मूंडवे वालों का जलवा (कहानी : पंकज सुबीर)

मूंडवे वालों का जलवा
(कहानी : पंकज सुबीर)

सामयिक सरस्वती के अक्टूबर-दिसम्बर 2018 अंक में प्रकाशित
छज्जू जी मूंडवे वाले.... या अच्छी तरह से कहा जाए तो छज्जूमल मूंडवे वाले। मूंडवा से आकर यहाँ बसे थे इसलिए उनके नाम के साथ यह मूंडवे वाले हमेशा के लिए ही जुड़ गया है। हमारे यहाँ हर वह स्थान जिसके अंत में बड़े आ की मात्रा लगी हो, उसे देशज में ए की मात्रा में बदल दिया जाता है। जैसे भेलसा को भेलसे, आगरा को आगरे, आदि आदि आदि, उसी प्रकार मूंडवा का भी हो गया मूंडवे। तो छज्जू जी के परदादा या लक्कड़ दादा जब मूंडवा से आकर यहाँ बसे तो अपने साथ बस व्यापार की समझ ही लेकर आए थे। बसे थे यहाँ पर; क्योंकि उन्हें अंग्रेज़ों ने लाकर बसाया था यहाँ पर। अंग्रेज़ों ने या यूँ कहें कि ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यहाँ पर इस छावनी की स्थापना पूरे मध्य भारत पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से की थी। उद्देश्य बड़ा था, इसलिए ज़ाहिर सी बात है कि छावनी बड़ी थी, रेजिमेंट बड़ी थी। जब छावनी बसाई तो सैनिकों के, अधिकारियों के लिए रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सामान की भी आवश्यकता होने लगी। जहाँ छावनी बसाई थी वहाँ बस बड़ा मैदान था, जिस पर छावनी छा दी गई थी। आस-पास दूर-दूर (उस समय पाँच-दस किलोमीटर को भी दूर-दूर माना जाता था।) कोई क़स्बा या शहर नहीं था, जहाँ से सामान की व्यवस्था हो सके। अंग्रेज़ों के बारे में मशहूर था कि वे हर समस्या का समाधान अपने साथ लेकर चलते थे। तो हुआ यह कि अंग्रेज़ों ने मारवाड़ से व्यापारियों को ला-लाकर यहाँ पर बसाया। जितने हिस्से में छावनी थी, उसके अलावा भी बहुत सी ज़मीन ख़ाली पड़ी थी, आख़िर को पूरा का पूरा मैदान था वहाँ पर। अंग्रेज़ों ने मारवाड़ी व्यापारियों से कहा कि जितना हिस्सा घेर सकते हो उतना घेर लो और अपना मकान दुकान बना कर यहाँ व्यापार शुरू करो। मारवाड़ियों ने बात की बात में अच्छा-ख़ासा क़स्बा बना डाला वहाँ पर। इस क़स्बे को छावनी ही नाम मिला। इसके दोनो तरफ़ भिंड और मुरैना से कुछ परिवारों को लाकर बसाया गया, इन परिवारों के युवाओं को सेना में भर्ती किया गया। इस प्रकार देखते ही देखते मिली-जुली सभ्यता का एक क़स्बा वहाँ पर बस गया। इस क़स्बे का नाम बरसों-बरस तक छावनी ही रहा, अब छावनी इस शहर के मध्य के इलाक़े को कहते हैं, शहर का नाम कुछ और हो चुका है।
छज्जू मल जी के लक्कड़ दादा भी अंग्रेज़ों द्वारा लाए गए थे। लाए गए थे मारवाड़ के मूंडवा क़स्बे से। मूंडवा से आए थे, सो हो गए मूंडवे वाले। मूंडवे वाले में अमिधा और व्यंजना दोनो हैं। असल में छावनी के बीचों-बीच बसाए गए ये मारवाड़ी परिवार, व्यापार के साथ-साथ सैनिकों के परिवारों को वक़्त-ज़रूरत सूद पर पैसा भी देते थे। उसमें भी छज्जू जी मूंडवे वाले के लक्कड़ दादा तो कोई व्यापार करते ही नहीं थे, वे विशुद्ध रूप से ब्याज़ का ही काम करते थे। अच्छी भाषा में महाजनी और ज़रा बुरी भाषा में सूदख़ोरी। उनकी पेढ़ी ब्याज़ की सबसे चलती हुई पेढ़ी थी। पेढ़ी तो आज भी है, मगर अब उसका स्वरूप बदल गया है, अब दुकानें हो गई हैं उनकी। कपड़े की दुकान, किराने की दुकान, खाद-बीज की दुकान; इन दुकानों से शहर के कमज़ोर तबक़े के लोग और आस-पास के गाँव वाले उधार में सामान लेते हैं, और फिर उस उधारी पर सूद-दर-सूद चुकाते रहते हैं। इन दुकानों पर नक़द में ख़रीदने आए ग्राहक को हेय दृष्टि से देखा जाता है और उसे टरकाने का प्रयास किया जाता है, जबकि उधारी वाले को चाय-पानी पहले पिलाया जाता है, सामान की बाद में पूछी जाती है। सूदख़ोरी की पेढ़ी है, सूद ही नहीं मिलेगा तो काहे की पेढ़ी। अब तो ख़ैर उस प्रकार की निरक्षरता नहीं रही, मगर पहले तो बस यह था कि जो हिसाब पेढ़ी के मुनीम ने बना कर दे दिया वही अंतिम होता था। अँगूठा लगाओ और घर जाओ। चुकाते रहो, चुकाते रहो।
