वेताल का जीवन कितना एकाकी..... (कहानी : पंकज सुबीर)

वेताल का जीवन कितना एकाकी.....
(कहानी : पंकज सुबीर)
("बहुवचन" के कहानी विशेषांक में प्रकाशित कहानी)

वह लगभग बूढ़ा आज भी उसी जगह पर बैठा है। गर्मी की उतरती हुई उदास शाम में किसी भूरे पत्थर से बनाए हुए स्टेचू की तरह स्थिर बैठा है। तालाब का वह किनारा जहाँ पानी हवा के थपेड़ों से समुद्र की लहरों की तरह आ-आकर किनारे को छूता है। ठीक वहीं। तालाब के किनारे एक पगडंडी जैसी कच्ची-पक्की सड़क है। जो सुबह शाम तालाब के किनारे घूमने के लिए बनाई गई है। यह पगडंडी तालाब के किनारे-किनारे साँप की तरह लहर खाकर गई है। दूर पहाड़ की तलहटी में जाकर आँखों से ओझल हो जाती है। पगडंडियों का दूसरा सिरा अक्सर कहीं नहीं होता। वे किसी धुँए की तरह हवा में घुल जाती हैं। पगडंडी के एक तरफ़ तालाब है और दूसरी तरफ़ पेड़ों की कतार है। इन पेड़ों के नीचे कहीं-कहीं कुछ सीमेंट की बेंचें बनी हुई हैं। यह कतार भी पगडंडी का सिरा पकड़ कर पहाड़ तक चली गई है। इस कतार में तरह-तरह के पेड़ हैं। आम, अमलतास, गुलामोहर, शिरीष, अशोक और कुछ अलग-अलग रंगों के फूलों के भी पेड़ हैं। कुछ लगाए गए हैं और कुछ बरसों पुराने हैं। एक पेड़ में लगे हुए फूल सूख कर लकड़ी बन जाते हैं और गिर पड़ते हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी ने नक़्क़ाशी कर के लकड़ी के फूल बनाए हों। ज़मीन पर इस प्रकार के बहुत से फूल बिखरे हुए हैं, पाँच पंखुड़ियों वाले लकड़ी के फूल। बच्चे इन्हें बीन कर ले जाते हैं और अलग-अलग रंगों से रँग कर घर में सजा देते हैं। कभी न मुरझाने वाले फूल बना देते हैं इनको। बचपन में संदीप ने भी ख़ूब इकट्ठे किए हैं ये फूल। शाम होते ही तालाब के किनारे दौड़ पड़ता था इन्हें बीनने।
उसी लकड़ी वाले फूल के पेड़ के नीचे उस बूढ़े की स्थाई बैठक है। वह बेंच पर नहीं बैठता, ज़मीन से उभरी हुई पेड़ की जड़ों के बीच बैठने की जगह उसने अपनी बना रखी है। जड़ों पर अधलेटा होकर बैठा रहता है वह। जहाँ वह बैठता है वहाँ से तालाब, उसके पीछे का पहाड़ और किनारे-किनारे जाती पगडंडी, पेड़ों की कतारें, सब किसी लैंडस्केप की तरह दिखाई देता है। गर्मी की उतरती हुई शाम में सड़क से खड़े होकर देखने पर यह पूरा लैंडस्केप बहुत उदास रंगों से रँगा हुआ केनवास दिखाई देता है। हल्के और भूरे रंगों से रँगा हुआ। वह बूढ़ा भी उन रंगों में समाया हुआ ही लगता है। उसके कपड़े भी अक्सर मिट्टी के रंग के, पत्थर के रंग के, पेड़ों के तने या जड़ों के रंग के ही होते हैं। उसका चेहरा भी मिट्टी के रंग का ही है, मिट्टी में गड़ी हुई, उभरी हुई पेड़ की जड़ों जैसा। इसीलिए वो बूढ़ा इस पूरे दृश्य में मर्ज हो जाता है, बिना कोई अतिरिक्त प्रभाव के। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे वहाँ बूढ़ा न होकर पेड़ की कुछ ज़्यादा उभरी हुई जड़ है कोई। या फिर भूरी मिट्टी का बना हुआ डूह है कोई। रंग और स्थिरता के कारण ऐसा लगता है। गिरगिट की तरह वह बूढ़ा अपने आस-पास की चीज़ों के जैसा अपने आप को कर लेता है। मानों वह भी गिरगिट की तरह छिपना चाहता हो, कि कोई उसे देख नहीं ले। और सचमुच अब हो भी ऐसा ही गया है, वहाँ आने-जाने वालों, वहाँ से गुज़रने वालों, किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वह बूढ़ा वहाँ पर बैठा है। वह निस्पृह-सा बैठा रहता है और पेड़ पर लकड़ी के फूल टूट-टूटकर उसके आस पास बिखरते रहते हैं। उन सूखे हुए फूलों के बीच बैठा वह सूखा हुआ बूढ़ा ऐसा लगता है जैसे अज़ल से इसी प्रकार बैठा हुआ है और न जाने कब तक ऐसे ही बैठा रहेगा।
संदीप चूँकि जानता है कि वह बूढ़ा वहाँ पर है, इसलिए उसे वहाँ बूढ़े की आकृति दिखाई दे रही है। संदीप पगडंडी के इस तरफ़ तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठा है तालाब के पानी में पैर डाल कर। बूढ़े के बारे में जो कुछ उसे पता है वह ये है कि ये बूढ़ा कुछ पागल है। अजीब-अजीब सी बातें करता है। संदीप ने तो नहीं की बातें; लेकिन जिन लोगों ने की हैं, उनका कहना है कि बूढ़े की बातें बेसिर-पैर की होती हैं। बातें करते समय जाने कहाँ-कहाँ के संदर्भों पर बातें करने लग जाता है। इन संदर्भों के बारे में बातें करते-करते वो आक्रामक भी हो जाता है। ग़ुस्सा हो जाता है एकदम। ऐसा लगता है जैसे अभी हाथापाई पर ही उतर आएगा। अक्सर मूल बात को छोड़ कर उन संदर्भों पर ही इस प्रकार बातें करने लगता है, मानों मूल चर्चा यही चल रही थी। जाने कौन-कौन से नाम लेता है, जगहों के, व्यक्तियों के, वस्तुओं के। कुछ नाम तो समझ में आते हैं, लेकिन कुछ तो बिल्कुल किसी अन्य भाषा के ही लगते हैं। ऐसी जगह जिसके बारे में पहले कभी सुना ही नहीं गया हो।
संदीप का दोस्त रवि एक बार आधे घंटे तक बूढ़े के पास बैठ कर आया था। आया, तो हैरान-परेशान आया था। जो भी एक बार उससे बात कर लेता है, वो दूसरी बार बूढ़े से बात करने की कोशिश भी नहीं करता। बूढ़ा भी अपनी तरफ़ से ऐसी कोई कोशिश नहीं करता है। उसे तो वैसे भी दुनिया से कोई मतलब है ही नहीं शायद। कोई आए, कोई जाए, उस बूढ़े को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। बस वह उसी प्रकार बैठा अपने आप में खोया रहता है। किसी से उसकी आँखें तक नहीं मिलती हैं, मुस्कुराना या दूसरा भाव व्यक्त करना तो फिर भी बहुत दूर की बात है। संदीप ख़ुद भी यहाँ नियमित शाम को टहलने आता है, लेकिन उसे याद नहीं कि बूढ़े से उसकी कभी नज़रें मिली हों। बूढ़ा वहाँ पर रहकर भी अनुपस्थित ही रहता है। एक-दो बार संदीप ने आते-जाते नज़र मिलाने की कोशिश की, लेकिन बूढ़े की आँखें कहाँ देख रही हैं, ये संदीप को समझ ही नहीं आया। किसी भी एंगल में खड़े हो जाओ, बूढ़े की आँखों से आँखें मिलती ही नहीं हैं। बूढ़ा गिरगिट की तरह भौतिक रूप से अदृश्य रहने के साथ-साथ हर तरह से अदृश्य रहने की कोशिश करता है। संदीप का मन कई बार होता है कि वह जाकर उस बूढ़े के पास बैठे, उससे बातें करे, लेकिन रवि के अनुभव सुनने के बाद डर रहता है। वैसे भी संदीप ख़ुद ही बहुत इण्ट्रोवर्ट है, बस अपने आप में ही खोया रहने वाला। ऐसे में दोनों एक समान ही हो जाएँगे, तो बातें क्या करेंगे। मगर फिर भी वहाँ लकड़ी के फूलों वाले पेड़ के नीचे बैठा हुआ वह बूढ़ा, संदीप के लिए वह दरवाज़ा है, जिस पर साफ लिखा है कि इस दरवाज़े को खोलना मना है और चूँकि यह लिखा है इसलिए ही संदीप का मन सबसे ज़्यादा उत्सुक होता है इस दरवाज़े को खोलने के लिए।
बूढ़ा शाम का झुटपुटा होते ही यहाँ आ जाता है। पैदल आता है। धीरे-धीरे टहलता हुआ आता है। कंधे पर झोला लटकाए। ठंड के दिनों में एक लम्बा ओवरकोट, सर पर ऊनी टोप और गले में मफलर डाले हुए आता है। बरसात में रेनकोट पहने, छतरी लगाए आता है। कोई भी मौसम हो आता ज़रूर है। आता है और चुपचाप जड़ों पर बैठ जाता है। वहाँ बैठ कर दूर तालाब के पीछे डूबते हुए सूरज को देखता है। देखता रहता है। सूरज का डूबना ही वो घटना है, जिसके बारे में कह सकते हैं कि बूढ़ा इसको देखता है। बाकायदा देखता है। वरना तो तालाब के किनारे क्या हो रहा है ? कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, वह आँख उठा कर भी नहीं देखता। लगभग एक घंटे का समय उसी प्रकार वहाँ बैठ कर व्यतीत करता है और फिर उठ कर उसी प्रकार मंथर गति से चलता हुआ पगडंडी से सड़क पर आता है, सड़क पर धीमे-धीमे चलता हुआ विलीन हो जाता है दिशा के धुँधलके में। रहस्य के कुहासे में खो जाता है अगले दिन तक के लिए।
