<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753</id><updated>2011-09-15T16:32:19.260+05:30</updated><title type='text'>महुआ घटवारिन (कुछ प्रेम कथाएँ)</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12892444318837806408</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-PPNsZO-EM3g/Th_UBql4evI/AAAAAAAABI4/1PrgrD7-Cks/s220/DSC_37802.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>9</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-4562131630044880654</id><published>2011-09-13T11:40:00.001+05:30</published><updated>2011-09-13T11:40:45.789+05:30</updated><title type='text'>कहानी खिड़की</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;खिड़की     &lt;br /&gt;( कहानी पंकज सुबीर )&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;दिनांक 11 सितम्‍बर 2011 को दैनिक भास्‍कर के रसरंग में प्रकाशित&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/-Nr7_z4auIEM/Tm7z4JHHnUI/AAAAAAAAFIk/t-9R9Gz8vkM/s1600-h/khidki1%25255B3%25255D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="khidki1" border="0" alt="khidki1" src="http://lh6.ggpht.com/-yrRKOgdwZWw/Tm7z5H0L6AI/AAAAAAAAFIo/_6oo5ssmdXc/khidki1_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800" width="314" height="259" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;#160; वो लड़की आज भी उसी प्रकार खिड़की में नज़र आ रही है । दोनों तरफ खड़े गुलमोहर के पेड़ों के ठीक बीच बनी हुई वह खिड़की दूर से देखने पर किसी चित्र की तरह नज़र आती है । उस मकान के जितने दूर से होकर वह रोज़ गुजरता है उतनी दूर से किसी की चीज़ के&amp;#160; बारे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, ठीक ठाक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता । उस मकान का एक पार्श्व उस ओर से दिखाई देता है जिस तरफ से वह निकलता है । कंटीले तारों की घेरदार बाड़ के&amp;#160; उस&amp;#160; तरफ&amp;#160; कुछ छोटे फूलदार पौधे लगे हैं । उसके बाद खड़े हैं गुलमोहर के दो पेड़ । जिसके बीच से नजर आती है मकान की वह दीवार जिसमें वह खिड़की बनी है । गहरे नीले रंग से पुती हुई खिड़की । इसी खिड़की पर शायद हाथों की टेक लगा कर उसी प्रकार खड़ी रहती है वह लड़की । रोज़ बिना नागा किसी नियम की तरह ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; एक माह हो गया है शिरीष को यहाँ आये तब से ही वह रोज़ कालेज आते और जाते समय इस दृष्य को&amp;#160; देख रहा है । जिस सड़क से होकर वह गुजरता है उसके बाद एक बड़ा सा खाली मैदान है और उसके बाद है वह खिड़की वाला मकान ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मकान के ठीक समांनातर पर आकर शिरीष ने मकान की ओर&amp;#160; देखा । लड़की उसी प्रकार वहां थी, शिरीष को लगा कि वह लड़की मुस्कुरा रही है, फिर उसे अपने ही विचार पर हंसी आ गई । भला इतनी दूर से नज़र आ भी सकता है कि किसी के चेहरे पर किस प्रकार के भाव हैं ? यहां से तो उस लड़की की पीली फ्राक पर बने हुए लाल फूल भी ठीक ठीक दिखाई नहीं&amp;#160; देते हैं । पीली फ्राक ....? लाल फूल ....? चलते चलते शिरीष को अचानक झटका सा लगा, ये तो उसने कभी सोचा ही नहीं । एक माह से रोज़ वो लड़की इसी फ्राक में नज़र आ रही&amp;#160; है । उसने ठिठक कर मकान की ओर&amp;#160; देखा लड़की उसी प्रकार वहां थी । ज़ुरूर ही यह कोई पेंटिंग है जो किसीने मकान की इस तरफ वाली दीवार पर बना दी है । उसने गौर से खिड़की की तरफ देखा और कुछ देर तक देखता रहा, लड़की इस बार उसे बिल्कुल स्थिर किसी पेंटिंग की तरह नज़र आई । उसने मुस्कुराते हुए अपने ही सर पर चपत लगाई ‘‘फिज़ूल ही&amp;#160; एक पेंटिंग के चक्कर में एक महीने से परेशान है’’&amp;#160; । और आगे बढ़ गया ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; शाम को जब कालेज से लौट रहा था तो अपनी सुबह की खोज पर मुस्कुराते हुए उसने खिड़की की ओर देखा एक बार फिर उसके पैर जम गये । लड़की खिड़की पर नहीं थी । एक माह में ये पहली बार हुआ है कि शिरीष को वह लड़की खिड़की पर&amp;#160; नहीं दिखाई&amp;#160; दी है । सुबह की उसकी खोज पर पानी फिर गया ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अगले&amp;#160; दिन जब शिरीष वहां&amp;#160; से गुज़रा तो लड़की वहीं थी, उसी प्रकार अपनी लाल फूलों वाली पीली फ्राक पहने हुए । शिरीष खिड़की की ओर देखकर मुस्कुराया आज उसे लगा कि वह लड़की भी मुस्कुरा रही है । तिराहे पर आकर उसके पैर ठिठक गए यहां से ही तो एक रास्ता उस नीली खिड़की वाले मकान की ओर गया है । कुछ देर तक ठहर कर&amp;#160; सोचता रहा फिर सधे कदमों से उस मकान की ओर&amp;#160; जाने वाले रास्ते पर बढ़ गया ।&amp;#160; छोटा सा मकान खामोशियों में&amp;#160; डूबा हुआ था । मकान का वह पार्श्व जहाँ वह खिड़की है सामने से नज़र नहीं आ रहा था । गेट खोलकर शिरीष&amp;#160; अंदर आया और झिझकते कदमों से आगे बढ़ा।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ‘‘कौन ?’’