'मूंडवे वाले' यह नाम छज्जू जी के लक्कड़ दादा के साथ जो लगा, तो आज तक लगा चला आ रहा है। मूंडावा (क़स्बे) से थे इसलिए मूंडवे वाले; और दूसरे अर्थ में सूद के उस्तरे से क़र्ज़दार का सिर बेरहमी से मूंडते थे, इसलिए भी मूंडवे वाले। लक्कड़ दादा से लेकर आज तक इस मूंडवे वाले परिवार ने पैसा तो बहुत कमाया, इतना की उसे अथाह भी कह सकते हैं; मगर मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा इस परिवार को कभी नहीं मिल पाया। सब कुछ होने के बाद भी वे रहे मूंडवे वाले ही। अपने पिता की इकलौती संतान छज्जू जी मूंडवे वालों के यहाँ तीन बेटे हुए, बेटी एक भी नहीं हुई। मतलब यह कि पिता की संपत्ति का कोई बँटवारा नहीं हुआ, क्योंकि कोई हिस्सेदार ही नहीं था। छज्जू जी ने अपने सक्रिय समय में ही व्यापार को तीन गुना कर लिया, और ऐसा करके ही बेटों के हाथ में अलग-अलग बागडोर सौंप दी। छज्जू जी के तीन बेटों में बड़े अशोक, मंझले अनिल के मन में तो परंपरा अनुसार ही मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा की कोई चाह नहीं रही, वे भी बस पैसों को आने वाली पीढ़ी के लिए और बढ़ा कर छोड़ने के कार्य में ही जुट गए। तीनो बेटे अलग-अलग रहते थे और तीनो ने अलग-अगल दुकानों पर काबिज़ होकर अलग-अलग व्यापार शुरू कर दिया। छज्जू जी की पत्नी बहुत पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं और छज्जू जी छोटे बेटे सुनील के साथ रहते थे। रहते थे और देखते थे कि जो साम्राज्य अभी कल तक उनका था, उस पर अब बेटों का, बल्कि अब तो पोतों का कब्ज़ा हो चुका था। छज्जू जी को बस यह संतुष्टि थी कि उन्होंने अपने पिता से जितना पाया था, उतना ही अलग-अलग तीनों बेटों को दिया।
सबसे छोटे बेटे सुनील के मन में यह चाह जाने कब और कैसे घर बना गई कि पैसा अपनी जगह है लेकिन मान-प्रतिष्ठा भी होनी चाहिए। अभी तक तो यह होता था कि पीढ़ी दर पीढ़ी मूंडवे वालों के परिवार के उत्तराधिकारी बस पैसे कमाने के लिए ही पैदा होते थे। बाक़ी कुछ और उनको दीन-दुनिया से मतलब नहीं होता था। मूंडवे वाले, यह नाम यदि आपके साथ जुड़ गया है, तो बस आपको सुबह आकर दुकान पर बैठना है और दिन भर वहीं रहना है। दो के चार, चार के आठ करना है। उसके अलावा और कुछ नहीं करना है। दो के चार, चार के आठ करते-करते जब यूँ ही आप मर जाओ, तो दुकान को अपने बाद की पीढ़ी को सौंप जाना है, आठ के सोलह और सोलह के बत्तीस करने के लिए। मर जाओ, खप जाओ। मगर सुनील को यह ढर्रा पसंद नहीं आया। वह इससे हट कर कुछ करना चाहता था; लेकिन चार-पाँच पीढ़ियों का जो किया हुआ सर पर था, उसे धोने में सुनील मूंडवे वाले को बहुत मेहनत करनी पड़ रही थी। छज्जू जी सुनील के साथ ही रहते थे, इसलिए देख-देख कर कुढ़ते रहते थे कि बेटा किस प्रकार फालतू के कामों में पैसा ख़र्च कर रहा है।
सुनील न केवल अपने वैश्य समाज के संचालक मंडल का सदस्य था, बल्कि लायंस क्लब का भी सदस्य था और क़स्बे के ऐसे ही एक-दो और संस्थानों का भी सदस्य था, जहाँ सदस्य बनने हेतु मोटा पैसे वाला होना आवश्यक था। मगर सुनील की दौड़ अभी भी संगठनों के सदस्य पद तक ही हो पा रही थी, अध्यक्ष बनने का दाँव हाथ में नहीं आ रहा था। वह चाहता था कि वह भी किसी संस्था का अध्यक्ष बने, ज़िला कलेक्टर संस्थापन समारोह में आकर उसे अध्यक्ष पद की शपथ दिलवाए, और उस फ़ोटो में वह सुनहरी फ्रेम में मढ़ कर दुकान और घर की दीवार पर टाँगे। लेकिन यह हो नहीं पा रहा था। नहीं हो पा रहा था, तो उसके पीछे एक कारण सुनील को समझ आता था कि वह अपने अंदर का पूरा टेलेंट दुनिया को बता नहीं पा रहा है, लोगों को पता ही नहीं है कि वह इन पदों के लिए सबसे योग्य व्यक्ति है। सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होने के शौक़ के चलते, अपनी बढ़ी हुई तोंद के बाद भी, सुनील नई उम्र के लड़कों वाले कपड़े पहन कर, बाल को स्याह काले रंग की खिजाब में रँग कर चकाचक बना रहता था। पीठ पीछे उसे लोग उसे ‘रँगीला रतन’ भी कह कर बुलाते थे। पत्नी शीला भी क़स्बे के अधिकांश महिला संगठनों की या तो सदस्य बनी हुई थी, या संरक्षक जैसा कोई पद पास था। शीला उस छोटे क़स्बे की पहली महिला थी, जो अपनी स्कूटी दनदनाते हुए घूमती थी। उस समय जब लड़कियाँ ही बड़ी मुश्किल से स्कूटी पर दिखाई देती थीं, साड़ी पहन कर, सिर पर पल्लू लिए शीला सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में घूमती रहती थी। सुनील के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मूंडवे वाले के साथ जुड़ा अपयश मिटाने के लिए शीला भी प्रयासरत थी। हालाँकि ऐसा हो नहीं पा रहा था।