संदीप ने एक नज़र लकड़ी के फूल के पेड़ की तरफ़ देखा, बूढ़ा अपने साथ लाए हुए झोले में से कुछ निकाल रहा है। कपड़े का यह झोला भी जब जड़ों पर रखा होता है, तो जड़ ही हो जाता है। बूढ़ा झोले में से कोई किताब निकाल रहा है। नहीं किताब नहीं है, शायद कोई पत्रिका है। पेड़ के नीचे जो हल्के-भूरे रंग का स्थाई साम्राज्य है उसमें झोले से अचानक निकाली गई यह रंग-बिरंगी पत्रिका किसी कौतुक की तरह आई है। बूढ़ा अब उस पत्रिका को पलट रहा है। यहाँ से देखने पर ऐसा लग रहा है कि वो पढ़ नहीं रहा है पत्रिका को, बस देख रहा है। किसी-किसी पन्ने पर हाथ भी फेर रहा है।
संदीप ने चारों तरफ़ देखा, आज अपेक्षाकृत कम लोग हैं तालाब के किनारे। बस वह बूढ़ा है, संदीप है और कुछ बच्चे हैं जो पेड़ों के पीछे छोटे से मैदान में फुटबाल खेल रहे हैं। इक्का-दुक्का लोग हैं जो आ-जा रहे हैं, लेकिन रुक नहीं रहे हैं। आज सीमेंट की बेंचें भी सारी ख़ाली पड़ी हैं। तालाब का यह किनारा अब कुछ महीनों तक ऐसे ही रहेगा, गर्मी के बीतते ही बरसात आ जाएगी। आने वालों की संख्या और कम हो जाएगी। फिर ठंड का मौसम आते ही तालाब का किनारा एक बार फिर गुलज़ार हो उठेगा। गर्मी आते ही लोग शाम की बजाय सुबह टहलना शुरू कर देते हैं। गर्मी की उमस भरी शाम में अपने-अपने वातानुकूलित घरों से निकलना किसे अच्छा लगता है ? आज तो आने वालों की संख्या और भी कम है। छुट्टियाँ होने के कारण शायद लोग यात्राओं पर भी निकल गए हैं। संदीप ने आस-पास देखा और कुछ देर तक सोचता रहा। फिर कुछ सोचता हुआ वहाँ से एकदम उठ गया और लकड़ी के फूल वाले पेड़ की तरफ़ बढ़ गया।
जब संदीप वहाँ पास पहुँचा तो बूढ़ा पत्रिका को देख कर वापस झोले में रख रहा था। इतनी सावधानी के साथ रख रहा था कि जैसे वह पत्रिका कोई ज़िंदा वस्तु है जिसे चोट लग सकती है। पत्रिका को सँभाल कर झोले में रखने के बाद बूढ़े ने झोले पर लगे बड़े-बड़े दोनों बटन लगा कर उसे बंद कर दिया। संदीप एकदम पास खड़ा था लेकिन बूढ़े ने मानों उसे देखा ही नहीं था। पेड़ की जड़ों पर ही बैठी हुई दो गिलहरियाँ संदीप की उपस्थिति को भाँप कर सजग हो गई थीं। ये गिलहरियाँ बूढ़े की उपस्थिति में बिल्कुल आराम से जड़ों पर फुदक रही थीं, मगर संदीप के आते ही दोनों हाथ हवा में उठा कर, कानों को सीधा खड़ा किए, नथुनों को फड़फड़ाते हुए आसन्न ख़तरे को भाँप रही थीं। कुछ देर तक संदीप को देखते रहने के बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा फिर फुदकती हुई भागीं। संदीप ने देखा कि वो दोनो गिलहरियाँ बूढ़े के ऊपर चढ़ कर फुदकती हुई दौड़ीं और बूढ़े के सिर पर से छलांग लगा कर पेड़ पर कूद कर सरपट ऊपर चढ़ गईं। बूढ़े पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ा। जैसे बूढ़े और गिलहरियों दोनों के लिए यह रोज़मर्रा की आम बात हो।
संदीप को पास आकर लगा कि बूढ़ा उतना भी बूढ़ा नहीं है जितना दूर से दिखाई देता है। अधिक से अधिक साठ साल का है वो। वो कपड़े जो दूर से देखने पर मटमैले, गंदे दिखाई देते हैं, वो असल में वैसे हैं नहीं, बस उनके रंग ही वैसे हैं। बूढ़े का चेहरा धूप खाया हुआ चेहरा है।
‘‘नमस्ते अंकल.....।’’ संदीप ने जब बूढ़े की ओर से उसके आने पर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आते देखी तो वह ख़ुद ही बोल पड़ा।
उत्तर में बूढ़े ने कुछ नहीं कहा, बस एक बार नज़र उठा कर संदीप की तरफ़ देखा। देखा भी आँखों में नहीं, बस यह देखा कि कौन है। बूढ़े की नज़रें संदीप के पैरों से चलती हुई बस आँखों के ठीक पहले आकर रुक गईं और लौट भी गईं। संदीप ने देखा कि बूढ़े की गर्दन बस एक बार हिली, मानों यही संदीप के अभिवादन का उत्तर हो।
‘‘मैं यहाँ आपके पास बैठ जाऊँ अंकल ?’’ संदीप ने कोई उत्तर नहीं आते देख अपनी तरफ़ से भरसक आवाज़ में नरमी रखते हुए पूछा। उत्तर में बूढ़े ने उस दिशा में एक उचटती-सी दृष्टि डाली जिस दिशा में संदीप खड़ा था। उस दिशा में, संदीप पर नहीं। फिर उसने अपना झोला जो पास ही एक जड़ पर रखा था, उठा कर अपनी गोद में रख लिया। संदीप को लगा कि यही संकेत है इस बात का कि बैठ जाओ। संदीप झोले को हटाने से ख़ाली हुए स्थान पर जाकर बैठ गया।
बैठने के बाद एक बार फिर मौन छा गया। संदीप ने बूढ़े को एकदम से पास से देखा। वह चुप बैठा बस बूढ़े को देखता रहा। देखता रहा या शायद ऑब्ज़र्व करता रहा। दो मिनट, पाँच मिनट, दस मिनट, समय बीतता रहा और संदीप वहाँ बैठा बूढ़े को समझने की कोशिश करता रहा। इससे पहले कि कोई बात शुरू करे, कम से कम समझ में तो आए कि बात किससे करनी है। उस पर बूढ़े को लेकर जो बातें उसके दिमाग़ में पहले से हैं, उनके चलते वह बात शुरू करने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहा है। उसने देखा कि बूढ़ा न कुछ देखता है, न सुनता है, उसकी आँखें किसी भी दृश्य को देखती नहीं हैं। बूढ़ा शायद किसी भी दृश्य को देखना ही नहीं चाहता है। उसके कान किसी भी ध्वनि को सुनते नहीं हैं। संदीप ने देखा कि बूढ़े की आँखें इतनी अभ्यस्त हैं कि वह सब कुछ देख ही नहीं रही हैं, जो बूढ़ा देखना नहीं चाहता। एक दो बार बच्चों की फुटबाल वहाँ आई, बच्चे उसे उठाने आए, संदीप ने वह सब देखा लेकिन बूढ़े की आँखों के लिए उस दृश्य को देखने का आदेश शायद बूढ़े की तरफ़ से नहीं आया था, इसलिए आँखों ने वह सब कुछ नहीं देखा। फुटबाल जब एकदम पास आकर धप्प से गिरी थी तो संदीप के कानों ने एकदम उस ध्वनि को सुनकर उसे सचेत किया, लेकिन बूढ़े के कानों ने ऐसा कुछ नहीं किया। कितनी अच्छी अवस्था है न ये, कि आपकी इंद्रियाँ केवल वही ग्राह्य करें, जो आप करना चाहते हैं। बाक़ी सब कुछ जो हो रहा है, चल रहा है, उससे आपकी इंद्रियाँ निस्पृह बनी रहें। कितने अभ्यास से किया होगा बूढ़े ने यह सब कुछ।
‘‘मेरा नाम संदीप है अंकल....।’’ संदीप को लगा कि बहुत देर हो गई है कहीं से बातचीत का कोई सिरा तो पकड़ना ही होगा इसलिए उसने बूढ़े की ओर देखते हुए कहा। संदीप को यह वाक्य मानों किसी ख़ला में जाकर बिला गया। बूढ़े के कानों ने उस पूरे वाक्य को इग्नोर कर दिया। वे पाँच शब्द जो उस वाक्य में थे, ब्लैक होल में समा कर नष्ट हो गए। कोई दृश्य बने और उसे देखा ही न जाए, कोई शब्द उत्पन्न हो और उसे सुना ही न जाए, तो कितना व्यर्थ होता है इनका उत्पन्न होना। बूढ़ा पहले की ही तरह बस हवा को देख रहा था। संदीप को चिढ़ सी हुई उस बूढ़े पर, ऐसा भी क्या वीतरागीपन कि कोई आपके ठीक पास आकर बैठा है, आपसे बातें कर रहा है और आप उस पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।