&amp;#160; गेट के खुलने की आवाज़ से अंदर से एक स्त्री स्वर आया ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ‘‘जी मैं हॅ शिरीष’’ अपने ही&amp;#160; उत्तर के अटपटेपन को महसूस किया शिरीष ने ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; कुछ देर में दरवाज़ा खुला, एक अधेड़ उम्र की महिला दरवाजे पर खड़ीं थीं । स्थिति असहज बनने से पहले ही शिरीष ने उनके पैर छू लिए ‘‘नमस्‍ते&amp;#160; आंटी’’।     &lt;br /&gt;‘‘बस बस ,खुश रहो । आओ, अंदर आओ’’ कहते हुए वे दरवाज़े से हट गईं ।&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अंदर आकर शिरीष ने देखा चारों तरफ ख़ामोशी है ‘‘तुम बैठो बेटा मैं अभी आती हूं ’’ कह कर वो महिला अंदर चली गईं ।     &lt;br /&gt;कुछ देर बाद एक ट्रे में कॉफी के दो कप लेकर लेकर लौटीं । टेबल पर रखते हुए बोलीं ‘‘लो बेटा कॉफी पिओ, अपने लिये बना ही रही थी कि तुम आ गये, चलो आधी आधी पी लेते हैं ’’।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; एक कप उठाते हुए कहा शिरीष ने ‘‘और कोई नहीं है घर में ?’’।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ‘‘मैं यहाँ अकेली ही रहती हूँ ’’ महिला का उतर सुनकर शिरीष बुरी तरह से चौंक गया। उसने देखा सामने दीवार पर लड़की की फोटो लगी है, उसने अटकते हुए पूछा ‘‘और ये ? ’’ ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ‘‘ ये मेरी बेटी थी, दो साल पहले नहीं रही । ’’ महिला ने ठंडे स्वर में उत्तर दिया ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; महिला का एक एक शब्द शिरीष को किसी कुंए में गूंजता प्रतीत हो रहा था ‘‘दोनो पैरों से विकलांग थी सुधा, मगर दोनो आँखें सपनों से भरी रहतीं थीं हमेशा । जैसे जैसे बड़ी होने लगी उसके सपने प्रेम की दस्तक सुनने की प्रतीक्षा में सुनहले रुपहले होने लगे । खिड़की पर बैठकर घंटों रास्ते की ओर देखती रहती । मानो किसी की प्रतीक्षा कर रही हो । किसी से प्रेम करना चाहती थी वह, और इसी लिए अपने जीवन में प्रेम की प्रतीक्षा करती रहती थी । सपने देखने वाली उसकी आँखें दो साल पहले अचानक बुझ गईं’’ कहते कहते महिला का कंठ रुंध गया ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; शिरीष अवचेतन से वर्तमान में लौटा और बोला ‘‘सॉरी आंटी मुझे पता नहीं था’’।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ‘‘कोई बात नहीं बेटा ।’’ महिला ने अपने को संभालते हुए कहा । ‘‘नहीं आंटी अब मैं चलूंगा। ’’ कहते हुए शिरीष उठ कर खड़ा हो गया ।     &lt;br /&gt; जब वह चलने लगा तो पीछे से महिला की आवाज़ आई ‘‘बेटा’’ । सुनकर शिरीष ठिठक कर पलटा&amp;#160; और बोला ‘‘जी आंटी ’’ ।    &lt;br /&gt;वो महिला कुछ न बोली बस शिरीष की ओर देखती रही । शिरीष&amp;#160; भी चुपचाप खड़ा कुछ देर तक महिला के निचले होंठ और ठुड्डी में होते हुए कंपन तथा पलकों के भीगते किनारों को देखता रहा, फिर अचानक महिला ने कांपते स्वर में शिरीष की ओर देखते हुए पूछा     &lt;br /&gt;‘‘क्या तुम्हें भी नज़र आई थी वह ?’’ &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-4562131630044880654?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/4562131630044880654/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=4562131630044880654&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/4562131630044880654'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/4562131630044880654'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='कहानी खिड़की'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh6.ggpht.com/-yrRKOgdwZWw/Tm7z5H0L6AI/AAAAAAAAFIo/_6oo5ssmdXc/s72-c/khidki1_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-329016788623818354</id><published>2011-06-16T11:13:00.001+05:30</published><updated>2011-06-16T11:13:22.661+05:30</updated><title type='text'>क्‍या होता है प्रेम (नया ज्ञानोदय के प्रेम विशेषांक में प्रकाशित कहानी) पंकज सुबीर</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-dy5IlKBc694/TfmX5b326dI/AAAAAAAAE8I/dnOr2ucgdJE/s1600-h/kya%252520hota%252520he%252520prem%25255B3%25255D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="kya hota he prem" border="0" alt="kya hota he prem" src="http://lh3.ggpht.com/-i6KnV0oPQX4/TfmX7ofjW2I/AAAAAAAAE8M/GxXW4EUOQd8/kya%252520hota%252520he%252520prem_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800" width="240" height="180" /&gt;&lt;/a&gt; खिड़की के बाहर गर्मी की रात बिखरी हुई है, गर्मी की गुनगुनी सी रात । खिड़की से सटकर लगी हुई रात रानी की झाड़ी के फूलों की मादक गंध खिड़की के परदे से अठखेलियों कर रही हवा के साथ कमरे में आ रही है । खिड़की के छोर पर लदी हुई रंगून क्रीपर की लतर भी लाल सफेद और गुलाबी फूलों के गुच्छों के कारण झुकी झुकी जा रही है । खिड़की के पार दूर आसमान में आधा अधूरा चाँद टंका हुआ है । ग्रीष्म की धूप को दिन भर सहन करने के बाद झुलसे पेड़ों&amp;#160; की पत्तियों और शाखाओं को रात की ठंडी हवा सहला रही है । हवा का स्पर्श पाकर पत्तियां कृतज्ञतावश झुकी झुकी जा रही हैं । गर्मी के मौसम की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रात होती है । जितना तपता हुआ, जलता हुआ दिन उतनी ही सुहानी रात ।     &lt;br /&gt;खिड़की से हट कर सोनू अंदर आ गया और अपनी कविता की डायरी ले कर कुर्सी पर बैठ गया। लड़का अभी भी उसी प्रकार सो रहा है । सोनू गौर से उस लड़के के चेहरे को देखने लगा । चौदह-पन्द्रह वर्ष की मासूमियत से भरा हुआ चेहरा, जिस पर जवानी ने होठों के ऊपर कल्ले की तरह फूट रहे मूंछों के बारीक-बारीक रोम के रूप में अभी दस्तक देना प्रारंभ ही किया है । गुलाबी होंठ जिनको बीमारी ने भले ही सुखा दिया है मगर अभी भी उनमें ताजगी है। बीमारी के बाद भी चेहरे पर किशोरावस्था की चमक और स्निग्धता बिखरी है ।     &lt;br /&gt;सोनू को यहाँ लडक़े की देखभाल के लिये रखा गया है । वैसे वो एक निजी अस्पताल का कर्मचारी है जिसके मालिक लडक़े के पिता के करीबी दोस्त हैं उनके ही कारण सोनू को यहां भेजा गया है । लड़के को दवा देना उसे पंलग से उठाकर टहलाना, खाना खिलाना सबकी व्यवस्था सोनू को करनी होती है। लड़के की माँ नहीं हैं केवल पिता ही हैं, जिनको कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर रहना पडता है।&amp;#160; इससे ज्यादा न सोनू को पता है, ना ही उसको पूछने की इजाज़त है । उसे बस ये पता है कि यहां से उसे अच्छा पैसा मिलेगा जो कालेज की परीक्षा फीस भरने में काम आ जाएगा । यहाँ पर जब तक है तब तक कविता लिखने का भी समय है उस के पास । अस्पताल की नौकरी वो केवल अपनी कॉलेज की पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिये ही कर रहा है, मगर अस्पताल में काम करते समय कविता? सोचा ही नहीं जा सकता ।&amp;#160; &lt;br /&gt;''सोनू भय्या'' लडक़े की आवाज सुनकर सोनू की तंद्रा टूटी ।     &lt;br /&gt;''हाँ बोलो'' सोनू ने कुर्सी से उठ कर पंलग की तरफ जाते हुए कहा ।     &lt;br /&gt;''पानी चाहिए सोनू भय्या'' लड़के ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''देता हूँ तुम लेटे रहो'' फिर घड़ी देखते हुए कहा ''दवा लेने का टाइम भी तो हो गया है'' कहते हुए सोनू दवा निकालने लगा ।     &lt;br /&gt;''चलो उठ कर बैठ जाओ दवा लेना है'' सोनू के कहते ही लड़का धीरे धीरे उठा और तकिये से टिक कर बैठ गया । दवा देने के बाद जब सोनू वापस कुर्सी पर बैठने जाने लगा तो लडक़े ने कहा ''सोनू भय्या यहीं बैठ जाओ न पलंग पर, आपसे बातें करूंगा, अब नींद तो आएगी नहीं ।'' लडक़े के अनुरोध पर सोनू वहीं बैठ गया। पलंग के&amp;#160; पास रखी टेबल पर से कंघी उठा कर लडक़े के बाल ठीक करने लगा । गर्मी की मस्त हवा के कारण लडक़े के बाल बिखर बिखर जा रहे हैं । शाम को नहाते समय लडक़े ने जिद करके शैंपू लगाया था और देर तक नहाता रहा था ।     &lt;br /&gt;''सोनू भय्या'' लड़के के सर पर गिर रही एक लट को जब वो पीछे कर रहा था तब लडक़े ने कहा । ''हूँ ...।'' कंघी को टेबल पर रखते हुए कहा सोनू ने । कुछ देर तक लड़का चुप रहा फिर बोला ''ये प्रेम क्या होता है ....?'' लड़के के प्रश्न से सोनू कुछ चौंका फिर मुस्कुराता हुआ बोला ''प्रेम....? अभी तीन चार साल रुक जाओ, सब पता चला जाएगा'' कहते हुए उसने लडक़े के बालों को हल्के से बिखरा दिया ।     &lt;br /&gt;''तीन चार साल रुक पाऊँगा मैं...?'' लड़के ने उदासी से पूछा । लड़के के पूछते ही कमरे की हवा रुक गई।    &lt;br /&gt;''क्या होता है प्रेम सोनू भय्या ...?'' सोनू को चुप देख लड़के ने फिर पूछा ।     &lt;br /&gt;''प्रेम वो होता है जो हमें किसी दूसरे से जोडता है ।'' सोनू ने कुछ टालने वाले अंदाज में कहा ।     &lt;br /&gt;''किससे ?'' लडक़े ने फिर पूछा ।     &lt;br /&gt;''किसी से भी, उन सबसे जो हमें अच्छे लगते हैं, हमारे माँ-बाप, हमारे भाई-बहन, हमारे दोस्त'' सोनू ने जवाब दिया ।     &lt;br /&gt;''माँ तो मेरे पास नही हैं पापा हैं पर वो भी ....... भाई बहन भी नही हैं''&amp;#160; कहते-कहते&amp;#160; लडक़ा फिर चुप हो गया । लडक़े की आंखें अचानक नम हो गईं थीं । सोनू को लगा उसकी पलकों के किनारे झिलमिला भी रहे हैं । उसने लडक़े को सहज करने के लिए कहा ''और सबसे खास प्रेम हमें किसी एक खास से भी होता है''&amp;#160; सोनू के इतना कहते ही लडक़े के चेहरे के भाव अचानक बदल गए, मानो सोनू ने उसके मन की बात कह दी हो ।     &lt;br /&gt;''कौन खास सोनू भय्या ..?''&amp;#160; उसने उत्सुकता से पूछा ।     &lt;br /&gt;''ये जो बाहर चाँद नजर आ रहा है न, आधा अधूरा सा चाँद, इसको देखकर न तो रात की रानी के&amp;#160; फूल झूम रहे हैं न पेड़ों की पत्तियां इठला रही हैं । क्योंकि ये सब एक खास चाँद से प्रेम करते हैं । पूर्णमासी के पूरे चाँद से । अभी दो दिन बाद जब ये चाँद पूरा हो जाएगा तब ये सब उस खास के&amp;#160; प्रेम में पागल हो जाएँगे '' सोनू ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''सचमुच ........?''&amp;#160; लड़के ने उत्सुकता से फिर पूछा ।     &lt;br /&gt;''हाँ बिल्कुल''&amp;#160; सोनू ने कहा ।    &lt;br /&gt;''दिखाओगे&amp;#160; मुझे''&amp;#160; लड़के ने पूछा ।&amp;#160; &lt;br /&gt;''हाँ बिल्कुल दिखाऊँगा''&amp;#160; सोनू ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;लड़का गौर से खिड़की के पार के चाँद को देखने लगा । उसके चेहरे के भाव पल-पल बदल रहे थे । कुछ देर तक देखते रहने के बाद लड़का फिर उदास हो गया ।     &lt;br /&gt;''तुम्हें मिला कोई खास ..?''&amp;#160; सोनू ने लडक़े का मूड बदलने के लिए पूछा ।     &lt;br /&gt;लडक़े ने सोनू की तरफ देखा । सोनू ने देखा उन दो नन्ही आंखों में सितारे झिलमिला रहे थे । फिर अचानक वो शरमा गया और चादर के धागे खींचने लगा ।     &lt;br /&gt;''हूँ ..... मतलब मिली है''&amp;#160; सोनू ने मजाक के अंदाज में पूछा ।     &lt;br /&gt;''है नहीं थी........।''&amp;#160; लड़के ने उसी तरह झुके हुए कहा पर उसकी आवाज डूबी हुई थी ।     &lt;br /&gt;''कब ?''&amp;#160; सोनू ने पूछा ।    &lt;br /&gt;''जब में स्कूल जाता था .........''&amp;#160; लडके के स्वर में उदासी थी । उसकी आवाज ऐसी थी मानो किसी सुनसान रात में पहाड़ पर लगे पेड़ों पर बर्फ गिर रही हो ।    &lt;br /&gt;''कौन थी ....?''&amp;#160; सोनू ने फिर पूछा ।    &lt;br /&gt;''मेरे साथ ही पढती थी और मेरे साथ वही होता था जो अभी आपने कहा ना कि पूर्णमासी के चाँद को देखकर पेड़ों को हो जाता है ।''&amp;#160; लडक़े ने धीरे से कहा ।     &lt;br /&gt;''हूँ....... खूब बात-वात होती होंगी तब तो उससे''&amp;#160; सोनू ने शरारत के लहजे में पूछा ।     &lt;br /&gt;''नहीं, बात तो एक बार भी नहीं हुई''&amp;#160; लडक़े ने सर उठा कर उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''अरे ..........! क्यों..............?''&amp;#160; सोनू ने पूछा ।&amp;#160; &lt;br /&gt;''हिम्मत नहीं होती थी और वो भी शायद बात करना नहीं चाहती थी''&amp;#160; लड़के की आंखें बुझ गईं थीं ।     &lt;br /&gt;''चलो अब जब स्कूल जाना शुरू करो तो सबसे पहले उससे जाकर बात करना और नहीं कर पाओ तो मुझे ले चलना मैं तुम्हारी तरफ से बात कर लूंगा ।''&amp;#160; सोनू ने लडक़े के सर पर हाथ रखते हुए कहा ।     &lt;br /&gt;''क्यों मजाक करते हो सोनू भय्या, अब कहाँ जा पाऊँगा मैं स्कूल ? अब तो शायद मम्मी के&amp;#160; पास ही चला जाऊँगा''&amp;#160; कहते हुए लड़के ने सर पर रखा सोनू का हाथ लेकर गोद में रख लिया और दोनों हाथों में दबा लिया । सोनू ने दूसरे हाथ से लड़के को कंधे से खींचा और अपनी गोद में उसका सर रख कर लिटा लिया ।     &lt;br /&gt;''नहीं बेटा ऐसा नहीं कहते, मैं हूँ ना, मैं तुमको बिल्कुल ठीक कर दूंगा''&amp;#160; सोनू ने लड़के की आंखो में आई नमी को अपनी उंगलियों में समेटते हुए कहा । लडक़े ने कोई उत्तर नहीं दिया उसी तरह लेटा रहा । सोनू उसके&amp;#160; बालों को सहलाता रहा । कुछ देर बाद जब उसको लगा कि लड़का सो गया है तो उसने आहिस्ता से लडक़े का सर अपनी गोद से उठा कर तकिये पर रखा उसे चादर उढ़ाई और आकर अपने पंलग पर लेट गया ।     &lt;br /&gt;अगले दिन से लड़के की तबीयत बिगड़ने लग गई थी । तेज बुखार में बडबडाता रहता था । सोनू ने सुना कि उसकी बड़बड़ाहट में बार बार मम्मी शब्द आ रहा है । नर्सिंग होम से कई बार डाक्टर आकर लड़के को देख कर जा चुके थे ।     &lt;br /&gt;बुखार के तीसरे दिन जब डाक्टर सिन्हा लड़के को देख कर वापस जा रहे थे रहे थे तब सोनू ने पूछा था ''कोई डरने की बात तो नहीं है न सर''&amp;#160; ।    &lt;br /&gt;''डरने की बात तो है, अब इसे अस्पताल में शिफ्ट करना ही पड़ेगा, ये रिकवर हो ही नहीं पा रहा है । इसके&amp;#160; पिता कब तक आ जाएंगे ?''&amp;#160; डाक्टर सिन्हा ने कहा था ।     &lt;br /&gt;''बस शायद परसों तक आ जाएंगे, सर्वेंट बता रहा था कि उनका फोन आया था''&amp;#160; सोनू ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''ठीक है उनके&amp;#160; आते ही&amp;#160; इसे शिफ्ट कर देंगे, तब तक ध्यान रखना कुछ भी हो तो तुरंत खबर करना''&amp;#160; कहते हुए डाक्टर सिन्हा चले गए । सोनू आकर लड़के के सिरहाने बैठ गया । और धीरे धीरे उसका सर दबाने लगा । कुछ देर बाद लडक़ा कसमसाया और उसने आंखें खोल दीं । सोनू को देखा तो मुस्कुरा दिया । ''उठ गए, चलो अच्छा किया, शाम भी हो गई है''&amp;#160; सोनू ने कहा ।     &lt;br /&gt;लड़का कुछ देर तक सोनू को देखता रहा फिर बोला ''सोनू भय्या क्या अब मैं उसको कभी नहीं देख पाऊँगा ?''     &lt;br /&gt;''क्यों नहीं देख पाओगे? मुझे उसका पता, टेलीफोन नंबर दो अभी बुला लेता हूँ'' सोनू ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''वो तो मुझे कुछ भी नहीं पता''&amp;#160; लडक़े ने उदासी के&amp;#160; साथ कहा।    &lt;br /&gt;''चलो मैं कल स्कूल जाकर पता कर लूंगा और उसको बुला लाऊँगा''&amp;#160; सोनू ने लडक़े का उत्साह बढाने के लिए कहा। लड़का फिर चुप हो गया । खिड़की के बाहर देखता रहा फिर अचानक बोला ''सोनू भय्या आज पूर्णिमा है ना ? आज आपने कुछ दिखाने का कहा था ।''     &lt;br /&gt;''हाँ भाई दिखा दूंगा रात तो होने दो'' सोनू ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''सोनू भय्या मैं अपनी मम्मी को भी देखना चाहता था पर नहीं देख पाया, ये सब मेरे साथ ही ....'' कहते कहते लडक़ा चुप हो गया ।&amp;#160; &lt;br /&gt;''चलो आज दिखा दूंगा जब चाँद पूरा होगा ना तब उसमें तुमको अपनी मम्मी भी&amp;#160; दिखेंगी और वो भी । वो सब दिखेंगे जिनको तुम प्रेम करते हो'' सोनू ने कहा ।     &lt;br /&gt;''सच .......।'' लड़के ने उत्साह में भरकर कहा ।    &lt;br /&gt;''बिल्कुल सच'' सोनू ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''पर मैं उनको छू तो नहीं पाऊंगा न........?'' लडक़ा फिर उदास हो गया ।     &lt;br /&gt;''क्यों नहीं छू पाओगे ? जब चाँद को देखो&amp;#160; तो मेरी इस हथेली को छू लेना तुमको ऐसा लगेगा कि तुम उन सबको छू रहे हो जिनको तुम प्रेम करते हो '' सोनू ने अपनी हथेली दिखाते हुए कहा ।    &lt;br /&gt;''ठीक है'' लड़का फिर उत्साह में भर गया।&amp;#160; &lt;br /&gt;''पर देखो जब चाँद में तुम्हारी वो खास नजर आए तो उसे देखकर शरमा मत जाना'' सोनू ने लडक़े की कमर में गुदगुदी करते हुए कहा लड़का खिलखिला उठा ।     &lt;br /&gt;रात को लडक़ा सोनू के साथ खिडक़ी पर आ गया । लड़के को सोनू ने गोद में उठा कर खिडकी पर बैठा दिया था क्योंकि अब उसके&amp;#160; चलने फिरने की ताकत बिल्कुल क्षीण हो गई थी ।     &lt;br /&gt;''देखो वो पूरा पीला चाँद'' अमलतास के दो पेड़ों के ऊपर दिख रहे चाँद की ओर इशारा करते हुए सोनू ने कहा । लड़के ने सर उठा कर चाँद को देखा ।     &lt;br /&gt;''देखो उसमें अपनी मम्मी को । दिख रही हैं ना?''&amp;#160; सोनू ने पूछा, लडक़े ने हाँ में सिर हिलाया ।     &lt;br /&gt;''ठीक है अब आंखें बंद करके मेरी इस हथेली को छुओ''&amp;#160; सोनू के कहते ही लडक़े ने वैसा ही किया । थोडी देर बाद लडक़े ने हथेली को खींच कर अपने चेहरे से सटा लिया । कुछ ही देर में सोनू की हथेली भीग गई ।     &lt;br /&gt;सोनू ने लडक़े की आंखें पोंछीं और फिर कहा ''चलो अब फिर देखो चाँद को, अब वो दिखेगी''&amp;#160; लड़के ने फिर चाँद को देखा । ''दिखी ?''&amp;#160; सोनू&amp;#160; ने पूछा। लडक़े ने फिर हाँ में सर हिलाया और&amp;#160; आंखें बंद कर ली और सोनू की हथेली&amp;#160; को फिर चेहरे से लगा लिया । अबकी बार सोनू को हथेली पर नमी की जगह आंच का एहसास हुआ लड़के की गर्म सांसों की आंच का एहसास । आंच धीरे धीरे बढ़ती जा रही थी। बढते-बढ़ते अचानक एकदम ठंडी हो गई और हथेली पर सांसों के&amp;#160; टकराने का एहसास भी बंद हो गया । सोनू ने देखा दूर आसमान पर एक सितारा टूटा और रोशनी की लकीर छोडता हुआ चाँद की तरफ बढ़ा । चाँद के ठीक पास आकर वो सितारा बुझ गया मानो चाँद&amp;#160; को छूकर खामोश हो गया हो । सोनू ने आहिस्ता से लड़के का चेहरा हथेली पर से हटाया लड़का उसकी बाँहों में झूल गया । हवा बिल्कुल ठहर गई थी मगर रात रानी के छोटे-छोटे फूल चुपचाप आंसुओं की तरह टप-टप करके ज़मीन पर टपक रहे थे।&lt;a href="http://lh5.ggpht.com/-xqLFiMbSAa4/TfmX9LTD3lI/AAAAAAAAE8Q/BiqZL3HVzo0/s1600-h/kya%252520hota%252520he%252520prem2%25255B2%25255D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="kya hota he prem2" border="0" alt="kya hota he prem2" src="http://lh6.ggpht.com/-VN5JudctlIc/TfmX-MyoL_I/AAAAAAAAE8U/mX63WGwVFIk/kya%252520hota%252520he%252520prem2_thumb.jpg?imgmax=800" width="193" height="244" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;&lt;strong&gt;समाप्त&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-329016788623818354?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/329016788623818354/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=329016788623818354&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/329016788623818354'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/329016788623818354'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='क्‍या होता है प्रेम (नया ज्ञानोदय के प्रेम विशेषांक में प्रकाशित कहानी) पंकज सुबीर'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh3.ggpht.com/-i6KnV0oPQX4/TfmX7ofjW2I/AAAAAAAAE8M/GxXW4EUOQd8/s72-c/kya%252520hota%252520he%252520prem_thumb%25255B1%25255D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-2688496306831990055</id><published>2010-11-02T12:33:00.002+05:30</published><updated>2010-11-02T12:33:49.316+05:30</updated><title type='text'>सीहोर के कवि सम्‍मेलन में पंकज सुबीर का काव्‍य