कहानी उस समय की है जब छज्जू जी के बेटों के बच्चों की भी शादी हो चुकी थी। उनके भी बच्चे, मतलब छज्जू जी मूंडवे वाले के घर पड़पोते भी आ चुके थे। पोते ख़ानदानी कमाई को प्रॉपर्टी, गल्ले की आढ़त, जैसे कामों में लगा कर ख़ानदान का नाम रौशन कर रहे थे। सुनील का एक ही बेटा था, उसकी शादी भी हो चुकी थी। यह कहानी ठीक उस समय शुरू होती है, जब सुनील के इकलौते बेटे मनोज के घर बेटा पैदा हुआ। मनोज की शादी के लगभग छह-सात साल बाद उसके यहाँ बच्चा हुआ था, इसलिए घर में आनंद का माहौल बन गया था। जुलाई के पहले सप्ताह में बालक आया था। मारवाड़ी परंपरा के अनुसार सवा महीने बाद जलवा पूजन होना था। मारवाड़ियों में जलवा पूजन बच्चे के जन्म के महीने-सवा महीने बाद होता है, इसमें नव प्रसूता सोलह सिंगार कर सर पर पानी की मटकी रख, उसमें नीम की पत्तियाँ डाल कर अन्य महिलाओं के साथ, बैंड-बाजे, मंगल गीत के साथ किसी भी जल स्रोत, कुँआ, बावड़ी, तालाब पर जाती है, वहाँ जाकर जल की पूजा करने के बाद अपनी मटकी को पानी से धोकर जल स्रोत के पानी से उसे भर कर लाती है। मटकी को लाकर रसोईघर में रखती है, इसके साथ ही उसका रसोईघर में प्रवेश प्रारंभ हो जाता है, जो प्रसव के कारण बंद हो गया था। बच्चे के जन्म का आनंद होने के कारण इस प्रसंग को ख़ूब धूमधाम से आयोजित किया जाता है। इसके बहाने बच्चे के जन्म का भी उत्सव मना लिया जाता है।
सुनील के यहाँ तो सात साल बाद; और वह भी बेटा पैदा हुआ था, ज़ाहिर सी बात है अत्यंत भव्य आयोजन की रूपरेखा बना ली गई थी। पन्द्रह अगस्त की छुट्टी का उपयोग करने के लिए उसी दिन आयोजन रखा गया था। व्यापारी थे, इसलिए पन्द्रह अगस्त से तो कुछ लेना-देना था नहीं उनको। सारे रिश्तेदार भी व्यापारी वर्ग से ही थे, इसलिए सबसे मुफ़ीद दिन पन्द्रह अगस्त ही था सबके लिए। पूरे दिन भर का आयोजन था। क़स्बे से लगा हुआ एक पूर्ण वातानुकूलित शादी घर तथा उसके सामने का बड़ा-सा मैदान चौदह से सोलह अगस्त तक पूरा का पूरा बुक कर लिया गया था। मेहमान एक दिन पहले से आने थे और जाना तो सबको अगले दिन ही था। सारे कमरे, सारे सुइट्स, लॉन, सब कुछ मूंडवे वालों के नाम पर बुक था। सुबह पूजा- पाठ के बाद से कार्यक्रम प्रारंभ हो जाने थे। जलवा पूजन का कार्यक्रम सुबह से ही होना था। उसके लिए पूरी व्यवस्था की गई थी। शादी घर से क़रीब आधा किलोमीटर की दूरी पर ही नदी थी, जहाँ जलवा पूजन के लिए जाना था। जितनी भी महिलाओं को नव प्रसूता के साथ जाना था, सबके लिए एक ही डिज़ाइन और एक ही केसरिया रंग की राजस्थानी लहरिया साड़ियों की व्यवस्था की गई थी। सुनील ने थोक में क़रीब दो सौ साड़ियों की व्यवस्था कर ली थी। समय रहते उन साड़ियों को परिवार और जान पहचान के घरों में भिजवा दिया गया था, जिससे महिलाएँ ब्लाउज़ वग़ैरह सिलवा कर तैयार करवा लें। जलवा पूजन के प्रोसेशन के लिए नरसिंहगढ़ की सुप्रसिद्ध बैंड पार्टी को बुलवाया गया था, जो इतना महँगी है कि उसे अपने यहाँ बुलवाने की हिम्मत लोग शादियों तक में नहीं कर पाते। एक स्थानीय महावत से दो हाथियों की भी व्यवस्था की गई थी, जिनको सज-धज कर आगे-आगे चलना था प्रोसेशन के।
भोजन के लिए राजस्थान से विशेष रूप से हलवाई बुलवाए जा रहे थे। पूरा पारंपरिक मारवाड़ी खाना बनाने के लिए। सुबह के नाश्ते में ही लगभग भोजन जितनी व्यवस्था की जानी थी। नाश्ते के बाद जलवा पूजन का कार्यक्रम होना था, उसके बाद पूजा-पाठ। पूजा पाठ के लिए वेद पाठी ब्राह्मण भी बाहर से बुलवाए जा रहे थे। पूजा के बाद दाल-बाटी, चूरमा का भोजन होना था। भोजन के बाद विश्राम और शाम को एक बार फिर से अच्छे-ख़ासे नाश्ते की व्यवस्था थी, वह क्या कहते हैं उसे... हाई टी।  