‘‘वॉकर.... क्रिस्टोफर किट वॉकर....।’’ बूढ़े की ही आवाज़ थी यह। मगर इतनी अस्पष्ट थी कि संदीप को सुनने के लिए पूरा ध्यान लगाना पड़ा। क्रिस्टोफर वॉकर....? बूढ़ा कहीं से भी विदेशी तो नहीं दिख रहा। यदि क्रिश्चयन भी है तो भी यहाँ भारत में क्रिश्चियंस के नाम इस प्रकार के नहीं होते हैं। यह नाम तो स्पेनिश या स्वीडिश अधिक लग रहा है। नाम और बूढ़े में कोई तालमेल ही नहीं दिखाई दे रहा है। मगर यह नाम कुछ सुना हुआ सा लग रहा है संदीप को। संदीप ने अपने दिमाग़ पर ज़ोर डाला कि कहाँ सुना है इस नाम को, मगर एकदम से कुछ याद नहीं आया कि यह नाम उसने कहाँ सुना या पढ़ा है। नाम की ध्वनि उसे बहुत सुनी हुई और परिचित सी लग रही है।
‘‘क्रिस्टोफर किट वॉकर.... बहुत अच्छा नाम है, आप क्रिश्चियन हैं ?’’ संदीप ने अपनी जिज्ञासा को प्रश्न में बदलते हुए कहा। इस प्रश्न पर संदीप को पहली बार बूढ़े की तरफ़ से कुछ प्रतिक्रिया दिखाई दी। और वह प्रतिक्रिया थी बहुत हल्के से चौंकने की प्रतिक्रिया।
‘‘कौन क्रिस्टोफर किट वॉकर...? मेरा नाम तो धनंजय है, धनंजय कुमार शर्मा।’’ बूढ़े ने इस बार थोड़ी सी स्पष्ट आवाज़ में कहा।  इस बार चौंकने की बारी संदीप की थी। इस बार बूढ़ा किसी दिशा में नहीं देख रहा था उसकी आँखें संदीप के चेहरे पर थीं। आँखों में नहीं थीं लेकिन चेहरे पर तो थीं आँखें। बूढ़ा कुछ बदला हुआ सा था। उसकी आवाज़ भी पहले जैसी नहीं थी। ऐसा लगा कि यह वो बूढ़ा नहीं है।
‘‘फिर क्रिस्टोफर किट वॉकर कौन है अंकल ? अभी-अभी आपने उसका नाम लिया था।’’ संदीप ने आवाज़ को संतुलित रखते हुए प्रश्न किया।
‘‘मैंने कब लिया ये नाम ? तुमने लिया है यह नाम तो, मैंने तो यह कहा कि मेरा नाम धनंजय कुमार शर्मा है।’’ बूढ़े की आवाज़ में एकदम नाराज़गी आ गई। संदीप को रवि की बात याद आ गई कि बूढ़ा बात-बात में तुनक जाता है। संदीप ने आगे इस नाम पर बहस नहीं करने का निर्णय लिया।
‘‘आप यहीं कहीं आस-पास रहते हैं या कहीं दूर से आते हैं टहलने यहाँ ?’’ संदीप ने नाम की बहस को बदल कर स्थान की चर्चा कर दिया। संदीप के शब्द एक बार फिर से जैसे उत्पन्न हुए थे वैसे ही समाप्त हो गए। कहीं कोई प्रभाव उन शब्दों का दिखाई नहीं दिया। बूढ़ा जो कुछ देर पहले कुछ सचेत सा दिख रहा था अब एक बार फिर से किसी प्रस्थान बिंदु पर जाकर खड़ा हो गया था। संदीप के लिए स्थिति फिर से असहज हो गई थी।
‘‘डेंकाली से....।’’ बूढ़े की आवाज़ एक बार फिर से बहुत अस्पष्ट हो गई। डेंकाली...? यह कौन सी जगह है ? इतने विचित्र नाम का कोई मेाहल्ला या कॉलोनी तो उसके शहर में नहीं है। आस-पास इस नाम का कोई गाँव या शहर भी नहीं है, बूढ़ा किस जगह की बात कर रहा है ये?
‘‘डेंकाली के जंगल से....।’’ बूढ़े की आवाज़ उसी प्रकार मद्धम है। डेंकाली का जंगल ? यह कौन सा जंगल है ? शायद उधर पहाड़ों के पार कोई आदिवासी बस्ती हो, ऐसे नाम तो आदिवासी गाँवों के ही हो सकते हैं। लेकिन यह बूढ़ा तो सड़क तरफ़ से आता है, इसे कभी पहाड़ों की तरफ़ से आते हुए नहीं देखा। डेंकाली के जंगल...? यह नाम भी संदीप को कुछ सुना हुआ सा लग रहा है, कहाँ सुना है यह नाम? 
‘‘वहाँ आपका घर है ?’’ संदीप ने हिम्मत बाँधते हुए पूछा। हिम्मत इसलिए कि बूढ़े का कुछ भरोसा नहीं कि अभी अपनी कही हुई बात से पलट जाए।
‘‘वहाँ भी है....।’’ बूढ़ा अभी भी ट्रांस में ही है। इस प्रकार बोल रहा है कि वाक्य का अंतिम शब्द बस अनुमान से ही समझना पड़ रहा है संदीप को कि हाँ यही शब्द होगा। संदीप को उलझन हुई कि इसके बाद अगला प्रश्न क्या पूछा जाए ? बूढ़ा कब क्या उत्तर दे दे।
‘‘कभी-कभी योरोप के एक पुराने क़िले में रहता हूँ, कभी रेगिस्तान में अपने वॉकर समतल पर रहता हूँ, कभी मित्र द्वीप पर तो कभी हवा महल में।’’ बूढ़े की बात पूरा होते ही संदीप को रवि की बात याद आ गई कि बूढ़ा न जाने किन-किन जगहों के, लोगों के नाम लेता है। हाँ बूढ़े की बात में ‘वॉकर’ शब्द आने से संदीप को यह पता चल गया कि बूढ़ा अब क्रिस्टोफर वॉकर होकर बात कर रहा है। संदीप ने बूढ़े को गौर से देखा, वह किसी ओर दुनिया में था, यहाँ इस पेड़ के नीचे नहीं था। संदीप को लगा कि बूढ़ा लगातार धनंजय शर्मा और क्रिस्टोफर वॉकर के बीच आवाजाही कर रहा है। यह कोई ड्यूल पर्सनालिटी वाली भी बात नहीं है, बूढ़ा या तो यहाँ पेड़ की जड़ पर बैठा होता है, या किसी यात्रा में होता है।
‘‘पढ़ते हो या जॉब कर रहे हो ?’’ इस बार बूढ़े ने संदीप के चेहरे की तरफ़ देखते हुए कहा। यह प्रश्न धनंजय शर्मा की तरफ़ से था, ऐसा संदीप को पूछने के अंदाज़ से लगा।
‘‘जी मैंने एमबीए किया है यहीं से। कैंपस सेलेक्शन भी हो गया है। बस अब पाँच-छह दिन में बेंगलूरू जाकर ज्वाइन करना है।’’ संदीप ने कुछ अदब के साथ उत्तर दिया। इस बार संदीप की कही हुई बात का एक-एक शब्द रिसीव किया गया। और उन शब्दों पर प्रतिक्रिया जैसा भाव भी बूढ़े के चेहरे पर दिखाई दिया। संदीप को अपनी बात पर बूढ़े की यह प्रतिक्रिया कुछ अच्छी नहीं लगी, वह दूसरी तरफ़ देखने लगा।
‘‘मतलब पाँच-छह दिन बाद तुम भी यहाँ नहीं दिखोगे ? वहाँ आकर तालाब में पैर लटका कर नहीं बैठोगे ? वहाँ उस किनारे पर लगे हुए पेड़ में तालाब से लाकर पानी नहीं डालोगे। यहाँ-वहाँ उग आई गाजर घास को उखाड़ कर नहीं फेंकोगे ।’’ बूढ़े के चेहरे पर और आवाज़ में पहली बार संदीप को उदासी का गहरा प्रभाव महसूस हुआ। इस बात ने संदीप को एक बार फिर से चौंका दिया। चौंका दिया इस बात पर कि वह तो यह समझता था कि बूढ़ा यहाँ आने-जाने वाले, यहाँ बैठने वाले किसी व्यक्ति पर कोई ध्यान ही नहीं देता है मगर यह तो सब देखता है, जानता है। वह यहाँ आकर क्या-क्या करता है, वह एक-एक बात बूढ़े को पता है। जैसे वह यही देखता हो बैठकर।
‘‘जी अंकल ... अब पढ़ाई पूरी हो गई है, तो अब तो जाना ही पड़ेगा। अब ज़िंदगी जहाँ ले जा रही है, वहाँ जाना ही होगा। और जाने में कुछ न कुछ तो पीछे छूट ही जाएगा। करियर, प्रोग्रेस यह सब भी तो ज़िंदगी में देखना ही होता है।’’ इस बार संदीप ने कुछ साफ़्ट आवाज़ में कहा।
‘‘ज़िंदगी कहीं नहीं ले जाती, हम ही जाते हैं, और इल्ज़ाम ज़िंदगी को दे देते हैं। और पीछे कुछ न कुछ छूटता तभी है जब हम छोड़ना चाहते हैं। वरना कोई ज़रूरी नहीं कि छोड़ा जाए।’’ बूढ़े ने काँपती आवाज़ में कहा। संदीप को लगा कि बूढ़े की आवाज़ कुछ भर्रा भी गई है। मगर बूढ़े के चेहरे को देख कर नहीं लग रहा कि वह भावुक हो रहा है। फिर संदीप को ऐसा क्यों लगा कि बूढ़े की आवाज़ भर्रा गई है।
‘‘आप क्या करते हैं अंकल...? मेरा मतलब आप कहीं गवर्मेंट जॉब करते हैं या...?’’ संदीप को पूछते हुए लगा कि उसका प्रश्न अपने आप में ही उलझ रहा है, वह जो कुछ बूढ़े से पूछना चाह रहा है, उसे पूछने में उसके शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। संदीप ने अपनी बात को बीच में ही छोड़ दिया। बूढ़े ने पूरी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। संदीप अपनी बात समाप्त कर चुप हो गया। कुछ देर की चुप्पी रही।
‘‘मैं..... वैसे यह बताना नहीं चाहिए लेकिन तुमको बता देता हूँ... मैं डेंकाली के जंगलों के जंगल गश्ती दल का कमांडर हूँ। अज्ञात कमांडर....। वही, जिसके बारे में किसीको भी नहीं पता है।’’ बूढ़े की आवाज़ इस बार और भी ज़्यादा अस्पष्ट हो गई। अंतिम वाक्य हवा की सरसराहट की तरह था। संदीप को आवाज़ की लरज़िश से ही पता चल गया कि यह क्रिस्टोफर वॉकर है। मगर यह है कौन ?