पाठ</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-24VsfvXI/AAAAAAAADbo/-yKN--r-E8s/s1600/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nx="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-24VsfvXI/AAAAAAAADbo/-yKN--r-E8s/s320/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-297OyQOI/AAAAAAAADbs/3t9vuLBN7os/s1600/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(1).JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nx="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-297OyQOI/AAAAAAAADbs/3t9vuLBN7os/s320/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(1).JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3Cv96URI/AAAAAAAADbw/xhFH6FTd12Q/s1600/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(2).JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nx="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3Cv96URI/AAAAAAAADbw/xhFH6FTd12Q/s320/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(2).JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3Hv3s_2I/AAAAAAAADb0/0i-PC6OBPPc/s1600/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(3).JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nx="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3Hv3s_2I/AAAAAAAADb0/0i-PC6OBPPc/s320/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(3).JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3MhnH0II/AAAAAAAADb4/ju4-ef1AODc/s1600/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(4).JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" nx="true" src="http://4.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3MhnH0II/AAAAAAAADb4/ju4-ef1AODc/s320/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(4).JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-3RKL0iqI/AAAAAAAADb8/jOJinlT4VjI/s1600/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP+(5).JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" 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title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=2688496306831990055&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/2688496306831990055'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/2688496306831990055'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='सीहोर के कवि सम्‍मेलन में पंकज सुबीर का काव्‍य पाठ'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_XQyeaYRtFiI/TM-24VsfvXI/AAAAAAAADbo/-yKN--r-E8s/s72-c/PANKAJ+SUBEER+KAVI+SEHORE+MP.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-2661404580953809044</id><published>2010-10-08T17:36:00.001+05:30</published><updated>2010-10-08T17:36:05.823+05:30</updated><title type='text'>भारत भवन में कहानी पाठ करेंगे पंकज सुबीर</title><content type='html'>&lt;p align="center"&gt;&lt;a href="http://lh6.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/TK8JJY_Z1vI/AAAAAAAADTM/9vBF_529ToQ/s1600-h/PANKAJ%20EUBEER%20SEHORE%5B2%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="PANKAJ EUBEER SEHORE" border="0" alt="PANKAJ EUBEER SEHORE" src="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/TK8JLDwshMI/AAAAAAAADTQ/ZwBQ0esPgcc/PANKAJ%20EUBEER%20SEHORE_thumb.jpg?imgmax=800" width="244" height="244" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;  &lt;p align="center"&gt;भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से के युवा कथाकार पंकज सुबीर देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान भारत भवन में&amp;#160; कहानी पाठ करेंगे । भारत भवन न्यास द्वारा आगामी नौ तथा दस अक्टूबर को देश भर के कहानीकारों का दो दिवसीय आयोजन किया जा रहा है । आयोजन का शुभारंभ नौ अक्टूबर को प्रात: दस बजे देश के शीर्ष कथाकार गोविंद मिश्र करेंगे । सीहोर के कहानीकार पंकज सुबीर को इस महत्वपूर्ण आयोजन में उद्धाटन सत्र में कहानी पाठ के लिये आमंत्रित किया गया है । भारत भवन न्यास द्वारा हिंदी कहानी पर आयोजित देश के सबसे प्रतिष्ठित दो दिवसीय आयोजन में देश भर के चुनिंदा कहानीकारों को आमंत्रित किया गया है । जहां हिंदी कहानी पर विमर्श किया जायेगा । इस दो दिवसीय आयोजन में उद्धाटन सत्र में श्री गोविंद मिश्र के उद्बोधन के पश्चात पंकज सुबीर अपना कहानी पाठ करेंगें । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-2661404580953809044?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/2661404580953809044/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=2661404580953809044&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/2661404580953809044'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/2661404580953809044'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='भारत भवन में कहानी पाठ करेंगे पंकज सुबीर'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/TK8JLDwshMI/AAAAAAAADTQ/ZwBQ0esPgcc/s72-c/PANKAJ%20EUBEER%20SEHORE_thumb.