हाई टी के बाद कई सारी ब्यूटीशियन्स बुलाई गई थीं, आए हुए मेहमानों की महिलाओं को तैयार करने हेतु। उसके बाद रात का भव्य आयोजन होना था। अगस्त का महीना चूँकि बरसात का मौसम था, इसलिए कार्यक्रम स्थल को पूरा वाटरप्रूफ टैंट से ढँका जाना था। यह विशाल टैंट विशेष रूप से गुजरात से मँगवाया जा रहा था। बड़ी राजनैतिक सभाओं में उपयोग होने वाला टैंट था यह, पहली बार किसी निजी कार्यक्रम में लगने वाला था। जहाँ गाड़ियाँ पार्क होनी थीं, वह हिस्सा भी वाटरप्रूफ टैंट से ढँका जाना था। कोई भी मेहमान कार से उतर कर भीगते हुए आए, तो फिर मतलब ही क्या रहा व्यवस्था का। रात के भोजन में क्या-क्या शामिल था, यह बताना ही मुश्किल था। यदि केवल मिठाई की ही बात की जाए तो आटे का मालपुवा, केसर पेड़ा, गौंद के लड्डू, चूरमा लड्डू, छेना मालपुआ, बूँदी-पायस, घेवर, लापसी, जोधपुरी लड्डू, बादाम का हलवा, मूँग हलवा, मावा कचौड़ी, बेसन चक्की, कुल मिलाकर राजस्थानी-मारवाड़ी मिठाई की पूरी दुकान सजनी थी। मारवाड़ियों की सबसे ख़ास केर-साँगरी बनाने के लिए विशेष एक एक्सपर्ट बुलवाया जा रहा था। मेन कोर्स भी किसी होटल के मेन्यू की तरह ही था, क्या नहीं था उसमें। उसके अलावा संगीत और नृत्य की भी व्यवस्था थी। टीवी धारावाहिकों में नज़र आने वाली दो अभिनेत्रियों को बुलाया जा रहा था, इस संगीत कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देने के लिए। कुछ नर्तकियाँ भी बाहर से बुलवाई गई थीं, मगर बीच-बीच में मूंडवे वाले परिवार के सदस्यों को भी मंच पर आकर नृत्य करना था।
सुनील और शीला को इस अवसर पर अपने उद्गार भी व्यक्त करने थे। दोनो ने अपने-अपने भाषणों की तैयारी पन्द्रह दिन पहले से करनी शुरू कर दी थी। एक स्थानीय कवि की मदद से यह भाषण लिखवाए गए थे। कवि ने ही उनको प्रशिक्षण भी दिया था कि आवाज़ में किस प्रकार उतार-चढ़ाव लाना है, कहाँ भावुक होना है, कहाँ आँखें पोंछने का अभिनय करना है, कहाँ कितना मुस्कुराना है, कहाँ हँसना है, कहाँ चुटकी लेना है। यह भाषण असल में दोनो को सामजिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से विशेष रूप से रखवाया गया था। छोटे क़स्बों में सबसे बड़ी समस्या होती है अच्छा भाषण देने वाले की। अगर किसी के बारे में पता चल जाए कि वह तो अच्छा बोल लेता है, तो सम्मान समारोह से लेकर मय्यत तक और स्कूल के वार्षिक उत्सव से लेकर पन्द्रह अगस्त तक, वह डिमांड में आ जाता है। चूँकि रात के कार्यक्रम में शहर के लगभग हर वर्ग के लोग आमंत्रित थे, इसलिए अच्छा भाषण देकर यह दोनो भविष्य में और भाषण देते रहने और उसके बहाने संस्थाओं के, कार्यक्रमों के अध्यक्ष अथवा मुख्य अतिथि की कुर्सी पर आँख लगाए हुए थे। जलवा पूजन का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यही था। यह भी कहा जा सकता है कि जलवा पूजन का समारोह शायद इस भाषण के बहाने स्थापित होने के लिए ही हो रहा था। छोटे क़स्बों में कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनना या कार्यक्रम की अध्यक्षता करना, मान-सम्मान का विषय होता है।
सुनील को पूरे दिन में चार बार कपड़े बदलने थे। मगर सबसे ख़ास रात के मुख्य समारोह के लिए कपड़े जोधपुर से मँगवाए गए थे। सफ़ेद पर कशीदाकारी की सेल्फ़ एम्बोज़्ड धारियों वाला घुटनों से नीचे तक का बंद गले वाला जोधपुरी कुरता, पैरों से कस कर चिपका चुन्नटों वाला चूड़ीदार सफ़ेद पायजामा, गले में काला-सफ़ेद कशीदाकारी वाला स्टोल, पैरों में काली मोजड़ियाँ और सिर पर केसरिया-लाल बड़ी-बड़ी बुंदकी वाला जोधपुरी पाग या पगड़ी। पगड़ी सामान्य से एक मीटर लम्बी बुलवाई गई थी। जोधपुर के छुरंगेदार साफे की तरह उसे बाँधा जाना था। छुरंगा मतलब साफे से पीठ पर अतिरिक्त लटकने वाला कपड़ा। साफे का छुरंगा सुनील की पीठ से होता हुआ एड़ियों तक लटकना था इसीलिए पगड़ी का कपड़ा सामान्य से लंबा बुलवाया गया था। और सामने कलफ़ लगा हुआ लाल तुर्रा जो केसरिया साफे में से मोर के फैले हुए पंखों की तरह दिखाई देना था। शीला को भी दिन में चार बार कपड़े बदलने थे, और सारे कपड़े ज़ेवर जोधपुर से ही मँगवाए गए थे। रात के लिए लहरिया का सुनहरी-लाल-पीला घाघरा, ज़री के भारी काम वाली ओढ़नी। कुंदन के काम वाले ज़ेवर, बोर, नथनी, बाजूबंद, कंठी, कमरबंद,हथफूल। कलाइयों से कोहनी तक भरे लाख के चूड़ले, जिनमें बीच-बीच में कुंदन के कड़े।