‘‘अब मैंने वी आर एस ले लिया है, वालेंटरी रिटायरमेंट... पहले मैं जॉब में था, गवर्मेंट जॉब में....। फिर ऐसा लगा कि अब कोई मतलब नहीं है जॉब करने से। किसके लिए किया जाए। तो बस रिटायरमेंट ले लिया। अपने आप को मुक्ति देना भी ज़रूरी होता है। समय पर अपने आप को मुक्त कर देना चाहिए। कम से कम कुछ साँस तो आ सके।’’ इस बार सधी हुई आवाज़ में कहा बूढ़े ने, यह आवाज़ धनंजय शर्मा की है।
संदीप ने इस बीच चुपचाप से अपने मोबाइल में गूगल सर्च पर क्रिस्टोफर वॉकर अंग्रेज़ी में लिख कर सर्च किया। बहुत से रिज़ल्ट सामने आ गए। उसने दूसरे नंबर पर दिख रही विकीपीडिया की लिंक पर क्लिक किया, तो विकीपीडिया का पेज सामने आ गया। छोटा सा पेज जिसमें बस तीन सूचनाएँ थीं। क्रिस्टोफर जे. वॉकर -ब्रिटिश हिस्टोरियन, क्रिस्टोफर वॉकर -जिब्राल्टेरियन ट्राय एथेलीट एंड सायक्लिस्ट, क्रिस्टोफर किट वॉकर -द रियल नेम ऑफ कॉमिक बुक कैरेक्टर द फैंटम। शुरू के दो नाम तो नहीं हो सकते, यह तीसरा..... कॉमिक बुक कैरेक्टर द फैंटम... यहीं से कुछ संकेत मिल सकता है। संदीप ने द फैंटम लिख कर गूगल को इमेज सर्च पर डाल दिया। कई सारी तस्वीरें उसके सामने खुल गईं। फैंटम की...। ओ तो ये है क्रिस्टोफर वॉकर उर्फ़ फैंटम....। यह तो कॉमिक बुक का कैरेक्टर है, सुपर हीरो वेताल। हिन्दी में भी यह कॉमिक्स आ चुका है, लेकिन हिन्दी में इसका नाम फैंटम नहीं था वेताल था। संदीप के पापा की लाइब्रेरी में रखी हैं ये कॉमिक्स सीरीज़, और कई बार अपने पापा को उन्हें पढ़ते हुए भी देखा है। उसे बड़ा अजीब लगता है पापा को कॉमिक्स पढ़ते हुए देख कर। बचपन में उसने भी पढ़ा है इन कॉमिक्स को, पापा से माँग कर। देते समय हर बार पापा का वही इन्स्ट्रक्शन ‘सँभाल कर पढ़ना....और पढ़ कर वापस वहीं रख देना जहाँ से उठाई थी।’ बड़ा होने के बाद उसने तो पढ़ना छोड़ दिया मगर पापा को वह अब भी पढ़ते देखता है कभी-कभी। जब भी पापा इनको पढ़ते हैं तो उनके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून दिखाई देता है।
वैसे तो उसका बचपन कॉमिक्स पढ़ने वाला बचपन नहीं रहा। उसका बचपन तो टीवी पर कार्टून शो देखने वाला बचपन रहा है। कॉमिक्स तो तब तक बीते समय की बात हो चुके थे। उसके बचपन में डोरीमॉन, पॉकीमॉन, ऑगी एंड काकरोचेज़ जैसे टून कैरेक्टर शामिल हैं। लेकिन उसने पापा की लाइब्रेरी से निकाल-निकाल कर वेताल के लगभग सारे कॉमिक्स पढ़े। वेताल.. जो जंगल में रहता है, अजीब सी बैंगनी रंग की पोशाक पहनता है, आँखों पर काला चश्मे जैसा नकाब। पोशाक के ऊपर काले-नीले धारियों वाला अंडरवियर, उस पर खोपड़ी का निशान, कमर पर बँधी हुई मेखला और उस पर दोनों तरफ़ टँगे हुए रिवाल्वर, पैरों में काले लम्बे गम बूट, लगभग घुटनों तक के। उँगली में एक अँगूठी, जिस पर खोपड़ी बनी है, जब भी किसी गुंडे को घूँसा मारता है तो उसके चेहरे पर खोपड़ी का निशान बन जाता है, जो कभी नहीं मिटता। अच्छे लोगों के लिए वह एक स्वास्तिक की तरह का चिह्न छोड़ता है, सुरक्षा का। बचपन में वो पापा की लाइब्रेरी से उठा लाता था इन कॉमिक्स को। पुराने और पीले पड़ चुके पन्नों को बहुत आहिस्ता-आहिस्ता पलट कर पढ़ता था। पापा ने बहुत सँभाल कर रखा हुआ है उन्हें आज भी। डेंकाली के जंगल... हाँ ये नाम वहीं तो सुना था। डेंकाली के जंगल में ही तो खोपड़ीनुमा गुफा में रहता है वेताल, जिसकी पहरेदारी ख़तरनाक बौने करते हैं। ख़तरनाक बोने बांडार। वेताल की पोशाक उसे पूरी तरह ढक लेती है, उसका चेहरा क्या शरीर का कोई भी हिस्सा ज़रा सा भी नहीं दिखता, जंगल में कहते हैं कि वेताल चेहरा जिसने देख लिया वो ज़िंदा नहीं बचता।
‘‘आख़िरकार हर बात की कोई तो सीमा होगी। कब तक बस यूँ ही एक ढर्रे में बँधी ज़िंदगी को जीते जाइए। अपने लिए जहाँ कोई समय नहीं हो, बिल्कुल भी समय नहीं हो। बस यही सोच कर मैंने रिटायरमेंट ले लिया। कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल घूमते हुए अपना ही तेल निकल गया पूरा। वास्तव में कोल्हू में तेल तिल्ली का नहीं निकलता है, तेल तो बैल का ही निकलता है।’’ बूढ़े ने कुछ कठोर आवाज़ में कहा। संदीप ने बूढ़े के चेहरे की ओर देखा। इस बार फिर वहाँ पर कुछ भाव नज़र आ रहे थे। तल्ख़ी के भाव। नाराज़गी के भाव। संदीप ने बूढ़े के चेहरे पर ग़ुस्सा देखा तो उसे रवि की बात एक बार फिर से याद आ गई। मगर कुछ ही देर में बूढ़े के चेहरे के भाव सामान्य हो गए।
‘‘आपके घर में कोई नहीं है क्या। मतलब आंटीजी, बच्चे.... आपका परिवार ?’’ संदीप ने बूढ़े के चेहरे के भाव सामान्य होते हुए देखे तो तुरंत प्रश्न किया। बूढ़े ने कोई उत्तर नहीं दिया। पेड़ पर से एक गिलहरी बूढ़े के कंधे पर कूदी और वहाँ से सर्राते हुए पीठ से होती हुई ज़मीन पर कूद का दूसरी ओर भाग गई। संदीप का पूरा का पूरा प्रश्न मानों एक बार फिर किसी अँधेरी गुफा में समा गया। संदीप को याद आया कि वेताल जिस गुफा में रहता है वो भी तो अँधेरी गुफा है, खोपड़ीनुमा अँधेरी गुफा, जिसमें खोपड़ी के निशानों वाला उसका सिंहासन है।
‘‘हैं न, पूरा परिवार है मेरा। डायना है, दो बच्चे हैं किट और हेलोइस, मेरा घोड़ा तूफ़ान है, भेड़िया शेरा, बाज़ फ्राका और रेक्स है। और बांडार बौनों का मुखिया गुर्रन भी हमेशा मेरे साथ रहता है। बूढ़े बाबा मोज्ज भी साथ ही बने रहते हैं। और हाँ मुझ से पहले वाले बीस वेताल भी तो मेरे साथ ही रहते हैं, वो भी तो उसी गुफा में दफ़्न हैं, जिसमें मैं रहता हूँ....मेरे साथ, इक्कीसवें वेताल के साथ। दुनिया की नज़र में वेताल अमर है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है, वेताल का बेटा अपने पिता के मरने के बाद उसे गुफ़ा में ही दफ़्न कर देता है और उसकी पोशाक पहन कर दुनिया के सामने आ जाता है, वेताल बन कर। इसीलिए दुनिया की नज़रों में वेताल कभी नहीं मरता। वह हमेशा ज़िंदा रहता है, वह अमर है कभी नहीं मरेगा वो।’’ बूढ़ा बुदबुदा रहा है। मतलब वह एक बार फिर से क्रिस्टोफर किट वॉकर बन चुका है।