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-3770011046178281705</id><published>2010-09-08T11:45:00.001+05:30</published><updated>2010-09-08T11:45:29.189+05:30</updated><title type='text'>भारतीय ज्ञानपीठ के 'नवलेखन पुरस्‍कार' से सम्‍मानित पंकज सुबीर का उपन्‍यास ' ये वो सहर तो नहीं...' पर वरिष्‍ठ कथाकार, व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ की  टिप्‍पणी ।</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;( भारतीय ज्ञानपीठ के 'नवलेखन पुरस्‍कार' से सम्‍मानित ' ये वो सहर तो नहीं...' समाजकि सरोकार, राजनीतिक विवेक, सभ्‍यता समीक्षा और औपन्‍यासिक उत्‍कर्ष के लिये निश्चित रूप से महत्‍वपूर्ण माना जाएगा ।) वरिष्‍ठ कथाकार, व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ की पंकज सुबीर के उपन्‍यास 'ये वे सहर तो नहीं पर विशेष टिप्‍पणी ।&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://lh4.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/TIcp_JA0iEI/AAAAAAAADRs/iAaIcqeLhCw/s1600-h/ye%20wo%20sehar%20to%20nahin5%5B3%5D.jpg"&gt;&lt;img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="ye wo sehar to nahin5" border="0" alt="ye wo sehar to nahin5" src="http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/TIcp__XubeI/AAAAAAAADRw/5ye6VvDqmZA/ye%20wo%20sehar%20to%20nahin5_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800" width="225" height="317" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;#160; &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="left"&gt;ये वो सहर तो नहीं...    &lt;br /&gt;'ये वो सहर तो नहीं...' युवा कथा लेखन के विकासशील प्रान्‍तर में उज्‍जवल उपलब्धि की तरह उपस्थित पंकज सुबीर का प्रथम उपन्‍यास है । पंकज सुबीर ने अपने पहले&amp;#160; कहानी संग्रह 'ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी' से ही पाठकों और आलोचकों का ध्‍यान आकर्षित किया था । भाषा की पहेलियों और इंटरनेटी विद्वता के बीच कुलेल करते अनेक रचनाकारों के मध्‍य पंकज सुबीर के रचनात्‍मक सराकोर आश्‍वस्‍त करते हैं । इतिहास और वर्तमान की सहगाथा और समय का संश्लिष्‍ट रूपक रचते उपन्‍यास 'ये वो सहर तो नहीं' में पंकज सुबीर कथा रस और कथा सिद्धि की रेखांकित करने योग्‍य दिशाओं का परिचय देते हैं ।     &lt;br /&gt;इस उपन्‍यास में समय समीक्षा का एक महाकाव्‍यात्‍मक उपकम है । 1857 और 2007 के समयों की पड़ताल करते हुए उपन्‍यास यह देखना चाहता है कि उन सामाजिक मूल्‍यों का क्‍या हुआ जिनके लिये इस महादेश में जनक्रान्ति का अभूतपूर्व प्रस्‍थान निर्मित हुआ था । क्‍या मुक्ति के महास्‍वप्‍न अभी मध्‍यांतर में हैं ? जड़ता, दासता, शोषण, अन्‍याय,अस्मिता-संघर्ष तथा दरिद्रता आदि के स्‍तरों से घनीभूत 'अमानिशा' क्‍या समाप्‍त हो सकी है ?&amp;#160; क्‍या जिस सुबह का इन्‍तज़ार असंख्‍य जनों को था, उसका चेहरा दिख सका ?&amp;#160; डेढ़ सौ वर्ष से अधिक समय की थाह लगाते हुए लेखक ने प्रकारान्‍तर से लोकतन्‍त्र की सामर्थ्‍य और सीमा को परखा है । साहिर लुधियानवी के प्रबल आशावाद 'वो सुबह कभी तो आयेगी' और फ़ैज़ के मोहभंग 'वो इन्‍तज़ार था जिसका ये वो स‍हर तो नहीं' की स्‍मृति जगाता यह उपन्‍यास एक उपलब्धि है ।     &lt;br /&gt;'ये वो सहर तो नहीं...' इस दृष्टि से भी महत्‍वपूर्ण है कि यह रक्‍तबीज जैसी समस्‍याओं की नाभिनालबद्धता को उद्घाटित करता है । ये समस्‍याएं सभ्‍यता के बढ़ते आवरणों के साथ बहुरूपिया हो गईं हैं । उपन्‍यास का अंतिम वाक्‍य है 'मुकदमे अभी तक चल रहे हैं, चल रहे हैं, चल रहे हैं'। विश्‍व-मानवता के न्‍यायालय में मुक्ति के तमाम मुकदमों की स्थिति बयान करता यह उपन्‍यास हमारे समय का विराट बिम्‍ब है । पंकज सुबीर ने जटिल शिल्‍प को साधने के साथ भाषा की मर्मान्‍वेषी प्रकृति का सार्थक उपयोग किया है ।     &lt;br /&gt;भारतीय ज्ञानपीठ के 'नवलेखन पुरस्‍कार' से सम्‍मानित ' ये वो सहर तो नहीं...' समाजिक सरोकार, राजनीतिक विवेक, सभ्‍यता समीक्षा और औपन्‍यासिक उत्‍कर्ष के लिये निश्चित रूप से महत्‍वपूर्ण माना जाएगा ।     &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p align="right"&gt;&lt;strong&gt;-सुशील सिद्धार्थ&lt;/strong&gt;&amp;#160;&lt;/p&gt;  &lt;p&gt;( सुशील सिद्धार्थ देश के महत्‍वपूर्ण कहानीकारों तथा व्‍यंग्‍यकारों में से हैं तथा एक महत्‍वपूर्ण आलोचक हैं जो देश की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में आलोचनात्‍मक लेख लिखते हैं )&amp;#160; &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-3770011046178281705?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/3770011046178281705/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=3770011046178281705&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/3770011046178281705'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/3770011046178281705'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='भारतीय ज्ञानपीठ के &amp;#39;नवलेखन पुरस्‍कार&amp;#39; से सम्‍मानित पंकज सुबीर का उपन्‍यास &amp;#39; ये वो सहर तो नहीं...