कुल मिलाकर बात यह कि जश्न का पूरा इंतज़ाम पन्द्रह-बीस दिन पहले से ही प्रारंभ हो गया था। मूंडवे वाले परिवार में ‘न भूतो न भविष्यति’ टाइप का महाउत्सव मनाए जाने की तैयारियाँ ज़ोरों-शोरों से चल रही थीं। निमंत्रण पत्र, कपड़े, ज़ेवर, कोरियोग्राफी, भाषण, भोजन सूचि, इतने काम थे कि सुबह कब होती थी और शाम कब हो जाती थी, पता ही नहीं चल रहा था। इस बीच बस एक समस्या आ गई थी कि छज्जू जी मूंडवे वाले का स्वास्थ्य नरम-गरम होने लगा था। कुछ तो अस्सी पार की उमर के कारण बीमारियाँ और कुछ घर में होने वाले कार्यक्रम पर पैसा पानी की तरह बहाए जाने का संताप, छज्जू जी पर दो-तरफ़ा मार पड़ रही थी। कल्पना कीजिए कि वह पैसा, जो आपने कौड़ी-कौड़ी, दमड़ी-दमड़ी कर के जमा किया था, अपने ऊपर ख़र्च करने तक से परहेज़ किया, उस पैसे को आपके बाद की पीढ़ी आपकी आँखों के सामने ही पानी की तरह बहा कर और आग की तरह जला कर उड़ाए। सत्ता हाथ से जाने का सबसे बड़ा दुख यही होता है कि आप एक तरफ़ पड़े-पड़े उस सारी व्यवस्था को बदलता हुआ देखते हैं, जो आपने अपनी सर्वश्रेष्ठ समझ से बनाई थी। वह, जो कल आपके लिए ग़लत था, आपके बाद वाली पीढ़ी नियम बदल कर उस ग़लत को सही कर देती है। व्यवस्था बनाने और बदलने का राजदंड जब हाथ से चला जाता है, तो हथेलियों में उम्र भर उसको फिर से पकड़ने की सलबलाहट होती रहती है। यह सलबलाहट ही धीरे-धीरे आपको अशक्त और बीमार कर देती है।
पन्द्रह अगस्त के सप्ताह भर पहले छज्जू जी थोड़े बीमार से बहुत बीमार वाली अवस्था में प्रवेश कर गए। इधर कार्यक्रम के सारे कार्यों को अंतिम रूप देने का भार परिवार के सिर पर आया और उधर छज्जू जी के लगभग बिस्तर पकड़ लेने के कारण वह अतिरिक्त कार्य, या कार्य से अधिक उनके बीमार हो जाने का तनाव परिवार के सिर पर आ गया। तनाव भी इस बात का नहीं था कि परिवार के सबसे बुज़ुर्ग सदस्य का स्वास्थ्य ख़राब है, बहुत ज़्यादा ख़राब है। तनाव इस बात को लेकर था कि कहीं छज्जू जी चौदह पन्द्रह अगस्त  के आस-पास...। इधर तारीख़ पास आ रही थी और उधर छज्जू जी मूंडवे वाले की स्थिति और बिगड़ती जा रही थी। सुनील और परिवार एक और विचित्र स्थिति से जूझ रहे थे। परेशानी यह थी कि यदि छज्जू जी को अस्पताल में भर्ती भी किया जाता है, तो भी यह चर्चा तो होगी ही कि देखो उधर तो पिता अस्पताल में भर्ती है और इधर इनको उत्सव मनाने की पड़ी है। अस्पताल में भर्ती किया जाना, मतलब गंभीर स्थिति। इसलिए अस्पताल में भर्ती किए जाने को परिवार के लोग टाल रहे थे। लगभग सारे चिकित्सकीय उपकरण धीरे-धीरे, एक-एक कर के छज्जू जी के कमरे में आते जा रहे थे। क़स्बे के उन्हीं डॉक्टर की सेवाएँ ली जा रही थीं, जिनके घर के क्लिनिक में सभी जीवन रक्षक उपकरणों के पोर्टेबल, मिनी संस्करण उपलब्ध थे। वे कहने को सरकारी डॉक्टर थे, मगर अपने घर में ही छोटा-मोटा नर्सिंग होम खोल रखा था। दिन भर मरीज़ों को भर्ती रखते थे और रात में छुट्टी कर देते थे। उन्हीं की सेवाएँ लेकर बाहर वालों को अभी अंदाज़ा भी नहीं लगाने दिया जा रहा था कि उत्सव की तैयारियों के पीछे उधर सबसे सीनियर मूंडवे वाले के कमरे में क्या कुछ चल रहा है। घर असल में एक बाखल की तरह था। बाखल का मतलब एक अंग्रेज़ी के यू अक्षर के आकार की हवेली, जिसके सामने उल्टे यू आकार का बड़ा-सा आँगन, आँगन के चारों ओर दस-बारह फिट की चौहद्दी और उसके आगे हाथी दरवाज़ा हो। दोनो यू मिल कर अंग्रेज़ी का ओ अक्षर बना रहे हों। बाखल में अंदर की बात अंदर और बाहर की बात बाहर ही रहती है। आने वाली कारें तो क्या अगर छोटा ट्रक भी आ रहा है, तो वह भी दरवाज़े से अंदर जाकर समा जाए। डॉक्टरों, मशीनें ला रही गाड़ियों की आवाजाही हो रही थी लेकिन ऊपर से सब कुछ सामान्य बनाए रखने, या दिखाने की पूरी चाक-चौबंद व्यवस्था थी। गाड़ियाँ हाथी दरवाज़े के अंदर जातीं थीं और दरवाज़ा बंद हो जाता था। घर में इतना बड़ा कार्यक्रम होना था तो गाड़ियों की, लोगों की आवाजाही तो सामान्य बात थी। चूँकि तीन दिवसीय कार्यक्रम तो शादी घर में होना था, इसलिए यह चिंता तो थी नहीं कि नातेदार-रिश्तेदार आएँगे, तो वह छज्जू जी को गंभीर रूप से बीमार देख कर चार बातें करेंगे। यह जो चार बातें किये जाने का डर था, वह भी इस मामले में नहीं था। यहाँ चार बातें होनी ही नहीं थीं।
आगे की कहानी अब डायरी की तरह ही प्रस्तुत की जाए तो अधिक सुविधाजनक होगा। चूँकि आगे की कहानी बस तीन ही दिनों की कहानी है, चौदह, पन्द्रह और सोलह अगस्त की। इसलिए बस यह कि तीनों दिनों का लब्बो-लुआब डायरी के नोट्स की तरह जान लिया जाए। हमें क्या मतलब किसी के घर के परदे उघाड़ने से ? और हम तो कुछ कहना भी नहीं चाह रहे हैं, हम तो बस आपको यह बताना चाह रहे हैं कि कितनी धूमधाम से सारा कार्यक्रम हुआ। तो आइए तीनों दिन की डायरी पढ़ते हैं।