बूढ़े की बातों में पहली बार ‘वेताल’ नाम भी आया है, संदीप का अनुमान बिल्कुल सही है। संदीप को अब बूढ़े के बात करने का पैटर्न समझ में आ गया है। बूढ़ा धनंजय शर्मा और वेताल या क्रिस्टोफर किट वॉकर के बीच रह-रह कर ट्रांस्फार्म करता है। और यह ट्रांस्फार्मेशन इतनी तीव्र गति से होता है कि सुनने वाला कुछ समझ ही नहीं सकता कि अचानक ये क्या हो गया है। रवि जो कह रहा था कि बूढ़ा जाने किन लोगों, जगहों की बातें करता है, तो वह यही बातें हैं। अभी बूढ़े ने जो नाम लिए हैं, इन नामों को संदीप जानता है। यह वेताल का परिवार है। उसकी पत्नी डायना पामर, जुड़वाँ बच्चे किट और हेलोइस, गोद लिया बेटा रेक्स, और उसके जानवर। वेताल की कॉमिक्स में यह उसके साथ आने पाले पात्र हैं। वेताल की पत्नी डायना पामर वॉकर को बहुत ख़ूबसूरत दिखाया गया है कॉमिक्स में। जब पहली बार उसने कॉमिक्स में डायना को देखा था तो उसे क्रश हो गया था डायना पर। ठीक-ठाक रूप से डायना उसका पहला क्रश थी। बाद में उसने कॉमिक्स वेताल के लिए नहीं पढ़े बल्कि डायना के लिए ही पढ़े, बस डायना को देखने के ही लिए।
‘‘क्या होता है परिवार? कुछ लोग जो आपके साथ जुड़ते हैं, कुछ दूर तक साथ चलते हैं फिर उसके बाद अचानक एक दिन छोड़ जाते हैं हमें, एक दम अकेला... बहुत सारी यादों के साथ...।’’ बूढ़े ने इस बार कुछ स्पष्ट आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में तल्ख़ी और उदासी दोनों का सम्मिश्रण था।
संदीप ने देखा सामने तालाब के उस सिरे पर सूरज का लाल-सिंदूरी गोला बस तालाब के पानी को छूने ही ही वाला है। तालाब के पानी में अभी से सूरज की लाल-सिंदूरी रंग घुल रहा है। जब सूरज एकदम डूबने पर आ जाता है उस समय एक विचित्र प्रकार की शांति छा जाती है चारों तरफ़, जैसे सूरज के जाने का मातम छा गया हो। पशु-पक्षी, प्रकृति सब एकदम मौन साध लेते हैं सूरज के डूबते समय। विज्ञान कहता है कि सूरज कहीं नहीं जाता, लेकिन प्रकृति को देखें तो उसके व्यवहार से तो यही लगता है कि सूरज जा रहा है, विदा हो रहा है।
‘‘मेरे दो बच्चे हैं.... किसलय और हेतल... हेतल नाम मेरे एक गुजराती दोस्त ने रखा था, मुझे बेटी का नाम  ‘हे’ से ही रखना था और बेटे का ‘कि’ से.... होता है न कोई नॉस्टेल्जिया....। बहुत खोजने पर मिले थे ये नाम। किसलय और हेतल। अब दोनों यूएस में जॉब कर रहे हैं। शादी भी हो गई है दोनों की। फैमिली के साथ वहीं सैटल होने का लगभग फाइनल कर लिया है उन लोगों ने। बढ़िया पैकेज मिलता है। बेटा-बहू और बेटी-दामाद चारों ही इस प्रकार के पैकेज पा रहे हैं। अपना पूरा समय अपनी कंपनियों को बेच दिया है। उसके बदले में डॉलर्स मिल रहे हैं। हरे-हरे डॉलर।’’ बूढ़े की आवाज़ में थकान आ रही है। उदासी जब गहरी होती है तो वह भी थकान का भ्रम पैदा करती है।
संदीप ने बूढ़े की बात समाप्त होने के बाद कुछ नहीं कहा। उसके पास कुछ कहने को नहीं था इसके बाद। उसकी भी तो यही स्थिति है। वह भी तो जा रहा है इसी प्रकार पैकेज पर। एक यूएस बेस्ड एमएनसी में। कुछ साल यहीं इंडिया में काम करना है उसके बाद अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा, उसका परफार्मेंस अच्छा रहा, तो उसके भी यूएस जाने के चांसेस हैं। संदीप को याद आया, उसके एमएनसी में बैंगलूरू जाने की बात पर पापा ने बहुत धीमे से कहा था -‘इतनी दूर जाने की क्या ज़रूरत है ? अब तो अपने आस-पास भी अच्छी कंपनियाँ आ गई हैं। यहाँ भी जॉब तो मिल ही सकता है।’ संदीप मम्मी-पापा की इकलौती संतान है। संदीप ने कुछ रूखे स्वर में कहा था -‘यहाँ जॉब तो है, पर न उन जॉब्स में कोई फ्यूचर है और न कोई बढ़िया पैकेज है। अभी बाहर नहीं निकलूँगा तो यहीं पर सड़ के रह जाऊँगा।’ संदीप को अब भी याद है कि उसके ‘सड़ के रह जाऊँगा’ कहने पर पापा ने चश्मे में से उसकी आँखों में आँखें डाल कर देखा था। जैसे संदीप की कही हुई बात से उन्हें चोट पहुँची हो।
‘‘आपने लव मैरिज की थी अंकल या आपकी अरेंज मैरिज हुई थी ?’’ संदीप को पापा की आँखें याद आते ही अपने अंदर एक झुरझुरी सी महसूस हुई। उसने अपने आप को असहज होने से बचाने के लिए एक हल्का प्रश्न बूढ़े से पूछ लिया। बूढ़ा अपनी गोद में रखे झोले पर हाथ फेर रहा है।
‘‘लव मैरिज़... मेरी डायना के साथ लव मैरिज हुई थी, डायना पामर के साथ। पता है कहाँ हुई थी ? कीलावी में समुद्र के सुनहरे तट पर, जहाँ आधी रेत है और आधा सोना है। कीलावी का अर्थ जानते हो ? कीलावी का अर्थ होता प्यार, इसलिए कीलावी के तट पर जाने के लिए ज़रूरी है कि आपके दिल में प्यार हो। जंगल में कहा जाता है कि ‘जो बिना प्यार के कीलावी के तट पर आए, उसे यहीं मरने दो...’। वाम्बेसी पुरोहितों ने पहले हमारी शादी करवाई, फिर उसके बाद हम दोनो कीलावी के समुद्र में जाकर नहाए..... खूब नहाए... उसके बाद समुद्र से निकल कर हम परंपरा अनुसार सुनहरे तट की रेत में लोटे, एक-दूसरे पर हमने सुनहरी रेत डाली। वह सुनहरी रेत हमारे शरीर से चिपक गई। और उसके बाद हमने मणि महल में प्रवेश किया। मणि महल, जो किसी अश्वेत राजा ने कीलावी के सुनहरे तट पर अपनी पत्नी के साथ सुहागरात मनाने के लिए बनाया था। मगर बाद में उसकी पत्नी की प्रसव के दौरान मौत हो गई। उसके बाद वो राजा कभी वहाँ नहीं लौटा, लौटता तो पत्नी की यादें उसे वहाँ घेरतीं। हमने परंपरा के अनुसार उसी मणि महल में प्रवेश किया। और जैसी परंपरा है मणिमहल के बाद जंगल में जाना पड़ता है। हम भी मणिमहल से जंगल की ओर निकल गए। मणिमहल के बाद जंगल में जाना हमारे समय की नियति है। पहले विवाह, फिर समुद्र के पानी में जाना, फिर सुनहरी रेत में लोट लगाना, फिर मणिमहल और अंत में जंगल..... यही तो है हम सबका जीवन... कहीं कोई बदलाव नहीं है। थोड़ा या ज़्यादा हम सबका जीवन ऐसे ही बीतता है। बस ऐसे ही.....।’’ बूढ़े का पूरा व्यक्तित्व जैसे वह कहते समय वहाँ से अनुपस्थित हो चुका है। संदीप वहाँ है नहीं, और वह ये बातें संदीप से नहीं कर रहा है। मानों किसी अज्ञात से बातें कर रहा है वो बूढ़ा।
जब भी बूढ़ा क्रिस्टोफर किट वॉकर उर्फ वेताल में ट्रांस्फार्म कर जाता है, तो संदीप के पास पूछने को कोई प्रश्न या करने के लिए कोई बात नहीं होती है। इस प्रकार की बातों पर वो क्या कहे आगे। बिना सिर-पैर की बातें। बूढ़े की आँखें अब डूबते हुए सूरज की ओर स्थिर हैं। संदीप भी उस दिशा में ही देखने लगा जिस दिशा में बूढ़ा देख रहा है। बूढ़ा जिन जगहों और चीज़ों की बातें कर रहा है वो सारी वेताल के कॉमिक्स की हैं। कीलावी का सुनहरा तट, मणि महल और वाम्बेसी पुरोहित।
