं रही हैं, जो बूढ़ा देखना नहीं चाहता। एक दो बार बच्चों की फुटबाल वहाँ आई, बच्चे उसे उठाने आए, संदीप ने वह सब देखा लेकिन बूढ़े की आँखों के लिए उस दृश्य को देखने का आदेश शायद बूढ़े की तरफ़ से नहीं आया था, इसलिए आँखों ने वह सब कुछ नहीं देखा। फुटबाल जब एकदम पास आकर धप्प से गिरी थी तो संदीप के कानों ने एकदम उस ध्वनि को सुनकर उसे सचेत किया, लेकिन बूढ़े के कानों ने ऐसा कुछ नहीं किया। कितनी अच्छी अवस्था है न ये, कि आपकी इंद्रियाँ केवल वही ग्राह्य करें, जो आप करना चाहते हैं। बाक़ी सब कुछ जो हो रहा है, चल रहा है, उससे आपकी इंद्रियाँ निस्पृह बनी रहें। कितने अभ्यास से किया होगा बूढ़े ने यह सब कुछ।
‘‘मेरा नाम संदीप है अंकल....।’’ संदीप को लगा कि बहुत देर हो गई है कहीं से बातचीत का कोई सिरा तो पकड़ना ही होगा इसलिए उसने बूढ़े की ओर देखते हुए कहा। संदीप को यह वाक्य मानों किसी ख़ला में जाकर बिला गया। बूढ़े के कानों ने उस पूरे वाक्य को इग्नोर कर दिया। वे पाँच शब्द जो उस वाक्य में थे, ब्लैक होल में समा कर नष्ट हो गए। कोई दृश्य बने और उसे देखा ही न जाए, कोई शब्द उत्पन्न हो और उसे सुना ही न जाए, तो कितना व्यर्थ होता है इनका उत्पन्न होना। बूढ़ा पहले की ही तरह बस हवा को देख रहा था। संदीप को चिढ़ सी हुई उस बूढ़े पर, ऐसा भी क्या वीतरागीपन कि कोई आपके ठीक पास आकर बैठा है, आपसे बातें कर रहा है और आप उस पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।
‘‘वॉकर.... क्रिस्टोफर किट वॉकर....।’’ बूढ़े की ही आवाज़ थी यह। मगर इतनी अस्पष्ट थी कि संदीप को सुनने के लिए पूरा ध्यान लगाना पड़ा। क्रिस्टोफर वॉकर....? बूढ़ा कहीं से भी विदेशी तो नहीं दिख रहा। यदि क्रिश्चयन भी है तो भी यहाँ भारत में क्रिश्चियंस के नाम इस प्रकार के नहीं होते हैं। यह नाम तो स्पेनिश या स्वीडिश अधिक लग रहा है। नाम और बूढ़े में कोई तालमेल ही नहीं दिखाई दे रहा है। मगर यह नाम कुछ सुना हुआ सा लग रहा है संदीप को। संदीप ने अपने दिमाग़ पर ज़ोर डाला कि कहाँ सुना है इस नाम को, मगर एकदम से कुछ याद नहीं आया कि यह नाम उसने कहाँ सुना या पढ़ा है। नाम की ध्वनि उसे बहुत सुनी हुई और परिचित सी लग रही है।
‘‘क्रिस्टोफर किट वॉकर.... बहुत अच्छा नाम है, आप क्रिश्चियन हैं ?’’ संदीप ने अपनी जिज्ञासा को प्रश्न में बदलते हुए कहा। इस प्रश्न पर संदीप को पहली बार बूढ़े की तरफ़ से कुछ प्रतिक्रिया दिखाई दी। और वह प्रतिक्रिया थी बहुत हल्के से चौंकने की प्रतिक्रिया।
‘‘कौन क्रिस्टोफर किट वॉकर...? मेरा नाम तो धनंजय है, धनंजय कुमार शर्मा।’’ बूढ़े ने इस बार थोड़ी सी स्पष्ट आवाज़ में कहा।  इस बार चौंकने की बारी संदीप की थी। इस बार बूढ़ा किसी दिशा में नहीं देख रहा था उसकी आँखें संदीप के चेहरे पर थीं। आँखों में नहीं थीं लेकिन चेहरे पर तो थीं आँखें। बूढ़ा कुछ बदला हुआ सा था। उसकी आवाज़ भी पहले जैसी नहीं थी। ऐसा लगा कि यह वो बूढ़ा नहीं है।
‘‘फिर क्रिस्टोफर किट वॉकर कौन है अंकल ? अभी-अभी आपने उसका नाम लिया था।’’ संदीप ने आवाज़ को संतुलित रखते हुए प्रश्न किया।
‘‘मैंने कब लिया ये नाम ? तुमने लिया है यह नाम तो, मैंने तो यह कहा कि मेरा नाम धनंजय कुमार शर्मा है।’’ बूढ़े की आवाज़ में एकदम नाराज़गी आ गई। संदीप को रवि की बात याद आ गई कि बूढ़ा बात-बात में तुनक जाता है। संदीप ने आगे इस नाम पर बहस नहीं करने का निर्णय लिया।
‘‘आप यहीं कहीं आस-पास रहते हैं या कहीं दूर से आते हैं टहलने यहाँ ?’’ संदीप ने नाम की बहस को बदल कर स्थान की चर्चा कर दिया। संदीप के शब्द एक बार फिर से जैसे उत्पन्न हुए थे वैसे ही समाप्त हो गए। कहीं कोई प्रभाव उन शब्दों का दिखाई नहीं दिया। बूढ़ा जो कुछ देर पहले कुछ सचेत सा दिख रहा था अब एक बार फिर से किसी प्रस्थान बिंदु पर जाकर खड़ा हो गया था। संदीप के लिए स्थिति फिर से असहज हो गई थी।
‘‘डेंकाली से....।’’ बूढ़े की आवाज़ एक बार फिर से बहुत अस्पष्ट हो गई। डेंकाली...? यह कौन सी जगह है ? इतने विचित्र नाम का कोई मेाहल्ला या कॉलोनी तो उसके शहर में नहीं है। आस-पास इस नाम का कोई गाँव या शहर भी नहीं है, बूढ़ा किस जगह की बात कर रहा है ये?
‘‘डेंकाली के जंगल से....।’’ बूढ़े की आवाज़ उसी प्रकार मद्धम है। डेंकाली का जंगल ? यह कौन सा जंगल है ? शायद उधर पहाड़ों के पार कोई आदिवासी बस्ती हो, ऐसे नाम तो आदिवासी गाँवों के ही हो सकते हैं। लेकिन यह बूढ़ा तो सड़क तरफ़ से आता है, इसे कभी पहाड़ों की तरफ़ से आते हुए नहीं देखा। डेंकाली के जंगल...? यह नाम भी संदीप को कुछ सुना हुआ सा लग रहा है, कहाँ सुना है यह नाम? 