चौदह अगस्त- आज सुबह ग्यारह बजे से ही छज्जू जी मूंडवे वालों का पूरा परिवार, मतलब तीनों बेटों का परिवार शादी घर में शिफ़्ट हो गया है। दोपहर बाद से मेहमानों के आने का सिलसिला भी प्रारंभ हो गया है। जो क़रीब के रिश्तेदार हैं, वे तो ज़ाहिर सी बात है कि एक दिन पूर्व ही आएँगे। जा आ रहे हैं उनके स्वागत और उन्हें उनके सर्व सुविधायुक्त वातानुकूलित कमरों में व्यवस्थित किया जा रहा है। सबको यह बताया जा रहा है कि छज्जूमल जी कमज़ोरी के कारण वे पन्द्रह की रात के कार्यक्रम में ही शामिल हो पाएँगे, और फिर घर पर भी तो कोई चाहिए, इतना बड़ा घर है। उन्होंने ख़ुद ही मना कर दिया है कि वो रात के कार्यक्रम में आ जाएँगे। हर बार शीला द्वारा यह वाक्य जोड़ दिया जाता है -आपको तो पता ही है कि बुज़ुर्गों की ज़िद के आगे किसकी चलती है ? कल बाबूजी यहीं आएँगे तो यहीं मिल लेना आप लोग। पता है कि कल कार्यक्रम की धूमधाम में किसको याद रहेगी बाबूजी से मिलने की। दोपहर का भोजन होते-हवाते शाम हो गई, और शाम को मेंहदी लगाने वाली लड़कियाँ आ गईं। मेहमानों की सारी महिलाओं को, लड़कियों को मेंहदी लगाने के लिए बहुत सी लड़कियाँ बुलाई गई थीं। शाम को जब आए हुए पुरुष मेहमान आराम करने जा रहे थे, तो सुनील ने हाथों को बोतल का आकार देते हुए कुछ शरारती अंदाज़ में व्यवस्था हेतु जाने की इजाज़त माँगी। सुनील घर गए और उधर सारे पुरुष आराम करने चले गए। रात को रात्रि जागरण का संकेत तो सुनील की व्यवस्था के संकेत से मिल ही चुका था। शीला इधर महिलाओं को मेंहदी लगवाने की व्यवस्था में जुटी थी।
रात लगभग आठ बजे शीला का मोबाइल बजा, सुनील का नाम डिस्प्ले हो रहा था मोबाइल की स्क्रीन पर। शीला अपनी भाभियों से घिरी बैठी थी। सुनील का नंबर देखकर वहाँ से उठ खड़ी हुई। अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। क़रीब दस-पन्द्रह मिनट बाद शीला बाहर निकली। जहाँ चौक में महिलाओं को मेंहदी लग रही थी, वहाँ जाकर उसने घोषणा की कि जब तक रात का खाना तैयार हो रहा है, तब तक एक चक्कर मैं घर का लगा आऊँ, बाबूजी के खाने वग़ैरह का देख आऊँ। इससे पहले कि कोई दूसरी महिला भी साथ चलने को कहे, शीला चौक से बाहर निकल अपनी कार में बैठ चुकी थी। यह जा, वह जा।
शीला की कार घर के हाथी दरवाज़े में समाई और दरवाज़ा तुरंत बंद भी हो गया। अंदर बिलकुल ख़ामोशी थी। चौहद्दी के अंदर रौशनी बिलकुल माँद-माँद हो रही थी। अंदर जहाँ छज्जू जी का कमरा था उसके ठीक बाहर शीला, सुनील और डॉक्टर खड़े हुए थे। तीनों के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। कुछ देर तक तीनों में बात होती रही फिर सुनील ने एक तरफ़ जाकर अपने मोबाइल से कुछ कॉल्स किए। एक के बाद दो या तीन कॉल्स। कॉल करने के थोड़े ही देर में ही अशोक और अनिल अपनी-अपनी पत्नियों के साथ वहाँ पहुँच गए। जहाँ पर पहले तीन लोग खड़े थे, वहाँ अब सात लोग खड़े थे। खड़े रहे.... खड़े रहे.... काफी देर तक खड़े रहे। फिर एक-एक कर सब वहाँ से चले गए, अशोक को छोड़कर बाक़ी सब।
शादीघर में सुनील की व्यवस्था ने रंग जमा दिया था। एक दिन पहले केवल ख़ास ही मेहमान आए थे, इसलिए सुनील ने व्यवस्था भी बहुत अच्छी की थी। सबसे महँगी वाली। महिलाएँ हॉल में जमा होकर बधावे गाने लगीं और पुरुष सारे सुनील के कमरे में डेरा जमा कर बैठ गए। ठहाकों और क़हक़हों से उस कमरे की छत कई बार ऐसा लगा कि अब उड़ी कि तब उड़ी। महिलाओं का भोजन तो बूफे में बाहर लगा दिया गया, मगर पुरुषों का भोजन वहीं कमरे में ही सर्व किया गया। वह भी देर रात क़रीब डेढ़ बजे। उसके पहले तो पनीर और ड्राय फ्रूट्स से बने हैवी स्टार्टर ही चलते रहे। जब रात डेढ़ बजे पुरुष भोजन कर रहे थे, उसी समय वहाँ घर पर एक बड़ी-सी वैन हाथी दरवाज़े से अंदर गई। अंदर जाकर वैन बिलकुल छज्जू जी के कमरे से सट कर खड़ी हो गई। सफ़ेद-सफ़ेद से कुछ लोग उतर कर अंदर गए। कुछ देर बाद वैन हाथी दरवाज़े से बाहर आई और तेज़ गति से क़स्बे से साठ किलामीटर दूर स्थित महानगर की दिशा में बढ़ गई। उसी समय सुनील के मोबाइल पर एक कॉल वहाँ शादी घर में आया। सुनील ने एक तरफ़ जाकर बात की और चेहरे के भाव कुछ रिलैक्स होने के हो गए।