‘‘हर बार यही सोच कर मन को तसल्ली होती है कि बच्चे अपनी ज़िंदगी में सैटल हो गए हैं। उनकी ज़िंदगी अब व्यवस्थित हो गई है। मगर बीच में यह भी ख़याल आता है कि उनकी ज़िंदगी तो व्यवस्थित हो गई, मगर हमारा क्या ? हमें क्यों उजाड़ा गया ? हमने बच्चों को पैदा किया, पाला, पढ़ाया, बड़ा किया..... तुम कह सकते हो कि यह तो हर माँ-बाप का काम ही है, उसमें हमने नया क्या किया। मगर इन सबमें हमने बहुत बार अपनी इच्छाओं को मारा। बहुत कुछ ऐसा किया जो हम नहीं करना चाहते थे। मैं गवर्मेंट जॉब में था, जब बच्चों की इच्छाओं का ख़र्च सैलेरी से पूरा नहीं कर पाया, तो मैंने भ्रष्टाचार शुरू किया। रिश्वत लेना, ग़लत काम करना, सब शुरू किया। मैं मोह में फँस गया था अपने बच्चों के। मैं उन्हें सब सुख देना चाहता था। और उसी के लिए मैंने, जो उस समय तक ग़लत को ग़लत ही मानता था, वही करना शुरू कर दिया। जिस दिन मैंने पहली बार रिश्वत ली थी, उस दिन रात भर मुझे अपने मुँह में ख़ून का स्वाद आता रहा था। कई बार कुल्ला किया, पानी पिया, मगर वह स्वाद रात भर रहा। फिर उसकी आदत हो गई मुझे।’’ कहते हुए बूढ़ा सूरज की ओर देखते हुए कुछ क्षण को चुप हो गया ‘‘पैदा किया, पाला, पढ़ाया किसके लिए ? मल्टी नेशनल कंपनियों के यहाँ ले जाकर बेचने के लिए। हमने बच्चों को थोड़े ही पाला था, हमने तो एमएनसी के ग़ुलामों को पाला था। पाला था कि हमारे ग़ुलाम अच्छे दामों में वहाँ बिक सकें। बिक गए... सचमुच अच्छे ही दामों में बिक गए..... डॉलर्स में बिके.... मगर हमें बेचने के बाद भी कुछ नहीं मिला। एमएनसी को ग़ुलामों की ज़िंदगी का कंट्रोल मिला और ग़ुलामों को डॉलर्स मिले.... हमें.... हमें कुछ नहीं मिला... हम तो उजड़ ही गए....।’’ बूढ़ा जब धनंजय शर्मा हो जाता है तो उसकी आवाज़ में उदासी कभी अकेले नहीं आती है। उदासी के साथ हमेशा गहरा तंज़ रहता है। अपने आप पर तंज़। और इसी तंज़ के कारण उसके होंठ एक तरफ़ से कुछ तिरछे हो जाते हैं। चेहरा विकृत जैसा होने लगता है उसका।
संदीप को याद आया कि दो-तीन दिन पहले जब हर महीने की तरह वह मम्मी को महीने भर का राशन ख़रीदवाने के लिए मॉल लेकर गया था, तो इस बार मम्मी ने बहुत सारी रेगुलर ख़रीदी जाने वाली चीज़ें नहीं ख़रीदी थीं। कस्टर्ड, चोकोस, केक मिक्स, बादाम, अखरोट, मैगी, चॉकलेट्स, टॉफियाँ, बिस्किट्स, ऐसे बहुत से आइटम थे जो हर महीने की लिस्ट में सबसे पहले ख़रीदे जाते थे, उनको मम्मी ने नहीं ख़रीदा था। इनमें से कुछ सामान तो आदत के कारण उठा कर ट्रॉली में रख भी लिया था मम्मी ने फिर बाद में हटा दिया था। उसने मम्मी से पूछा भी था कि यह सब क्यों नहीं ख़रीद रही हो इस बार। मम्मी का उदास सा उत्तर आया था ‘अब कौन खाएगा इन्हें? बेकार पड़े रहेंगे....।’ उत्तर देने के साथ ही मम्मी की आँखें पनीली हो गईं थीं। किनारों से नमी छलक आई थी, जिसे उन्होंने बहुत सफाई से रूमाल में सोख लिया था। संदीप को अपने अंदर भी उस दिन कुछ पिघलता हुआ महसूस हुआ था। बहुत ज़्यादा नहीं, बहुत हल्का सा कुछ महसूस हुआ था। उस दिन ट्रॉली आधी भी नहीं भरी थी, जबकि हर बार यह होता था कि बहुत सा सामान मम्मी ढूँढ़-ढूँढ़ कर ट्रॉली में डालती थीं, और एक ही बात कहती थीं ‘यह तुझ पसंद है न, इस बार कुछ अलग तरीक़े से बनाऊँगी इसे...।’ उनके चेहरे पर एक अजीब सा उल्लास, एक अजीब सा प्रकाश होता था यह कहते समय। किसी गहरे आंतरिक सुख का प्रकाश, किसी अंदरूनी शांति का उल्लास। लेकिन उस दिन उनके चेहरे पर वह सब कुछ नहीं था, उसकी जगह एक गहरी उदासी थी, एक सन्नाटा था। उस दिन कैश काउंटर पर पैमेंट करते समय मम्मी ने होम डिलेवरी के बारे में भी जानकारी ली थी, जबकि पहले जब भी संदीप ने कहा था होम डिलेवरी से मँगवाने को, तो उन्होंने झिड़कते हुए हर बार मना किया था ‘अपने हाथ से जाकर सामान लाना चाहिए। होम डिलेवरी में तो वो सब सड़ा-गला सामान भेज देते हैं।’ उस दिन चलते समय मम्मी ने होम डिलेवरी का नंबर वगैरह भी लेकर अपने मोबाइल में फीड कर लिया था।
‘‘डेंकाली के जंगलों में जो फुसफुसाते कुंज हैं, वो असल में यादों के कुंज हैं, हम सब उन यादों में फँस जाते हैं। जब हवा उस कुंज में खड़े हुए पेड़ों को छूकर गुज़रती है, तो पेड़ फुसफुसाने लगते हैं। व्हिस्परिंग फॉरेस्ट ऑफ स्वीट मेमोरीज़। मैं जब भी तूफ़ान पर सवार होकर शेरा के साथ वहाँ से गुज़रता हूँ, तो वो पेड़ किट-हेलोइस-डायना, किट-हेलोइस-डायना, फुसफुसाने लगते हैं। पहले यह पेड़ वेताल-वेताल फुसफुसाते थे मेरे वहाँ से गुज़रने पर, मगर अब......।’’ बूढ़े की आवाज़ बहुत थकी हुई लग रही है। जैसे बहुत लम्बी यात्रा करके आया हो वो।
पिछले कुछ दिनों से संदीप को घर में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस हो रहा है। वही सन्नाटा जो अभी डूबते सूरज के कारण तालाब के किनारे पर हो रहा है। कुछ दिनों से घर बहुत चुप-चुप है। वह घर जो खिलखिलाता था, जगमगाता था, आजकल बुझा हुआ है, चुप है। पापा इतनी ख़ामोशी के साथ घर में आते हैं कि उनके आने की आहट न हो जाए कहीं। मम्मी, बहुत मद्धम हवा की तरह घर में चल रही हैं। किसी सरसराहट की तरह उनके आने-जाने को महसूस कर रहा है संदीप। ऐसा लग रहा है जैसे घर किसी अँधेरी और बंद गुफ़ा में कन्वर्ट हो गया है, जहाँ प्रकाश, हवा, ऊष्मा यह सब अचानक आने बंद हो गए हैं। और एक घुटन, सीलन और अँधेरा ही हर तरफ़ फैल गया है। हर वक्त ऐसा लगता है जैसे घर के अंदर एक ठंडा कोहरा फैला हुआ है, सीला-सीला सा कोहरा, जिसके आर-पार होकर घर में रहने वाले तीनों लोग एक-दूसरे को देख ही नहीं पा रहे हैं। देखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कोहरा और घना और घना होता ही जा रहा है। संदीप ने देखा बूढ़ा अपने झोले को और ज़्यादा कस कर पकड़े हुए डूबते सूरज की ओर टकटकी बाँधे हुए है। संदीप को पहली बार बूढ़े पर दया आई।
‘‘और आंटी.... वो कहाँ हैं आजकल ? यहीं हैं या बच्चों के पास यूएस में हैं?’’ संदीप ने बूढ़े को सहज करने के लिए प्रश्न किया। उसे पता है कि जिन माँ-बाप के बच्चे यूएस में सैटल हो गए हैं, उनकी माँएँ अक्सर अपने पति को भारत में छोड़कर अमेरिका के चक्कर काटती रहती हैं। नाती-पोतों को पालने के लिए, बड़ा करने के लिए। मोह में बँधी हुई चौदह-पंद्रह घंटों की कष्टप्रद यात्रा करते हुए आवाजाही करती रहती हैं। जीवन भर कभी हवाई जहाज़ में नहीं बैठने वाली ये हाउस वाइफें लम्बी-लम्बी यात्राएँ बच्चों के लिए करती हैं, करती रहती हैं। संदीप का प्रश्न बूढ़े को सामान्य करने के लिए था, लेकिन उस प्रश्न से बूढ़े पर कोई भी फ़र्क़ नहीं पड़ा, वह पहले की ही तरह उसी मुद्रा में बैठा रहा।