‘‘वहाँ आपका घर है ?’’ संदीप ने हिम्मत बाँधते हुए पूछा। हिम्मत इसलिए कि बूढ़े का कुछ भरोसा नहीं कि अभी अपनी कही हुई बात से पलट जाए।
‘‘वहाँ भी है....।’’ बूढ़ा अभी भी ट्रांस में ही है। इस प्रकार बोल रहा है कि वाक्य का अंतिम शब्द बस अनुमान से ही समझना पड़ रहा है संदीप को कि हाँ यही शब्द होगा। संदीप को उलझन हुई कि इसके बाद अगला प्रश्न क्या पूछा जाए ? बूढ़ा कब क्या उत्तर दे दे।
‘‘कभी-कभी योरोप के एक पुराने क़िले में रहता हूँ, कभी रेगिस्तान में अपने वॉकर समतल पर रहता हूँ, कभी मित्र द्वीप पर तो कभी हवा महल में।’’ बूढ़े की बात पूरा होते ही संदीप को रवि की बात याद आ गई कि बूढ़ा न जाने किन-किन जगहों के, लोगों के नाम लेता है। हाँ बूढ़े की बात में ‘वॉकर’ शब्द आने से संदीप को यह पता चल गया कि बूढ़ा अब क्रिस्टोफर वॉकर होकर बात कर रहा है। संदीप ने बूढ़े को गौर से देखा, वह किसी ओर दुनिया में था, यहाँ इस पेड़ के नीचे नहीं था। संदीप को लगा कि बूढ़ा लगातार धनंजय शर्मा और क्रिस्टोफर वॉकर के बीच आवाजाही कर रहा है। यह कोई ड्यूल पर्सनालिटी वाली भी बात नहीं है, बूढ़ा या तो यहाँ पेड़ की जड़ पर बैठा होता है, या किसी यात्रा में होता है।
‘‘पढ़ते हो या जॉब कर रहे हो ?’’ इस बार बूढ़े ने संदीप के चेहरे की तरफ़ देखते हुए कहा। यह प्रश्न धनंजय शर्मा की तरफ़ से था, ऐसा संदीप को पूछने के अंदाज़ से लगा।
‘‘जी मैंने एमबीए किया है यहीं से। कैंपस सेलेक्शन भी हो गया है। बस अब पाँच-छह दिन में बेंगलूरू जाकर ज्वाइन करना है।’’ संदीप ने कुछ अदब के साथ उत्तर दिया। इस बार संदीप की कही हुई बात का एक-एक शब्द रिसीव किया गया। और उन शब्दों पर प्रतिक्रिया जैसा भाव भी बूढ़े के चेहरे पर दिखाई दिया। संदीप को अपनी बात पर बूढ़े की यह प्रतिक्रिया कुछ अच्छी नहीं लगी, वह दूसरी तरफ़ देखने लगा।
‘‘मतलब पाँच-छह दिन बाद तुम भी यहाँ नहीं दिखोगे ? वहाँ आकर तालाब में पैर लटका कर नहीं बैठोगे ? वहाँ उस किनारे पर लगे हुए पेड़ में तालाब से लाकर पानी नहीं डालोगे। यहाँ-वहाँ उग आई गाजर घास को उखाड़ कर नहीं फेंकोगे ।’’ बूढ़े के चेहरे पर और आवाज़ में पहली बार संदीप को उदासी का गहरा प्रभाव महसूस हुआ। इस बात ने संदीप को एक बार फिर से चौंका दिया। चौंका दिया इस बात पर कि वह तो यह समझता था कि बूढ़ा यहाँ आने-जाने वाले, यहाँ बैठने वाले किसी व्यक्ति पर कोई ध्यान ही नहीं देता है मगर यह तो सब देखता है, जानता है। वह यहाँ आकर क्या-क्या करता है, वह एक-एक बात बूढ़े को पता है। जैसे वह यही देखता हो बैठकर।
‘‘जी अंकल ... अब पढ़ाई पूरी हो गई है, तो अब तो जाना ही पड़ेगा। अब ज़िंदगी जहाँ ले जा रही है, वहाँ जाना ही होगा। और जाने में कुछ न कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा। करियर, प्रोग्रेस यह सब भी तो ज़िंदगी में देखना ही होता है।’’ इस बार संदीप ने कुछ साफ़्ट आवाज़ में कहा।
‘‘ज़िंदगी कहीं नहीं ले जाती, हम ही जाते हैं, और इल्ज़ाम ज़िंदगी को दे देते हैं। और पीछे कुछ न कुछ छूटता तभी है जब हम छोड़ना चाहते हैं। वरना कोई ज़रूरी नहीं कि छोड़ा जाए।’’ बूढ़े ने काँपती आवाज़ में कहा। संदीप को लगा कि बूढ़े की आवाज़ कुछ भर्रा भी गई है। मगर बूढ़े के चेहरे को देख कर नहीं लग रहा कि वह भावुक हो रहा है। फिर संदीप को ऐसा क्यों लगा कि बूढ़े की आवाज़ भर्रा गई है।
‘‘आप क्या करते हैं अंकल...? मेरा मतलब आप कहीं गवर्मेंट जॉब करते हैं या...?’’ संदीप को पूछते हुए लगा कि उसका प्रश्न अपने आप में ही उलझ रहा है, वह जो कुछ बूढ़े से पूछना चाह रहा है, उसे पूछने में उसके शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। संदीप ने अपनी बात को बीच में ही छोड़ दिया। बूढ़े ने पूरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। संदीप अपनी बात समाप्त कर चुप हो गया। कुछ देर की चुप्पी रही।
‘‘मैं..... वैसे यह बताना नहीं चाहिए लेकिन तुमको बता देता हूँ... मैं डेंकाली के जंगलों के जंगल गश्ती दल का कमांडर हूँ। अज्ञात कमांडर....। वही, जिसके बारे में किसीको भी नहीं पता है।’’ बूढ़े की आवाज़ इस बार और भी ज़्यादा अस्पष्ट हो गई। अंतिम वाक्य हवा की सरसराहट की तरह था। संदीप को आवाज़ की लरज़िश से ही पता चल गया कि यह क्रिस्टोफर वॉकर है। मगर यह है कौन ?