पन्द्रह अगस्त- सुबह से ही मेहमानों का आना शुरू हो गया। बाहर के मेहमानों का भी और शहर की उन महिलाओं का भी जो जलवा पूजन के प्रोसेशन में शामिल होने आ रही थीं। लॉन में बूफे लगा दिया गया था सुबह के नाश्ते का। दक्षिण से लेकर उत्तर और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के सारे व्यंजन उस नाश्ते में सम्मिलित थे। पोहे से लेकर पराँठे तक और इडली से लेकर खमण तक। जो आ रहा था, उसे सीधे नाश्ते की ओर चलने का इशारा किया जा रहा था।
सुनील के कमरे में अत्यंत निकटस्थ रिश्तेदारों की पुरुष मंडली वेटरों द्वारा वहीं सर्व किए गए नाश्ते का आनंद ले रही थी। सुनील और अनिल वहीं थे, जबकि अशोक बाहर मेहमानों की आवभगत में लगे हुए थे। जब लगभग सारे कोर ग्रुप के रिश्तेदार आ गए तो अनिल ने बहुत धीमे से सबको सूचना दी कि रात को पिताजी का ब्लडप्रेशर अचानक बहुत कम हो गया था, उनको रात में ही भोपाल के अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा है। अभी सुबह ख़बर आई है कि अब उनकी स्थिति ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं है। सुनील ने आँखों में आँसू भरकर कहा कि शाम का कार्यक्रम रद्द कर देते हैं, पिताजी अस्पताल में हैं, ऐसे में कार्यक्रम नहीं किया जा सकता। लेकिन मनोज के श्वसुर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि जब अस्पताल से ख़बर आ गई कि स्थिति ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं, तो कार्यक्रम रद्द करने का कोई मतलब नहीं। ब्लड प्रेशर तो इस उम्र में ऊपर-नीचे होता रहता है, वह इतनी बड़ी बात नहीं है। अनिल के श्वसुर ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि इतना बड़ा ताम-झाम है, इतना पैसा लगा है, सब लोग आ गए हैं, अब कार्यक्रम रद्द करना ठीक नहीं होगा। सुनील के साले ने कहा कि जब डॉक्टरों ने कह ही दिया है कि चिंता की कोई बात नहीं, तो अब यह बात इस कमरे से बाहर ही नहीं जाने दी जाए कि छज्जू जी अस्पताल में भर्ती हैं। अस्पताल में हैं तो वैसे भी डर की कोई बात नहीं है, कार्यक्रम किया जाए और वैसे ही किया जाए, जैसे किया जा रहा था। सुनील ने कुछ ना-नुकुर की तो उसके श्वसुर ने आदेशात्मक स्वर में कहा कि छज्जू जी की अनुपस्थिति में अब हम यहाँ के बड़े हैं, आपका निर्णय नहीं चलेगा, हमारा चलेगा और हमारा निर्णय यह है कि  कार्यक्रम वैसे ही होगा जैसे होना था, इस मामले में अब और कोई बात नहीं होगी। कहते हुए वे उठकर खड़े हो गए। सुनील हाथ जोड़े खड़ा था बस।
जलवा पूजन का प्रोसेशन ऐसा था कि सचमुच रंग ही जम गया। बरसात ने भी साथ दिया। मौसम एकदम खुल गया। आगे-आगे चलते हुए सजे-धजे हाथी और एक ही रंग की साड़ियों में सजी हुई महिलाएँ जब बैंड पार्टी के पीछे मंगल गीत गाती हुई चलीं, तो ऐसा लगा जैसे किसी फ़िल्म का दृश्य हो। सड़क केसरिया-लाल रंग में रँग गई पूरी। आगे-आगे मनोज की पत्नी सर से पैर तक ज़ेवरों में लदी हुई कलश लिए चल रही थी। पीछे एक केसरिया-लाल बादल उमड़ रहा था जैसे। सुनील पीछे अपनी कार में चल रहा था दोस्तों के साथ। सुनील के चेहरे पर अब कल वाली चिंता के बादल नहीं थे। उसका चेहरा उल्लास से भरा हुआ था।
दिन के सारे कार्यक्रम वैसे ही हुए जैसे तय किए गए थे। जलवा पूजन से लौटी महिलाओं और सारे मेहमानों के लिए दोपहर भोज में दाल-बाटी चूरमा की व्यवस्था थी। नाम दाल-बाटी चूरमा था, मगर जाने कितने व्यंजन उसके साथ परोसे गए थे। दोपहर के इस भोजन के लिए विशेष रूप से चाँदी के पॉलिश वाले बरतन मँगवाए गए थे। चौकियों पर थालियाँ सजा कर भोजन करवाया गया। मूंडवे वाले परिवार ने मनुहार कर-कर के परोसा और खिलाया। पूरा परिवार, महिलाएँ, पुरुष, बच्चे सब परोसने में लगे थे। भोजन के बाद क़स्बे से जो महिलाएँ आईं थीं, वो अपने-अपने घर चली गईं और मेहमानों की महिलाएँ ब्यूटीशियंस के हवाले हो गईं। इस पूरी आपाधापी में किसे याद रहना था कि छज्जू जी कार्यक्रम शुरू होने से अब तक दिखे ही नहीं हैं। जिनको पता होना था उनको पता था कि छज्जू जी कहाँ हैं।