‘‘कौन....? डायना....? डायना पामर वॉकर...? वह पहले यहीं थी.... फिर किट और हेलोइस जब सात समंदर पार चले गए तो उसका जीवन वेताल और बच्चों के बीच बँट गया। कभी जंगल में रहती वेताल के पास, तो कभी सात समंदर पार उड़ कर जाती। वेताल शिखर के पास हवाई जहाज़ उसको लेने आ जाता और वो उड़ जाती। भूल कर अपने घुटने का दर्द, लो बीपी, शुगर, कोलेस्ट्राल... सब कुछ भूल कर अकेले ही हवाई यात्रा पर निकल जाती। मैं उसे वेताल शिखर के पास तक छोड़ देता। उसके बाद वो अकेली ही जाती। बिल्कुल अकेली...। डायना, जो कभी रेल में भी अकेली नहीं गई, वो जाने किस आकर्षण में बँधी निकल पड़ती अकेली ही। लौटती तो बहुत थकी हुई होती। यहाँ आते ही उसके घुटने दर्द से कराहने लगते। बीपी लो होने लगता। जंगल में अब उसका मन नहीं लगता था। उसके पखेरू सात समंदर पार थे। वह अपना मन वहीं छोड़ कर आती, जंगल में तो बस उसका बीमारियों से टूटा हुआ शरीर ही लौटता था। फिर एक दिन....... जंगल से सात समंदर पार और सात समंदर पार से जंगल की यात्रा करते-करते तन टूट गया। वह सारी यात्राएँ स्थगित करके और लम्बी यात्रा पर निकल गई। बहुत लम्बी यात्रा पर। किट, हेलोइस, वेताल, सबको पीछे छोड़कर निकल गई वो....।’’ बूढ़े की आवाज़ बहुत हल्के से काँप रही है। संदीप ने गौर से देखा कि कहीं बूढ़ा रो तो नहीं रहा है, लेकिन बूढ़े का चेहरा बिल्कुल पत्थर बना हुआ है। रोना तो बहुत दूर की बात है उसके चेहरे पर किसी भी प्रकार के कोई भाव नहीं है, एकदम पत्थर की मूर्ती की तरह दिखाई दे रहा है बूढ़ा। संदीप को अब बूढ़े पर बहुत दया आ रही है, लेकिन समझ नहीं आ रहा कि वह अपने आप को कैसे अभिव्यक्त करे।
‘‘तुमने आंटी के बारे में पूछा था न कि वो अब कहाँ है, यहाँ है या यूएस है ? वो अब कहीं नहीं है, न यहाँ है न यूएस में है। वह अब कहीं नहीं है, घुल गई है हवा में.....। यहाँ आती थी तो बच्चों की चिंता उसे सताती थी और वहाँ जाती तो मेरी। मैं जॉब के कारण जा नहीं पाता था उसके साथ। वहाँ रहती तो मेरी चिंता में घुलती और यहाँ रहती तो बच्चों की, नाती-पोतियों की चिंता में। वह कहीं भी सुखी नहीं थी। उसका परिवार बँट गया था। वह बँटे हुए हर हिस्से के साथ रहना चाहती थी, जो संभव नहीं था।’’ बूढ़े ने इतना कह कर कुछ देर के लिए बोलना बंद किया और सिर झुकाए बैठा रहा ‘‘उसके जाने के बाद मैंने वीआरएस ले लिया। काश पहले ही ले लिया होता.... तो कम से कम उसे खोता तो नहीं। मगर हम हमेशा यही सोचते हैं कि अभी तो बहुत समय है। अभी तो किया जा सकता है। और एक दिन अचानक पता चलता है कि बिल्कुल समय नहीं था। बिल्कुल भी..... समय तो रेत की तरह फिसल गया था हमारी मुट्ठी से।’’ बूढ़ा सिर झुकाए हुए है, संदीप को लगा कि कहीं वो रो तो नहीं रहा। संदीप ने बहुत डरते-झिझकते बूढ़े के कंधे पर हाथ रखा। हाथ रखते ही संदीप को अपनी हथेली में झुरझुरी महसूस हुई। शायद बूढ़े को बहुत दिनों से किसी ने छुआ नहीं है। उसका शरीर स्पर्श की संवेदना को भूल चुका है, तभी तो संदीप के स्पर्श पर उसके शरीर ने असामान्य प्रतिक्रिया दी। बूढ़े का शरीर संदीप के स्पर्श पर सिहर रहा है।
‘‘आप चले क्यों नहीं जाते किसलय और हेतल के पास? अब यहाँ अकेले क्यों रह रहे हैं। आपकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है यहाँ। बच्चे तो बुलाते ही होंगे न अपने पास ?’’ संदीप ने यह प्रश्न बहुत हिम्मत कर के पूछा। यह प्रश्न चुभने वाला भी हो सकता है अगर परिस्थितियाँ विपरीत हों तो। लेकिन बूढ़े ने इस प्रश्न पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, वह पहले की ही तरह सिर को झुकाए बैठा रहा। बूढ़े ने सिर को इस प्रकार झुका रखा है कि उसका चेहरा भी दिखाई नहीं दे रहा है संदीप को। उस पर सूरज के लगभग ढल जाने के कारण चारों तरफ़ हल्का साँवला अँधेरा बिखर गया है।
‘‘क्यों जाऊँ मैं.....? मैं ही क्यों जाऊँ....? एमएनसी मेरी सुनंदा को खा गई, अब मैं भी वहाँ चला जाऊँ...?’’ बूढ़ा उसी प्रकार सिर झुकाए हुए बुदबुदाया। ‘‘हम लोग जो साठ से नब्बे के दशक के बीच पैदा हुए, हम बहुत मूर्ख हैं। इन तीस सालों में मूर्ख ही पैदा हुए हैं..... इमोशनल फ़ूल्स..... हम जड़ों से उखड़ना नहीं चाहते। हमारी जड़ें जाने किस-किस प्रकार की मूर्खताओं में गड़ी रहती हैं, जिनको हम छोड़ना नहीं चाहते। नब्बे के बाद पैदा हुए तुम लोग हमारी तुलना में बहुत सुखी हो। तुम लोग इमोशनल नहीं हो, तुम लोग मूर्ख नहीं हो। तुम नॉस्टेल्जिक नहीं होते। तुम लोग अंदर से सूखे हुए हो। तुम लोग इंसान, पशु, पक्षी, वस्तुएँ, जगहें... किसी के साथ कभी अटैच नहीं होते हो, हर समय डिटैच मोड में रहते हो। हमें हमारे माँ-बाप ने पैदा किया था, तुम्हें एमएनसी और बाज़ार ने अपने लिए पैदा किया है। तुम्हें अंदर से सुखा दिया गया है। अच्छा किया है। इक्का-दुक्का तुम्हारे जैसे होंगे जो पूरी तरह से सूखने से बच गए हैं, इसलिए तुम उस किनारे के पेड़ में पानी डालते हो, तालाब में पैर डाल कर बैठते हो और...... और किसी बूढ़े को यहाँ अकेला बैठा देख कर उससे बातें करने चले आते हो। यह जो थोड़ी बहुत नमी तुम्हारे अंदर बची है, यह भी तुम्हारी कंपनी सुखा कर ख़त्म कर देगी महीने दो महीने में। कंपनियों को मॉइश्चर्ड वस्तुएँ नहीं पसंद हैं। नम चीज़ें भारी होती हैं, इस्तेमाल करने में कठिनाई होती है और उनमें फंगस लगने का भी ख़तरा रहता है। जैसे मुझमें लगा हुआ है। और नमी ही हमें अटैच करती है, सूखापन हमें हमेशा डिटैच करता रहता है। वो हमें कभी अटैच होने ही नहीं देता।’’ बूढ़े ने बहुत लम्बी बात को धीमे-धीमे, एक-एक शब्द को चबा-चबा कर बोलते हुए समाप्त किया।
चारों तरफ़ शाम का धुँधलका गहरा रहा है। फुटबाल खेलने वाले लड़के भी अब फुटबाल बंद करके एक पेड़ के पास इकट्ठा हो गए हैं, सभा विसर्जित करने के लिए। सिर में सिर मिलाए बातें कर रहे हैं और हँस रहे हैं। संदीप को पता है उनकी बातों का विषय क्या होगा। इस उम्र में बस एक ही तो फेंटेसी होती है जो सिर पर चढ़ी रहती है हर समय। उसे ऐसा लग रहा है जैसे कोने में लाल टी शर्ट पहना हुआ लड़का वह खुद ही है और काले लोवर में रवि खड़ा है। संदीप और रवि दोनो किनारे पर खड़े होकर अपनी-अपनी फेंटेसियों की बातें कर रहे हैं। रवि कुछ बोल्ड है, उसकी बातें कभी-कभी उस बिंदु तक भी पहुँच जाती हैं कि संदीप के गाल सुर्ख हो जाते हैं। रवि वह हर बात खुल कर कहता है, जिसे संदीप इशारों में कहने की कोशिश करता है। रवि.... जो पिछले महीने ही उड़ गया है कैनेडा। अब साल-दो साल में कभी एकाध बार भारत लौटेगा भी तो इस शहर में शायद एक-दो दिन को ही आएगा। यह शहर जहाँ उसके माँ-बाप बूढ़े होते हुए उसकी प्रतीक्षा में समय काटते रहेंगे। और किसी दिन मर-खप जाएँगे। उसके बाद रवि और इस शहर के बीच जो कुछ भी संपर्क था, वह भी समाप्त हो जाएगा। फिर रवि अगर भारत लौटेगा भी तो शायद यहाँ नहीं आए। क्यों आएगा ? फिर बचेगा ही क्या यहाँ पर। सोचते ही सोचते संदीप को लगा कि वह रवि के बारे में नहीं सोच रहा है, वह तो अपने ही बारे में सोच रहा है। कहानी तो वही है बस पात्र ही तो बदल रहे हैं। वह भी तो अब जब जा रहा है तो कैसे कह सकता है कि अब वह कब लौटेगा, और बैंगलूरू तक तो ठीक, उसके बाद अगर वह भी बाहर चला गया तो उसका भी तो वही होना है, जो रवि या किसलय या हेतल का हुआ है। जिसकी तरफ़ यह बूढ़ा इशारा कर रहा है। संदीप का हाथ अभी तक बूढ़े के कंधे पर ही रखा हुआ है, उसने धीरे से अपना हाथ वहाँ से हटा लिया।