‘‘अब मैंने वी आर एस ले लिया है, वालेंटरी रिटायरमेंट... पहले मैं जॉब में था, गवर्मेंट जॉब में....। फिर ऐसा लगा कि अब कोई मतलब नहीं है जॉब करने से। किसके लिए किया जाए। तो बस रिटायरमेंट ले लिया। अपने आप को मुक्ति देना भी ज़रूरी होता है। समय पर अपने आप को मुक्त कर देना चाहिए। कम से कम कुछ साँस तो आ सके।’’ इस बार सधी हुई आवाज़ में कहा बूढ़े ने, यह आवाज़ धनंजय शर्मा की है।
संदीप ने इस बीच चुपचाप से अपने मोबाइल में गूगल सर्च पर क्रिस्टोफर वॉकर अंग्रेज़ी में लिख कर सर्च किया। बहुत से रिज़ल्ट सामने आ गए। उसने दूसरे नंबर पर दिख रही विकीपीडिया की लिंक पर क्लिक किया, तो विकीपीडिया का पेज सामने आ गया। छोटा सा पेज जिसमें बस तीन सूचनाएँ थीं। क्रिस्टोफर जे. वॉकर -ब्रिटिश हिस्टोरियन, क्रिस्टोफर वॉकर -जिब्राल्टेरियन ट्राय एथेलीट एंड सायक्लिस्ट, क्रिस्टोफर किट वॉकर -द रियल नेम ऑफ कॉमिक बुक कैरेक्टर द फैंटम। शुरू के दो नाम तो नहीं हो सकते, यह तीसरा..... कॉमिक बुक कैरेक्टर द फैंटम... यहीं से कुछ संकेत मिल सकता है। संदीप ने द फैंटम लिख कर गूगल को इमेज सर्च पर डाल दिया। कई सारी तस्वीरें उसके सामने खुल गईं। फैंटम की...। ओ तो ये है क्रिस्टोफर वॉकर उर्फ़ फैंटम....। यह तो कॉमिक बुक का कैरेक्टर है, सुपर हीरो वेताल। हिन्दी में भी यह कॉमिक्स आ चुका है, लेकिन हिन्दी में इसका नाम फैंटम नहीं था वेताल था। संदीप के पापा की लाइब्रेरी में रखी हैं ये कॉमिक्स सीरीज़, और कई बार अपने पापा को उन्हें पढ़ते हुए भी देखा है। उसे बड़ा अजीब लगता है पापा को कॉमिक्स पढ़ते हुए देख कर। बचपन में उसने भी पढ़ा है इन कॉमिक्स को, पापा से माँग कर। देते समय हर बार पापा का वही इन्स्ट्रक्शन ‘सँभाल कर पढ़ना....और पढ़ कर वापस वहीं रख देना जहाँ से उठाई थी।’ बड़ा होने के बाद उसने तो पढ़ना छोड़ दिया मगर पापा को वह अब भी पढ़ते देखता है कभी-कभी। जब भी पापा इनको पढ़ते हैं तो उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून दिखाई देता है।
वैसे तो उसका बचपन कॉमिक्स पढ़ने वाला बचपन नहीं रहा। उसका बचपन तो टीवी पर कार्टून शो देखने वाला बचपन रहा है। कॉमिक्स तो तब तक बीते समय की बात हो चुके थे। उसके बचपन में डोरीमॉन, पॉकीमॉन, ऑगी एंड काकरोचेज़ जैसे टून कैरेक्टर शामिल हैं। लेकिन उसने पापा की लाइब्रेरी से निकाल-निकाल कर वेताल के लगभग सारे कॉमिक्स पढ़े। वेताल.. जो जंगल में रहता है, अजीब सी बैंगनी रंग की पोशाक पहनता है, आँखों पर काला चश्मे जैसा नकाब। पोशाक के ऊपर काले-नीले धारियों वाला अंडरवियर, उस पर खोपड़ी का निशान, कमर पर बँधी हुई मेखला और उस पर दोनों तरफ़ टँगे हुए रिवाल्वर, पैरों में काले लम्बे गम बूट, लगभग घुटनों तक के। उँगली में एक अँगूठी, जिस पर खोपड़ी बनी है, जब भी किसी गुंडे को घूँसा मारता है तो उसके चेहरे पर खोपड़ी का निशान बन जाता है, जो कभी नहीं मिटता। अच्छे लोगों के लिए वह एक स्वास्तिक की तरह का चिह्न छोड़ता है, सुरक्षा का। बचपन में वो पापा की लाइब्रेरी से उठा लाता था इन कॉमिक्स को। पुराने और पीले पड़ चुके पन्नों को बहुत आहिस्ता-आहिस्ता पलट कर पढ़ता था। पापा ने बहुत सँभाल कर रखा हुआ है उन्हें आज भी। डेंकाली के जंगल... हाँ ये नाम वहीं तो सुना था। डेंकाली के जंगल में ही तो खोपड़ीनुमा गुफा में रहता है वेताल, जिसकी पहरेदारी ख़तरनाक बौने करते हैं। ख़तरनाक बोने बांडार। वेताल की पोशाक उसे पूरी तरह ढक लेती है, उसका चेहरा क्या शरीर का कोई भी हिस्सा ज़रा सा भी नहीं दिखता, जंगल में कहते हैं कि वेताल चेहरा जिसने देख लिया वो ज़िंदा नहीं बचता।
‘‘आख़िरकार हर बात की कोई तो सीमा होगी। कब तक बस यूँ ही एक ढर्रे में बँधी ज़िंदगी को जीते जाइए। अपने लिए जहाँ कोई समय नहीं हो, बिल्कुल भी समय नहीं हो। बस यही सोच कर मैंने रिटायरमेंट ले लिया। कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घूमते हुए अपना ही तेल निकल गया पूरा। वास्तव में कोल्हू में तेल तिल्ली का नहीं निकलता है, तेल तो बैल का ही निकलता है।’’ बूढ़े ने कुछ कठोर आवाज़ में कहा। संदीप ने बूढ़े के चेहरे की ओर देखा। इस बार फिर वहाँ पर कुछ भाव नज़र आ रहे थे। तल्ख़ी के भाव। नाराज़गी के भाव। संदीप ने बूढ़े के चेहरे पर ग़ुस्सा देखा तो उसे रवि की बात एक बार फिर से याद आ गई। मगर कुछ ही देर में बूढ़े के चेहरे के भाव सामान्य हो गए।
‘‘आपके घर में कोई नहीं है क्या। मतलब आंटीजी, बच्चे.... आपका परिवार ?’’ संदीप ने बूढ़े के चेहरे के भाव सामान्य होते हुए देखे तो तुरंत प्रश्न किया। बूढ़े ने कोई उत्तर नहीं दिया। पेड़ पर से एक गिलहरी बूढ़े के कंधे पर कूदी और वहाँ से सर्राते हुए पीठ से होती हुई ज़मीन पर कूद का दूसरी ओर भाग गई। संदीप का पूरा का पूरा प्रश्न मानों एक बार फिर किसी अँधेरी गुफा में समा गया। संदीप को याद आया कि वेताल जिस गुफा में रहता है वो भी तो अँधेरी गुफा है, खोपड़ीनुमा अँधेरी गुफा, जिसमें खोपड़ी के निशानों वाला उसका सिंहासन है।