रात को मानों सितारे ही ज़मीन पर उतर आए। ऐसा जलवा पूजन का समारोह कि सचमुच भूतो न भविष्यति ही हो गया वो। राग-रंग और संगीत का समाँ, उस पर व्यंजन इतने कि गिनती ही न हो पाए। जिधर मिठाई का स्टॉल था उधर ऐसा लग रहा था कि पूरी दुकान ही उठा कर सजा दी गई है। नव प्रसूता ने अपने बच्चे और मनोज के साथ मंच पर थोड़ा नृत्य किया। बाक़ी परिवार के सदस्यों ने भी अपनी-अपनी बारी आने पर अपनी प्रतिभा दिखाई। बीच-बीच में नर्तकियों ने और टीवी की अभिनेत्रियों ने आकर मोर्चा सँभाला और ऐसा सँभाला कि सत्तर पार के बुज़ुर्ग पुरुष मेहमान भी भोजन वाला इलाक़ा छोड़ कर इधर मंच के आस-पास ही जमा हो गए। कुछ नौजवान साथ में नृत्य करने के लिए मंच पर भी पहुँच गए और कमर को अत्यंत बेहूदे तरीक़े से मटका कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगे। सुनील और शीला का भाषण कवि महोदय के सहयोग के कारण ज़बरदस्त रहा। सामने बैठी महिलाओं में बड़ी-बूढ़ियों की आँखें कई बार भाषण में गीली हो गईं। अत्यंत भावुकता से भरा हुआ भाषण था सुनील का और प्रस्तुतिकरण भी अच्छा रहा। इतना तो रहा ही कि जिस प्रयोजन से किया गया था, वह प्रयोजन पूरा हो जाने की पूरी संभावना थी। उस पर सुनील का जोधपुरी साफा जिसका छुरंगा एड़ी तक लहरा रहा था, मानों सारी कसर पूरी कर रहा था। बड़ी-बूढ़ियाँ क़सम खा-खाकर कह रही थीं कि ऐसा जलवा पूजन तो सात पीढ़ियों में न हुआ न आगे सात पीढ़ियों में होगा। ऐसी तो लोग शादी भी नहीं करते हैं, जैसा जलवा पूजन हुआ है ये। रात, देर रात तक जलवा पूजन का जलवा चलता रहा।
सोलह अगस्त- देर रात के थके हुए मेहमान कुछ देर से ही जागे। वे जिनको सुबह ही निकलना था, वे नाश्ता कर के निकलने लगे। उनकी गाड़ियों में मिठाइयों के बड़े बॉक्स रखवाए जा रहे थे। जो थोड़ा नज़दीक के रिश्तेदार थे, वे भोजन के बाद निकलने वाले थे।
दोपहर के भोजन के ठीक बाद जब नज़दीक के कुछ रिश्तेदार ही शेष रह गए थे, और वो सब कार्यक्रम के ठीक प्रकार से हो जाने को लेकर चर्चारत थे, तब ही अचानक सुनील ने बाहर से आकर बताया कि अस्पताल से ख़बर आई है, पिताजी का ब्लडप्रेशर एक बार फिर से बहुत लो हो गया है। परसों रात से बिलकुल ठीक थे, मगर अभी आधे घंटे पहले से तबीयत फिर ख़राब होने लगी है। आनन-फानन में सारी महिलाओं को घर रवाना किया गया और वहाँ उपस्थित सारे पुरुष गाड़ियों में बैठकर महानगर की तरफ़ रवाना हो गए।
आधे घंटे बाद ही सारी गाड़ियाँ महानगर के सबसे महँगे और अत्याधुनिक पाँच सितारा निजी अस्पताल के पार्किंग एरिया में पहुँच चुकी थीं। अस्पताल पहुँच कर सब तेज़ी के साथ लपकते हुए अंदर भागे। सुनील की गाड़ी का ड्रायवर चाय की दुकान पर जाकर खड़ा हो गया। रात को वह भी देर तक जागा था, ड्रायवर था इसलिए जागना तो था ही, मालिक के यहाँ कार्यक्रम था। अस्पताल का एक वार्ड ब्वाय जो उन सारी महँगी-महँगी चमचमाती कारों के क़ाफ़िले को अस्पताल में आता हुआ देख चुका था, ड्रायवर के पास आकर खड़ा हो गया।
अंत में बस उन दोनो की बातचीत
‘‘कौन मरीज़ के लिए आया है ये जुलूस भाई?’’ वार्ड ब्वाय।
‘‘छज्जूमल जी हैं छावनी के, परसों रात में भर्ती करवाया है उनको।’’ ड्रायवर।
‘‘परसों.....’’ वार्ड ब्वाय सोचने लगा ‘‘आई. सी. यू. में..... रात में लाए थे न दो-ढाई बजे ?’’
‘‘अब कितने बजे यह तो पता नहीं, मगर लाए रात में ही थे।’’ ड्रायवर।
‘‘वही हैं, परसों रात को तो आई. सी. यू. में बाहर से बस एक ही केस आया था। बहुत बूढ़े थे न, अस्सी पार के ?’’ वार्ड ब्वाय।
‘‘हाँ वही।’’ ड्रायवर।
‘‘तो उनके लिए इतनी हबड़-दबड़ में दौड़ कर अंदर क्यों गए हैं। उनका खेल तो परसों रात को ही खल्लास हो गया था। यहाँ पर आते-आते वो रास्ते में ही फिनिश हो गए थे, या कौन जाने घर से ही फिनिश हालत में लेकर चले थे। ख़ाली बॉडी ले जाने के लिए ऐसे दौड़ कर गए हैं जैसे कोई सीरियस मामला हो।’’ वार्ड ब्वाय।
अगले दिन छज्जू जी मूंडवे वाले की अंतिम यात्रा इतनी शान से निकली कि एक बार फिर बड़ी-बूढ़ियाँ क़सम खा-खाकर कह रही थीं कि ऐसी यात्रा तो आज तक किसी की नहीं निकली होगी, बेटों ने धन्य कर दिया पिता को। सारा शहर इस बात पर निहाल था कि अब, जब कि अधिकांश अंतिम यात्राओं में मृतक के परिवार वाले भी वाहनों से ही क़स्बे से तीन-चार किलोमीटर दूर स्थित विश्राम घाट जाते हैं, छज्जू जी के तीनो बेटे अंतिम यात्रा में पूरे तीन चार किलोमीटर नंगे पैर पैदल चले। सारे शहर के फूल ख़रीद कर पूरे रास्ते छज्जू जी पर पुष्प वर्षा की गई। सारे रास्तों पर फूल ही फूल बिछते जा रहे थे। सारे शहर से एक ही आवाज़ आ रही  थी ‘‘धन्य हो, धन्य हो, धन्य हो...... ऐसे बेटे धन्य हों......।’’
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समाप्त