‘‘अंकल समय के साथ सब कुछ बदलता है। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है। हम सबको भी उसके साथ बदलना ही पड़ता है। बदले बिना हमारा काम नहीं चल सकता। मेरी पीढ़ी आपकी पीढ़ी से अलग है, आपकी पीढ़ी अपने से पहले वाली से अलग रही होगी। यह जो अलग होना है यही तो परिवर्तन है अंकल। अगर यह नहीं किया जाएगा, तो हम समय के साथ चल ही कैसे पाएँगे?’’ संदीप ने कुछ देर तक पसर गए मौन को तोड़ते हुए कुछ समझाइश वाले अंदाज में कहा। बूढ़े का सिर अभी भी झुका ही हुआ है, वह अभी भी नीचे ही देख रहा है।
‘‘यह तो वैसा ही कि आप ट्रेडमिल पर जॉगिंग के लिए खड़े हो, और उसकी स्पीड ख़ुद ही बढ़ाते जा रहे हो, और तेज़ और तेज़, और तेज़.... फिर कह रहे हो कि समय की गति बढ़ती जा रही है, इसलिए उसके साथ दौड़ने के लिए हमें भी अपनी गति बढ़ानी पड़ेगी। नहीं.... परिवर्तन कुछ नहीं होता.... जिस प्रकृति का नाम ले-लेकर हम परिवर्तन की दुहाई देते हैं, वह कब और कितना बदलती है? बताओ तो ? नहीं.... हम ही अपने समय को बदलते जा रहे हैं। पहले फैंटेसी को सच की तरह प्रस्तुत किया जाता था, उससे इमोशनल नुकसान होता था, लेकिन अब तो झूठ को फैंटेसी की तरह प्रस्तुत किया जाता है, उसका क्या नुकसान हो रहा है, यह तुम लोग कभी नहीं समझ पाओगे। यह हुआ है परिवर्तन।’’ बूढ़े ने बिना सिर को उठाए लगभग सपाट से स्वर में संदीप की बात का उत्तर दिया।
संदीप ने देखा कि शाम अब लगभग रात हो गई। तालाब का वह किनारा बिल्कुल सुनसान हो गया है। लैम्प पोस्ट पर लगे स्ट्रीट लाइट के हैलोजन बल्ब जल उठे हैं। उनकी ज़र्द पीली रौशनी कुछ देर पहले ढल चुके सूरज की धूप का स्थानापन्न बनने का असफल प्रयास कर रही है। आस-पास अब कोई नहीं है, बस संदीप और वह बूढ़ा ही वहाँ बैठे हैं। संदीप को लगा कि अब यहाँ से चलना चाहिए उसे भी और बूढ़े को भी।
‘‘चलिए अब छोड़िए इन बातों को। मेरी तो आपको सलाह है कि आप अपने बच्चों के पास चले जाएँ। वहाँ नाते-पोतियों के साथ आपका मन लग जाएगा। धीरे-धीरे आदत हो जाएगी। यहाँ रहेंगे तो आपको पिछली यादों में ही रहना होगा, और यादें आपको बार-बार परेशान करेंगी। आप बहुत इमोशन व्यक्ति हैं, आपका अकेले रहना ठीक नहीं है।’’ संदीप ने एक बार फिर से बूढ़े के कंधे पर हाथ रख दिया। इस बार बूढ़े के शरीर ने संदीप के स्पर्श पर कोई असमान्य प्रतिक्रिया नहीं दी। पहले जैसा कंपन संदीप को अपनी हथेली पर महसूस नहीं हुआ। कुछ देर तक बूढ़े ने कोई उत्तर नहीं दिया संदीप की बातों का। वह पहले की ही तरह सिर झुकाए जस का तस बैठा रहा।
‘‘क्यों जाऊँ ? क्या करूँगा वहाँ जाकर ? सुनंदा तो खाना बना लेती थी, छोटे बच्चों की केयर कर लेती थी, साफ-सफाई कर लेती थी। वह तो वहाँ जाकर बच्चों का जीवन थोड़ा आसान कर देती थी। मैं जाऊँगा तो मैं तो उनका जीवन और कठिन कर दूँगा। सुनंदा तो बच्चों के भी काम कर देती थी वहाँ। उसको तो आदत थी। मैं जाऊँगा तो उनके काम तो छोड़ो, मेरे काम भी उन ही लोगों को करने होंगे। मैं तो उनकी मुश्किलें बढ़ा दूँगा। इसलिए क्यों जाऊँ वहाँ उनको परेशान करने। उनकी ज़िंदगी को अव्यवस्थित करने।’’ बूढ़े ने सिर झुकाए हुए ही संदीप की बात का उत्तर दिया। बहुत देर से बूढ़े ने सिर नहीं उठाया है ऊपर, शायद वह अपने चेहरे के भाव छिपाना चाह रहा है संदीप से।
‘‘नहीं-नहीं अंकल, ऐसा नहीं है, यह तो आप सोच रहे हैं, आपके बच्चे ऐसा थोड़े ही सोचेंगे। आख़िर को प्यार करते हैं वो आपसे। आप उन पर बोझ कैसे हो सकते हैं। आप जाइए तो सही, मुझे विश्वास है कि वो आपको ज़रा सी भी परेशानी नहीं होने देंगे। मेरी बात मानिए चले जाइए उनके पास। प्लीज़...। प्लीज़ अंकल....।’’ इस बार संदीप ने अपनी जगह से उठ कर बूढ़े के एकदम सामने अपने घुटनों पर बैठते हुए दोनों हाथ बूढ़े के कंधे पर रखते हुए कहा। और अपनी आवाज़ में अधिकार का पुट घोलते हुए कहा संदीप ने।
‘‘नहीं रेक्स मैं नहीं जा सकता। वेताल होने का मतलब ही अभिशप्त होना है। हमें अपनी ही गुफ़ाओं में मरना होगा। मर कर गुफ़ाओं में ही दफ़्न होना होगा, जहाँ हमसे पहले के वेताल भी दफ़्न हैं। यह सिलसिला इसी प्रकार चलना है। अनंत काल तक। तुम बस एक काम करना, जब मैं चला जाऊँ तो बौने बांडारों से कहना कि वे बोलते नगाड़ों से संदेश पहुँचा दें किट और हेलोइस तक। उनको आना होगा तो आ जाएँगे... नहीं तो मुझे तो गुफ़ा में दफ़्न होना ही है। तुमने सुना नहीं, जब मैं तूफ़ान पर बैठ कर जंगल से निकलता हूँ तो पीछे से क्या आवाज़ें आती हैं- ‘वेताल का जीवन कितना एकाकी, वेताल का जीवन कितना एकाकी.....’ तो यह तो श्राप है एकाकीपन का, जिसे हम वेतालों को अकेले ही भोगना है। बिल्कुल अकेले......।’’ कह कर बूढ़ा कुछ देर को चुप हुआ फिर गुनगुनाने लगा ‘‘वेताल का जीवन कितना एकाकी, वेताल का जीवन कितना एकाकी.....’’।
संदीप ने बूढ़े के चेहरे को ऊपर उठाया अपने हाथों से। चौंक गया, बूढ़ा वहाँ था ही नहीं। बूढ़े की जगह उसके पापा बैठे थे। एकदम उसकी आँखों में आँखें डाले हुए। संदीप घबराया और चौंक कर पीछे हटा। पीछे पेड़ की एक जड़ में उसका पैर उलझा और वो पीठ के बल पीछे की तरफ़ गिर गया। सँभल कर उठने की कोशिश कर रहे संदीप ने देखा कि हैलोजन की पीली रौशनी में पापा का चेहरा बिल्कुल स्पष्ट दिखाई दे रहा है। बिल्कुल पत्थर का बना हुआ चेहरा जैसे किसी मूर्ती का होता है, भावहीन चेहरा। पापा शून्य में देखते हुए गाना गा रहे हैं ‘‘वेताल का जीवन कितना एकाकी, वेताल का जीवन कितना एकाकी.....’’। संदीप उठा तो एक बार फिर से लड़खड़ाया, गिरते-गिरते बचा। मगर सँभल कर खड़ा हुआ और मुड़ कर तेज़ क़दमों से चल दिया। पीछे से गाने की और उसके साथ रोने की भी आवाज़ आ रही थी जो संदीप के तेज़ी के साथ चलने के कारण मद्धम होती जा रही थी। संदीप अब दौड़ रहा था... दौड़ता जा रहा था...।
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(समाप्त)