‘‘हैं न, पूरा परिवार है मेरा। डायना है, दो बच्चे हैं किट और हेलोइस, मेरा घोड़ा तूफ़ान है, भेड़िया शेरा, बाज़ फ्राका और रेक्स है। और बांडार बौनों का मुखिया गुर्रन भी हमेशा मेरे साथ रहता है। बूढ़े बाबा मोज्ज भी साथ ही बने रहते हैं। और हाँ मुझ से पहले वाले बीस वेताल भी तो मेरे साथ ही रहते हैं, वो भी तो उसी गुफा में दफ़्न हैं, जिसमें मैं रहता हूँ....मेरे साथ, इक्कीसवें वेताल के साथ। दुनिया की नज़र में वेताल अमर है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है, वेताल का बेटा अपने पिता के मरने के बाद उसे गुफ़ा में ही दफ़्न कर देता है और उसकी पोशाक पहन कर दुनिया के सामने आ जाता है, वेताल बन कर। इसीलिए दुनिया की नज़रों में वेताल कभी नहीं मरता। वह हमेशा ज़िंदा रहता है, वह अमर है कभी नहीं मरेगा वो।’’ बूढ़ा बुदबुदा रहा है। मतलब वह एक बार फिर से क्रिस्टोफर किट वॉकर बन चुका है।
बूढ़े की बातों में पहली बार ‘वेताल’ नाम भी आया है, संदीप का अनुमान बिल्कुल सही है। संदीप को अब बूढ़े के बात करने का पैटर्न समझ में आ गया है। बूढ़ा धनंजय शर्मा और वेताल या क्रिस्टोफर किट वॉकर के बीच रह-रह कर ट्रांस्फार्म करता है। और यह ट्रांस्फार्मेशन इतनी तीव्र गति से होता है कि सुनने वाला कुछ समझ ही नहीं सकता कि अचानक ये क्या हो गया है। रवि जो कह रहा था कि बूढ़ा जाने किन लोगों, जगहों की बातें करता है, तो वह यही बातें हैं। अभी बूढ़े ने जो नाम लिए हैं, इन नामों को संदीप जानता है। यह वेताल का परिवार है। उसकी पत्नी डायना पामर, जुड़वाँ बच्चे किट और हेलोइस, गोद लिया बेटा रेक्स, और उसके जानवर। वेताल की कॉमिक्स में यह उसके साथ आने पाले पात्र हैं। वेताल की पत्नी डायना पामर वॉकर को बहुत ख़ूबसूरत दिखाया गया है कॉमिक्स में। जब पहली बार उसने कॉमिक्स में डायना को देखा था तो उसे क्रश हो गया था डायना पर। ठीक-ठाक रूप से डायना उसका पहला क्रश थी। बाद में उसने कॉमिक्स वेताल के लिए नहीं पढ़े बल्कि डायना के लिए ही पढ़े, बस डायना को देखने के ही लिए।
‘‘क्या होता है परिवार? कुछ लोग जो आपके साथ जुड़ते हैं, कुछ दूर तक साथ चलते हैं फिर उसके बाद अचानक एक दिन छोड़ जाते हैं हमें, एक दम अकेला... बहुत सारी यादों के साथ...।’’ बूढ़े ने इस बार कुछ स्पष्ट आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में तल्ख़ी और उदासी दोनों का सम्मिश्रण था।
संदीप ने देखा सामने तालाब के उस सिरे पर सूरज का लाल-सिंदूरी गोला बस तालाब के पानी को छूने ही ही वाला है। तालाब के पानी में अभी से सूरज की लाल-सिंदूरी रंग घुल रहा है। जब सूरज एकदम डूबने पर आ जाता है उस समय एक विचित्र प्रकार की शांति छा जाती है चारों तरफ़, जैसे सूरज के जाने का मातम छा गया हो। पशु-पक्षी, प्रकृति सब एकदम मौन साध लेते हैं सूरज के डूबते समय। विज्ञान कहता है कि सूरज कहीं नहीं जाता, लेकिन प्रकृति को देखें तो उसके व्यवहार से तो यही लगता है कि सूरज जा रहा है, विदा हो रहा है।
‘‘मेरे दो बच्चे हैं.... किसलय और हेतल... हेतल नाम मेरे एक गुजराती दोस्त ने रखा था, मुझे बेटी का नाम  ‘हे’ से ही रखना था और बेटे का ‘कि’ से.... होता है न कोई नॉस्टेल्जिया....। बहुत खोजने पर मिले थे ये नाम। किसलय और हेतल। अब दोनों यूएस में जॉब कर रहे हैं। शादी भी हो गई है दोनों की। फैमिली के साथ वहीं सैटल होने का लगभग फाइनल कर लिया है उन लोगों ने। बढ़िया पैकेज मिलता है। बेटा-बहू और बेटी-दामाद चारों ही इस प्रकार के पैकेज पा रहे हैं। अपना पूरा समय अपनी कंपनियों को बेच दिया है। उसके बदले में डॉलर्स मिल रहे हैं। हरे-हरे डॉलर।’’ बूढ़े की आवाज़ में थकान आ रही है। उदासी जब गहरी होती है तो वह भी थकान का भ्रम पैदा करती है।
संदीप ने बूढ़े की बात समाप्त होने के बाद कुछ नहीं कहा। उसके पास कुछ कहने को नहीं था इसके बाद। उसकी भी तो यही स्थिति है। वह भी तो जा रहा है इसी प्रकार पैकेज पर। एक यूएस बेस्ड एमएनसी में। कुछ साल यहीं इंडिया में काम करना है उसके बाद अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा, उसका परफार्मेंस अच्छा रहा, तो उसके भी यूएस जाने के चांसेस हैं। संदीप को याद आया, उसके एमएनसी में बैंगलूरू जाने की बात पर पापा ने बहुत धीमे से कहा था -‘इतनी दूर जाने की क्या ज़रूरत है ? अब तो अपने आस-पास भी अच्छी कंपनियाँ आ गई हैं। यहाँ भी जॉब तो मिल ही सकता है।’ संदीप मम्मी-पापा की इकलौती संतान है। संदीप ने कुछ रूखे स्वर में कहा था -‘यहाँ जॉब तो है, पर न उन जॉब्स में कोई फ्यूचर है और न कोई बढ़िया पैकेज है। अभी बाहर नहीं निकलूँगा तो यहीं पर सड़ के रह जाऊँगा।’ संदीप को अब भी याद है कि उसके ‘सड़ के रह जाऊँगा’ कहने पर पापा ने चश्मे में से उसकी आँखों में आँखें डाल कर देखा था। जैसे संदीप की कही हुई बात से उन्हें चोट पहुँची हो।
‘‘आपने लव मैरिज की थी अंकल या आपकी अरेंज मैरिज हुई थी ?’’ संदीप को पापा की आँखें याद आते ही अपने अंदर एक झुरझुरी सी महसूस हुई। उसने अपने आप को असहज होने से बचाने के लिए एक हल्का प्रश्न बूढ़े से पूछ लिया। बूढ़ा अपनी गोद में रखे झोले पर हाथ फेर रहा है।
‘‘लव मैरिज़... मेरी डायना के साथ लव मैरिज हुई थी, डायना पामर के साथ। पता है कहाँ हुई थी ? कीलावी में समुद्र के सुनहरे तट पर, जहाँ आधी रेत है और आधा सोना है। कीलावी का अर्थ जानते हो ? कीलावी का अर्थ होता प्यार, इसलिए कीलावी के तट पर जाने के लिए ज़रूरी है कि आपके दिल में प्यार हो। जंगल में कहा जाता है कि ‘जो बिना प्यार के कीलावी के तट पर आए, उसे यहीं मरने दो...’। वाम्बेसी पुरोहितों ने पहले हमारी शादी करवाई, फिर उसके बाद हम दोनो कीलावी के समुद्र में जाकर नहाए..... खूब नहाए... उसके बाद समुद्र से निकल कर हम परंपरा अनुसार सुनहरे तट की रेत में लोटे, एक-दूसरे पर हमने सुनहरी रेत डाली। वह सुनहरी रेत हमारे शरीर से चिपक गई। और उसके बाद हमने मणि महल में प्रवेश किया। मणि महल, जो किसी अश्वेत राजा ने कीलावी के सुनहरे तट पर अपनी पत्नी के साथ सुहागरात मनाने के लिए बनाया था। मगर बाद में उसकी पत्नी की प्रसव के दौरान मौत हो गई। उसके बाद वो राजा कभी वहाँ नहीं लौटा, लौटता तो पत्नी की यादें उसे वहाँ घेरतीं। हमने परंपरा के अनुसार उसी मणि महल में प्रवेश किया। और जैसी परंपरा है मणिमहल के बाद जंगल में जाना पड़ता है। हम भी मणिमहल से जंगल की ओर निकल गए। मणिमहल के बाद जंगल में जाना हमारे समय की नियति है। पहले विवाह, फिर समुद्र के पानी में जाना, फिर सुनहरी रेत में लोट लगाना, फिर मणिमहल और अंत में जंगल..... यही तो है हम सबका जीवन... कहीं कोई बदलाव नहीं है। थोड़ा या ज़्यादा हम सबका जीवन ऐसे ही बीतता है। बस ऐसे ही.....।’’ बूढ़े का पूरा व्यक्तित्व जैसे वह कहते समय वहाँ से अनुपस्थित हो चुका है। संदीप वहाँ है नहीं, और वह ये बातें संदीप से नहीं कर रहा है। मानों किसी अज्ञात से बातें कर रहा है वो बूढ़ा।
जब भी बूढ़ा क्रिस्टोफर किट वॉकर उर्फ वेताल में ट्रांस्फार्म कर जाता है, तो संदीप के पास पूछने को कोई प्रश्न या करने के लिए कोई बात नहीं होती है। इस प्रकार की बातों पर वो क्या कहे आगे। बिना सिर-पैर की बातें। बूढ़े की आँखें अब डूबते हुए सूरज की ओर स्थिर हैं। संदीप भी उस दिशा में ही देखने लगा जिस दिशा में बूढ़ा देख रहा है। बूढ़ा जिन जगहों और चीज़ों की बातें कर रहा है वो सारी वेताल के कॉमिक्स की हैं। कीलावी का सुनहरा तट, मणि महल और वाम्बेसी पुरोहित।
‘‘हर बार यही सोच कर मन को तसल्ली होती है कि बच्चे अपनी ज़िंदगी में सैटल हो गए हैं। उनकी ज़िंदगी अब व्यवस्थित हो गई है। मगर बीच में यह भी ख़याल आता है कि उनकी ज़िंदगी तो व्यवस्थित हो गई, मगर हमारा क्या ? हमें क्यों उजाड़ा गया ? हमने बच्चों को पैदा किया, पाला, पढ़ाया, बड़ा किया..... तुम कह सकते हो कि यह तो हर माँ-बाप का काम ही है, उसमें हमने नया क्या किया। मगर इन सबमें हमने बहुत बार अपनी इच्छाओं को मारा। बहुत कुछ ऐसा किया जो हम नहीं करना चाहते थे। मैं गवर्मेंट जॉब में था, जब बच्चों की इच्छाओं का ख़र्च सैलेरी से पूरा नहीं कर पाया, तो मैंने भ्रष्टाचार शुरू किया। रिश्वत लेना, ग़लत काम करना, सब शुरू किया। मैं मोह में फँस गया था अपने बच्चों के। मैं उन्हें सब सुख देना चाहता था। और उसी के लिए मैंने, जो उस समय तक ग़लत को ग़लत ही मानता था, वही करना शुरू कर दिया। जिस दिन मैंने पहली बार रिश्वत ली थी, उस दिन रात भर मुझे अपने मुँह में ख़ून का स्वाद आता रहा था। कई बार कुल्ला किया, पानी पिया, मगर वह स्वाद रात भर रहा। फिर उसकी आदत हो गई मुझे।’’ कहते हुए बूढ़ा सूरज की ओर देखते हुए कुछ क्षण को चुप हो गया ‘‘पैदा किया, पाला, पढ़ाया किसके लिए ? मल्टी नेशनल कंपनियों के यहाँ ले जाकर बेचने के लिए। हमने बच्चों को थोड़े ही पाला था, हमने तो एमएनसी के ग़ुलामों को पाला था। पाला था कि हमारे ग़ुलाम अच्छे दामों में वहाँ बिक सकें। बिक गए... सचमुच अच्छे ही दामों में बिक गए..... डॉलर्स में बिके.... मगर हमें बेचने के बाद भी कुछ नहीं मिला। एमएनसी को ग़ुलामों की ज़िंदगी का कंट्रोल मिला और ग़ुलामों को डॉलर्स मिले.... हमें.... हमें कुछ नहीं मिला... हम तो उजड़ ही गए....।’’ बूढ़ा जब धनंजय शर्मा हो जाता है तो उसकी आवाज़ में उदासी कभी अकेले नहीं आती है। उदासी के साथ हमेशा गहरा तंज़ रहता है। अपने आप पर तंज़। और इसी तंज़ के कारण उसके होंठ एक तरफ़ से कुछ तिरछे हो जाते हैं। चेहरा विकृत जैसा होने लगता है उसका।
संदीप को याद आया कि दो-तीन दिन पहले जब हर महीने की तरह वह मम्मी को महीने भर का राशन ख़रीदवाने के लिए मॉल लेकर गया था, तो इस बार मम्मी ने बहुत सारी रेगुलर ख़रीदी जाने वाली चीज़ें नहीं ख़रीदी थीं। कस्टर्ड, चोकोस, केक मिक्स, बादाम, अखरोट, मैगी, चॉकलेट्स, टॉफियाँ, बिस्किट्स, ऐसे बहुत से आइटम थे जो हर महीने की लिस्ट में सबसे पहले ख़रीदे जाते थे, उनको मम्मी ने नहीं ख़रीदा था। इनमें से कुछ सामान तो आदत के कारण उठा कर ट्रॉली में रख भी लिया था मम्मी ने फिर बाद में हटा दिया था। उसने मम्मी से पूछा भी था कि यह सब क्यों नहीं ख़रीद रही हो इस बार। मम्मी का उदास सा उत्तर आया था ‘अब कौन खाएगा इन्हें? बेकार पड़े रहेंगे....।’ उत्तर देने के साथ ही मम्मी की आँखें पनीली हो गईं थीं। किनारों से नमी छलक आई थी, जिसे उन्होंने बहुत सफाई से रूमाल में सोख लिया था। संदीप को अपने अंदर भी उस दिन कुछ पिघलता हुआ महसूस हुआ था। बहुत ज़्यादा नहीं, बहुत हल्का सा कुछ महसूस हुआ था। उस दिन ट्रॉली आधी भी नहीं भरी थी, जबकि हर बार यह होता था कि बहुत सा सामान मम्मी ढूँढ़-ढूँढ़ कर ट्रॉली में डालती थीं, और एक ही बात कहती थीं ‘यह तुझ पसंद है न, इस बार कुछ अलग तरीक़े से बनाऊँगी इसे...।’ उनके चेहरे पर एक अजीब सा उल्लास, एक अजीब सा प्रकाश होता था यह कहते समय। किसी गहरे आंतरिक सुख का प्रकाश, किसी अंदरूनी शांति का उल्लास। लेकिन उस दिन उनके चेहरे पर वह सब कुछ नहीं था, उसकी जगह एक गहरी उदासी थी, एक सन्नाटा था। उस दिन कैश काउंटर पर पैमेंट करते समय मम्मी ने होम डिलेवरी के बारे में भी जानकारी ली थी, जबकि पहले जब भी संदीप ने कहा था होम डिलेवरी से मँगवाने को, तो उन्होंने झिड़कते हुए हर बार मना किया था ‘अपने हाथ से जाकर सामान लाना चाहिए। होम डिलेवरी में तो वो सब सड़ा-गला सामान भेज देते हैं।’ उस दिन चलते समय मम्मी ने होम डिलेवरी का नंबर वगैरह भी लेकर अपने मोबाइल में फीड कर लिया था।
‘‘डेंकाली के जंगलों में जो फुसफुसाते कुंज हैं, वो असल में यादों के कुंज हैं, हम सब उन यादों में फँस जाते हैं। जब हवा उस कुंज में खड़े हुए पेड़ों को छूकर गुज़रती है, तो पेड़ फुसफुसाने लगते हैं। व्हिस्परिंग फॉरेस्ट ऑफ स्वीट मेमोरीज़। मैं जब भी तूफ़ान पर सवार होकर शेरा के साथ वहाँ से गुज़रता हूँ, तो वो पेड़ किट-हेलोइस-डायना, किट-हेलोइस-डायना, फुसफुसाने लगते हैं। पहले यह पेड़ वेताल-वेताल फुसफुसाते थे मेरे वहाँ से गुज़रने पर, मगर अब......।’’ बूढ़े की आवाज़ बहुत थकी हुई लग रही है। जैसे बहुत लम्बी यात्रा करके आया हो वो।
पिछले कुछ दिनों से संदीप को घर में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस हो रहा है। वही सन्नाटा जो अभी डूबते सूरज के कारण तालाब के किनारे पर हो रहा है। कुछ दिनों से घर बहुत चुप-चुप है। वह घर जो खिलखिलाता था, जगमगाता था, आजकल बुझा हुआ है, चुप है। पापा इतनी ख़ामोशी के साथ घर में आते हैं कि उनके आने की आहट न हो जाए कहीं। मम्मी, बहुत मद्धम हवा की तरह घर में चल रही हैं। किसी सरसराहट की तरह उनके आने-जाने को महसूस कर रहा है संदीप। ऐसा लग रहा है जैसे घर किसी अँधेरी और बंद गुफ़ा में कन्वर्ट हो गया है, जहाँ प्रकाश, हवा, ऊष्मा यह सब अचानक आने बंद हो गए हैं। और एक घुटन, सीलन और अँधेरा ही हर तरफ़ फैल गया है। हर वक्त ऐसा लगता है जैसे घर के अंदर एक ठंडा कोहरा फैला हुआ है, सीला-सीला सा कोहरा, जिसके आर-पार होकर घर में रहने वाले तीनों लोग एक-दूसरे को देख ही नहीं पा रहे हैं। देखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कोहरा और घना और घना होता ही जा रहा है। संदीप ने देखा बूढ़ा अपने झोले को और ज़्यादा कस कर पकड़े हुए डूबते सूरज की ओर टकटकी बाँधे हुए है। संदीप को पहली बार बूढ़े पर दया आई।
‘‘और आंटी.... वो कहाँ हैं आजकल ? यहीं हैं या बच्चों के पास यूएस में हैं?’’ संदीप ने बूढ़े को सहज करने के लिए प्रश्न किया। उसे पता है कि जिन माँ-बाप के बच्चे यूएस में सैटल हो गए हैं, उनकी माँएँ अक्सर अपने पति को भारत में छोड़कर अमेरिका के चक्कर काटती रहती हैं। नाती-पोतों को पालने के लिए, बड़ा करने के लिए। मोह में बँधी हुई चौदह-पंद्रह घंटों की कष्टप्रद यात्रा करते हुए आवाजाही करती रहती हैं। जीवन भर कभी हवाई जहाज़ में नहीं बैठने वाली ये हाउस वाइफें लम्बी-लम्बी यात्राएँ बच्चों के लिए करती हैं, करती रहती हैं। संदीप का प्रश्न बूढ़े को सामान्य करने के लिए था, लेकिन उस प्रश्न से बूढ़े पर कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ा, वह पहले की ही तरह उसी मुद्रा में बैठा रहा।
‘‘कौन....? डायना....? डायना पामर वॉकर...? वह पहले यहीं थी.... फिर किट और हेलोइस जब सात समंदर पार चले गए तो उसका जीवन वेताल और बच्चों के बीच बँट गया। कभी जंगल में रहती वेताल के पास, तो कभी सात समंदर पार उड़ कर जाती। वेताल शिखर के पास हवाई जहाज़ उसको लेने आ जाता और वो उड़ जाती। भूल कर अपने घुटने का दर्द, लो बीपी, शुगर, कोलेस्ट्राल... सब कुछ भूल कर अकेले ही हवाई यात्रा पर निकल जाती। मैं उसे वेताल शिखर के पास तक छोड़ देता। उसके बाद वो अकेली ही जाती। बिल्कुल अकेली...। डायना, जो कभी रेल में भी अकेली नहीं गई, वो जाने किस आकर्षण में बँधी निकल पड़ती अकेली ही। लौटती तो बहुत थकी हुई होती। यहाँ आते ही उसके घुटने दर्द से कराहने लगते। बीपी लो होने लगता। जंगल में अब उसका मन नहीं लगता था। उसके पखेरू सात समंदर पार थे। वह अपना मन वहीं छोड़ कर आती, जंगल में तो बस उसका बीमारियों से टूटा हुआ शरीर ही लौटता था। फिर एक दिन....... जंगल से सात समंदर पार और सात समंदर पार से जंगल की यात्रा करते-करते तन टूट गया। वह सारी यात्राएँ स्थगित करके और लम्बी यात्रा पर निकल गई। बहुत लम्बी यात्रा पर। किट, हेलोइस, वेताल, सबको पीछे छोड़कर निकल गई वो....।’’ बूढ़े की आवाज़ बहुत हल्के से काँप रही है। संदीप ने गौर से देखा कि कहीं बूढ़ा रो तो नहीं रहा है, लेकिन बूढ़े का चेहरा बिल्कुल पत्थर बना हुआ है। रोना तो बहुत दूर की बात है उसके चेहरे पर किसी भी प्रकार के कोई भाव नहीं है, एकदम पत्थर की मूर्ती की तरह दिखाई दे रहा है बूढ़ा। संदीप को अब बूढ़े पर बहुत दया आ रही है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि वह अपने आप को कैसे अभिव्यक्त करे।
‘‘तुमने आंटी के बारे में पूछा था न कि वो अब कहाँ है, यहाँ है या यूएस है ? वो अब कहीं नहीं है, न यहाँ है न यूएस में है। वह अब कहीं नहीं है, घुल गई है हवा में.....। यहाँ आती थी तो बच्चों की चिंता उसे सताती थी और वहाँ जाती तो मेरी। मैं जॉब के कारण जा नहीं पाता था उसके साथ। वहाँ रहती तो मेरी चिंता में घुलती और यहाँ रहती तो बच्चों की, नाती-पोतियों की चिंता में। वह कहीं भी सुखी नहीं थी। उसका परिवार बँट गया था। वह बँटे हुए हर हिस्से के साथ रहना चाहती थी, जो संभव नहीं था।’’ बूढ़े ने इतना कह कर कुछ देर के लिए बोलना बंद किया और सिर झुकाए बैठा रहा ‘‘उसके जाने के बाद मैंने वीआरएस ले लिया। काश पहले ही ले लिया होता.... तो कम से कम उसे खोता तो नहीं। मगर हम हमेशा यही सोचते हैं कि अभी तो बहुत समय है। अभी तो किया जा सकता है। और एक दिन अचानक पता चलता है कि बिल्कुल समय नहीं था। बिल्कुल भी..... समय तो रेत की तरह फिसल गया था हमारी मुट्ठी से।’’ बूढ़ा सिर झुकाए हुए है, संदीप को लगा कि कहीं वो रो तो नहीं रहा। संदीप ने बहुत डरते-झिझकते बूढ़े के कंधे पर हाथ रखा। हाथ रखते ही संदीप को अपनी हथेली में झुरझुरी महसूस हुई। शायद बूढ़े को बहुत दिनों से किसी ने छुआ नहीं है। उसका शरीर स्पर्श की संवेदना को भूल चुका है, तभी तो संदीप के स्पर्श पर उसके शरीर ने असामान्य प्रतिक्रिया दी। बूढ़े का शरीर संदीप के स्पर्श पर सिहर रहा है।
‘‘आप चले क्यों नहीं जाते किसलय और हेतल के पास? अब यहाँ अकेले क्यों रह रहे हैं। आपकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है यहाँ। बच्चे तो बुलाते ही होंगे न अपने पास ?’’ संदीप ने यह प्रश्न बहुत हिम्मत कर के पूछा। यह प्रश्न चुभने वाला भी हो सकता है अगर परिस्थितियाँ विपरीत हों तो। लेकिन बूढ़े ने इस प्रश्न पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वह पहले की ही तरह सिर को झुकाए बैठा रहा। बूढ़े ने सिर को इस प्रकार झुका रखा है कि उसका चेहरा भी दिखाई नहीं दे रहा है संदीप को। उस पर सूरज के लगभग ढल जाने के कारण चारों तरफ़ हल्का साँवला अँधेरा बिखर गया है।
‘‘क्यों जाऊँ मैं.....? मैं ही क्यों जाऊँ....? एमएनसी मेरी सुनंदा को खा गई, अब मैं भी वहाँ चला जाऊँ...?’’ बूढ़ा उसी प्रकार सिर झुकाए हुए बुदबुदाया। ‘‘हम लोग जो साठ से नब्बे के दशक के बीच पैदा हुए, हम बहुत मूर्ख हैं। इन तीस सालों में मूर्ख ही पैदा हुए हैं..... इमोशनल फ़ूल्स..... हम जड़ों से उखड़ना नहीं चाहते। हमारी जड़ें जाने किस-किस प्रकार की मूर्खताओं में गड़ी रहती हैं, जिनको हम छोड़ना नहीं चाहते। नब्बे के बाद पैदा हुए तुम लोग हमारी तुलना में बहुत सुखी हो। तुम लोग इमोशनल नहीं हो, तुम लोग मूर्ख नहीं हो। तुम नॉस्टेल्जिक नहीं होते। तुम लोग अंदर से सूखे हुए हो। तुम लोग इंसान, पशु, पक्षी, वस्तुएँ, जगहें... किसी के साथ कभी अटैच नहीं होते हो, हर समय डिटैच मोड में रहते हो। हमें हमारे माँ-बाप ने पैदा किया था, तुम्हें एमएनसी और बाज़ार ने अपने लिए पैदा किया है। तुम्हें अंदर से सुखा दिया गया है। अच्छा किया है। इक्का-दुक्का तुम्हारे जैसे होंगे जो पूरी तरह से सूखने से बच गए हैं, इसलिए तुम उस किनारे के पेड़ में पानी डालते हो, तालाब में पैर डाल कर बैठते हो और...... और किसी बूढ़े को यहाँ अकेला बैठा देख कर उससे बातें करने चले आते हो। यह जो थोड़ी बहुत नमी तुम्हारे अंदर बची है, यह भी तुम्हारी कंपनी सुखा कर ख़त्म कर देगी महीने दो महीने में। कंपनियों को मॉइश्चर्ड वस्तुएँ नहीं पसंद हैं। नम चीज़ें भारी होती हैं, इस्तेमाल करने में कठिनाई होती है और उनमें फंगस लगने का भी ख़तरा रहता है। जैसे मुझमें लगा हुआ है। और नमी ही हमें अटैच करती है, सूखापन हमें हमेशा डिटैच करता रहता है। वो हमें कभी अटैच होने ही नहीं देता।’’ बूढ़े ने बहुत लम्बी बात को धीमे-धीमे, एक-एक शब्द को चबा-चबा कर बोलते हुए समाप्त किया।
चारों तरफ़ शाम का धुँधलका गहरा रहा है। फुटबाल खेलने वाले लड़के भी अब फुटबाल बंद करके एक पेड़ के पास इकट्ठा हो गए हैं, सभा विसर्जित करने के लिए। सिर में सिर मिलाए बातें कर रहे हैं और हँस रहे हैं। संदीप को पता है उनकी बातों का विषय क्या होगा। इस उम्र में बस एक ही तो फेंटेसी होती है जो सिर पर चढ़ी रहती है हर समय। उसे ऐसा लग रहा है जैसे कोने में लाल टी शर्ट पहना हुआ लड़का वह खुद ही है और काले लोवर में रवि खड़ा है। संदीप और रवि दोनो किनारे पर खड़े होकर अपनी-अपनी फेंटेसियों की बातें कर रहे हैं। रवि कुछ बोल्ड है, उसकी बातें कभी-कभी उस बिंदु तक भी पहुँच जाती हैं कि संदीप के गाल सुर्ख हो जाते हैं। रवि वह हर बात खुल कर कहता है, जिसे संदीप इशारों में कहने की कोशिश करता है। रवि.... जो पिछले महीने ही उड़ गया है कैनेडा। अब साल-दो साल में कभी एकाध बार भारत लौटेगा भी तो इस शहर में शायद एक-दो दिन को ही आएगा। यह शहर जहाँ उसके माँ-बाप बूढ़े होते हुए उसकी प्रतीक्षा में समय काटते रहेंगे। और किसी दिन मर-खप जाएँगे। उसके बाद रवि और इस शहर के बीच जो कुछ भी संपर्क था, वह भी समाप्त हो जाएगा। फिर रवि अगर भारत लौटेगा भी तो शायद यहाँ नहीं आए। क्यों आएगा ? फिर बचेगा ही क्या यहाँ पर। सोचते ही सोचते संदीप को लगा कि वह रवि के बारे में नहीं सोच रहा है, वह तो अपने ही बारे में सोच रहा है। कहानी तो वही है बस पात्र ही तो बदल रहे हैं। वह भी तो अब जब जा रहा है तो कैसे कह सकता है कि अब वह कब लौटेगा, और बैंगलूरू तक तो ठीक, उसके बाद अगर वह भी बाहर चला गया तो उसका भी तो वही होना है, जो रवि या किसलय या हेतल का हुआ है। जिसकी तरफ़ यह बूढ़ा इशारा कर रहा है। संदीप का हाथ अभी तक बूढ़े के कंधे पर ही रखा हुआ है, उसने धीरे से अपना हाथ वहाँ से हटा लिया।
‘‘अंकल समय के साथ सब कुछ बदलता है। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। हम सबको भी उसके साथ बदलना ही पड़ता है। बदले बिना हमारा काम नहीं चल सकता। मेरी पीढ़ी आपकी पीढ़ी से अलग है, आपकी पीढ़ी अपने से पहले वाली से अलग रही होगी। यह जो अलग होना है यही तो परिवर्तन है अंकल। अगर यह नहीं किया जाएगा, तो हम समय के साथ चल ही कैसे पाएँगे?’’ संदीप ने कुछ देर तक पसर गए मौन को तोड़ते हुए कुछ समझाइश वाले अंदाज में कहा। बूढ़े का सिर अभी भी झुका ही हुआ है, वह अभी भी नीचे ही देख रहा है।
‘‘यह तो वैसा ही कि आप ट्रेडमिल पर जॉगिंग के लिए खड़े हो, और उसकी स्पीड ख़ुद ही बढ़ाते जा रहे हो, और तेज़ और तेज़, और तेज़.... फिर कह रहे हो कि समय की गति बढ़ती जा रही है, इसलिए उसके साथ दौड़ने के लिए हमें भी अपनी गति बढ़ानी पड़ेगी। नहीं.... परिवर्तन कुछ नहीं होता.... जिस प्रकृति का नाम ले-लेकर हम परिवर्तन की दुहाई देते हैं, वह कब और कितना बदलती है? बताओ तो ? नहीं.... हम ही अपने समय को बदलते जा रहे हैं। पहले फैंटेसी को सच की तरह प्रस्तुत किया जाता था, उससे इमोशनल नुकसान होता था, लेकिन अब तो झूठ को फैंटेसी की तरह प्रस्तुत किया जाता है, उसका क्या नुकसान हो रहा है, यह तुम लोग कभी नहीं समझ पाओगे। यह हुआ है परिवर्तन।’’ बूढ़े ने बिना सिर को उठाए लगभग सपाट से स्वर में संदीप की बात का उत्तर दिया।
संदीप ने देखा कि शाम अब लगभग रात हो गई। तालाब का वह किनारा बिल्कुल सुनसान हो गया है। लैम्प पोस्ट पर लगे स्ट्रीट लाइट के हैलोजन बल्ब जल उठे हैं। उनकी ज़र्द पीली रौशनी कुछ देर पहले ढल चुके सूरज की धूप का स्थानापन्न बनने का असफल प्रयास कर रही है। आस-पास अब कोई नहीं है, बस संदीप और वह बूढ़ा ही वहाँ बैठे हैं। संदीप को लगा कि अब यहाँ से चलना चाहिए उसे भी और बूढ़े को भी।
‘‘चलिए अब छोड़िए इन बातों को। मेरी तो आपको सलाह है कि आप अपने बच्चों के पास चले जाएँ। वहाँ नाते-पोतियों के साथ आपका मन लग जाएगा। धीरे-धीरे आदत हो जाएगी। यहाँ रहेंगे तो आपको पिछली यादों में ही रहना होगा, और यादें आपको बार-बार परेशान करेंगी। आप बहुत इमोशन व्यक्ति हैं, आपका अकेले रहना ठीक नहीं है।’’ संदीप ने एक बार फिर से बूढ़े के कंधे पर हाथ रख दिया। इस बार बूढ़े के शरीर ने संदीप के स्पर्श पर कोई असमान्य प्रतिक्रिया नहीं दी। पहले जैसा कंपन संदीप को अपनी हथेली पर महसूस नहीं हुआ। कुछ देर तक बूढ़े ने कोई उत्तर नहीं दिया संदीप की बातों का। वह पहले की ही तरह सिर झुकाए जस का तस बैठा रहा।
‘‘क्यों जाऊँ ? क्या करूँगा वहाँ जाकर ? सुनंदा तो खाना बना लेती थी, छोटे बच्चों की केयर कर लेती थी, साफ-सफाई कर लेती थी। वह तो वहाँ जाकर बच्चों का जीवन थोड़ा आसान कर देती थी। मैं जाऊँगा तो मैं तो उनका जीवन और कठिन कर दूँगा। सुनंदा तो बच्चों के भी काम कर देती थी वहाँ। उसको तो आदत थी। मैं जाऊँगा तो उनके काम तो छोड़ो, मेरे काम भी उन ही लोगों को करने होंगे। मैं तो उनकी मुश्किलें बढ़ा दूँगा। इसलिए क्यों जाऊँ वहाँ उनको परेशान करने। उनकी ज़िंदगी को अव्यवस्थित करने।’’ बूढ़े ने सिर झुकाए हुए ही संदीप की बात का उत्तर दिया। बहुत देर से बूढ़े ने सिर नहीं उठाया है ऊपर, शायद वह अपने चेहरे के भाव छिपाना चाह रहा है संदीप से।
‘‘नहीं-नहीं अंकल, ऐसा नहीं है, यह तो आप सोच रहे हैं, आपके बच्चे ऐसा थोड़े ही सोचेंगे। आख़िर को प्यार करते हैं वो आपसे। आप उन पर बोझ कैसे हो सकते हैं। आप जाइए तो सही, मुझे विश्वास है कि वो आपको ज़रा सी भी परेशानी नहीं होने देंगे। मेरी बात मानिए चले जाइए उनके पास। प्लीज़...। प्लीज़ अंकल....।’’ इस बार संदीप ने अपनी जगह से उठ कर बूढ़े के एकदम सामने अपने घुटनों पर बैठते हुए दोनों हाथ बूढ़े के कंधे पर रखते हुए कहा। और अपनी आवाज़ में अधिकार का पुट घोलते हुए कहा संदीप ने।
‘‘नहीं रेक्स मैं नहीं जा सकता। वेताल होने का मतलब ही अभिशप्त होना है। हमें अपनी ही गुफ़ाओं में मरना होगा। मर कर गुफ़ाओं में ही दफ़्न होना होगा, जहाँ हमसे पहले के वेताल भी दफ़्न हैं। यह सिलसिला इसी प्रकार चलना है। अनंत काल तक। तुम बस एक काम करना, जब मैं चला जाऊँ तो बौने बांडारों से कहना कि वे बोलते नगाड़ों से संदेश पहुँचा दें किट और हेलोइस तक। उनको आना होगा तो आ जाएँगे... नहीं तो मुझे तो गुफ़ा में दफ़्न होना ही है। तुमने सुना नहीं, जब मैं तूफ़ान पर बैठ कर जंगल से निकलता हूँ तो पीछे से क्या आवाज़ें आती हैं- ‘वेताल का जीवन कितना एकाकी, वेताल का जीवन कितना एकाकी.....’ तो यह तो श्राप है एकाकीपन का, जिसे हम वेतालों को अकेले ही भोगना है। बिल्कुल अकेले......।’’ कह कर बूढ़ा कुछ देर को चुप हुआ फिर गुनगुनाने लगा ‘‘वेताल का जीवन कितना एकाकी, वेताल का जीवन कितना एकाकी.....’’।
संदीप ने बूढ़े के चेहरे को ऊपर उठाया अपने हाथों से। चौंक गया, बूढ़ा वहाँ था ही नहीं। बूढ़े की जगह उसके पापा बैठे थे। एकदम उसकी आँखों में आँखें डाले हुए। संदीप घबराया और चौंक कर पीछे हटा। पीछे पेड़ की एक जड़ में उसका पैर उलझा और वो पीठ के बल पीछे की तरफ़ गिर गया। सँभल कर उठने की कोशिश कर रहे संदीप ने देखा कि हैलोजन की पीली रौशनी में पापा का चेहरा बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दे रहा है। बिल्कुल पत्थर का बना हुआ चेहरा जैसे किसी मूर्ती का होता है, भावहीन चेहरा। पापा शून्य में देखते हुए गाना गा रहे हैं ‘‘वेताल का जीवन कितना एकाकी, वेताल का जीवन कितना एकाकी.....’’। संदीप उठा तो एक बार फिर से लड़खड़ाया, गिरते-गिरते बचा। मगर सँभल कर खड़ा हुआ और मुड़ कर तेज़ क़दमों से चल दिया। पीछे से गाने की और उसके साथ रोने की भी आवाज़ आ रही थी जो संदीप के तेज़ी के साथ चलने के कारण मद्धम होती जा रही थी। संदीप अब दौड़ रहा था... दौड़ता जा रहा था...।
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(समाप्त)