&amp;#39; पर वरिष्‍ठ कथाकार, व्‍यंग्‍यकार सुशील सिद्धार्थ की  टिप्‍पणी ।'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh5.ggpht.com/_XQyeaYRtFiI/TIcp__XubeI/AAAAAAAADRw/5ye6VvDqmZA/s72-c/ye%20wo%20sehar%20to%20nahin5_thumb%5B1%5D.jpg?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-7718654163964897432</id><published>2010-04-30T11:13:00.001+05:30</published><updated>2010-04-30T11:13:46.209+05:30</updated><title type='text'>कहानी- महुआ घटवारिन - पंकज सुबीर</title><content type='html'>&lt;p&gt;   &lt;br /&gt;''सर रेणु जी ने महुआ घटवारिन की पूरी कहानी नहीं लिखी, उसका अंत क्या हुआ ये पता नहीं चलता'' कुसुम ने प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा की ओर देखते हुए पूछा।    &lt;br /&gt;''पूरी तो है, मेरे विचार में तो कहानी पूरी है, हां ज्यादा विस्तृत इसलिए नहीं लिखा है, क्योंकि मूल कथा तो हीरामन और उसकी तीन क़समों की है, महुआ घटवारिन की कहानी तो लोक कथा के रूप में उसमें प्रवेश करती है।'' प्रोफेसर आनंद ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा।    &lt;br /&gt;''नहीं सर मेरे विचार में महुआ घटवारिन की कहानी में और भी कुछ हुआ होगा, इतनी छोटी सी कहानी भला लोक गाथा कैसे बन सकती है।'' कुसुम ने दृढ़ता पूर्वक कहा। कुसुम प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा के मार्गदर्शन में फणीश्वर नाथ रेणु पर शोध कार्य कर रही है। उसने हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तार उपाधिा प्राप्त की है, तथा संयोगवश प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा ने ही कालेज में भी उसे हिन्दी साहित्य पढ़ाया है, इसलिए वह काफी खुलकर अपने प्रश्न कर लेती है, उनके सामने विचार रख लेती है। शोध विद्यार्थी तथा गाइड के बीच जो औपचारिकताओं का कुहासा रहता है, वह उनके बीच नहीं है।    &lt;br /&gt;प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा उम्र के पचपन वर्ष पूरे कर चुके हैं, वे न केवल हिन्दी विषय के प्रोफेसर हैं, बल्कि हिन्दी साहित्य में भी उनका नाम काफी श्रध्दा के साथ लिया जाता है, एक अच्छे कवि के रूप में भी और एक अच्छे कहानीकार के रूप में भी। पूरा व्यक्तित्व अत्यंत गरिमामय एवं प्रभावशाली है, खादी का कुर्ता पायजामा, जैकेट, चेहरे पर किंचित मोटे ऐनक का चश्मा, घनी रोबदार मूंछें, और करीने से जमे आधो सफेद आधे काले बाल, और इन सबके साथ बोलने का एक अत्यंत प्रभावशाली अंदाज़ जिसके चलते उनसे मिलने वाला उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। एक हिन्दी साहित्य के प्रोफेसर की, एक हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार की जैसी छवि होनी चाहिए, उसका हुबहू प्रतिमान हैं, प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा।    &lt;br /&gt;''तुम्हें रेणु पर पी.एच.डी करनी है, या महुआ घटवारिन पर? महुआ घटवारिन की कथा ''मारे गए गुलफाम'' की एक अंतर्कथा है, और अंतर्कथाएं ऐसी ही होती हैं, ये भी हो सकता है, महुआ घटवारिन की कोई लोक कथा हो ही नहीं।'' प्रोफेसर आनंद ने कुछ झिड़की लगाने वाले अंदाज में कहा।    &lt;br /&gt;''नहीं सर, ये तो हो नहीं सकता, महुआ घटवारिन की तो पूरी की पूरी कथा होगी, बल्कि मैं तो जहां पर रेणु जी ने उसकी कहानी को अधूरा सा छोड़ा है, उसके बाद की पूरी कथा को कल्पित कर सकती हूं'' हाथ में पकड़ी पुस्तक बंद करते हुए कुछ और दृढ़ स्वर में कहा कुसुम ने।    &lt;br /&gt;''अच्छा...?'' उत्सुकता पूर्वक तथा प्रश्नात्मक लहजे में कुसुम की ओर गहरी दृष्टि से देखते हुए कहा प्रोफेसर आनंद ने ''तो बताओ फिर क्या हुआ होगा, तुम्हारे हिसाब से महुआ घटवारिन के साथ, उसके बाद...?''    &lt;br /&gt;''देखिए सर, महुआ घटवारिन की कथा जिस प्रकार चली है उसको पढ़ने के बाद तथा यह जानने के बाद कि आज भी महुआ घटवारिन के गीत गाए जाते हैं, मैं कम से कम यह तो कह ही सकती हूं, कि महुआ घटवारिन की कथा का अंत कोई सुखद नहीं हुआ होगा'' कुसुम ने कुछ उदासी भरे स्वर में अपनी बात समाप्त की।    &lt;br /&gt;''तो तुम्हारे विचार में किस प्रकार अंत हुआ होगा उस कहानी का?'' प्रोफेसर आनंद ने धीरे मुस्कुराते हुए प्रश्न किया।    &lt;br /&gt;कुसुम कुछ देर मौन रही, शून्य में ताकती रही फिर बोली ''सर महुआ घटवारिन की जो कथा है उसमें महुआ जो नदी किनारे की घटवारिन है, वह अपनी सौतेली मां के द्वारा दी जा रही यातनाऐं भोगती भोगती जवान होती है, और जब वह जवान होती है, तो सौतेली मां उसे किसी सौदागर के हाथों बेच देती है। सौदागर उसे जिस नाव में बैठाकर ले जा रही है, महुआ उससे कूदकर नदी में तैरती हुई सौदागर के चंगुल से भागने का प्रयास करती है, जिसमें उसे कोई मुश्किल भी नहीं होती है, क्योंकि वह एक घटवारिन है, तथा घाट के पत्थरों और नदी की लहरों पर ही रह कर बड़ी हुई है, महुआ के पीछे ही सौदागर का वह सेवक भी कूद पड़ता है जो इस बीच&amp;#160; महुआ से प्रेम करने लग गया है, दोनों तैरते जा रहे हैं और हीरामन वहीं&amp;#160; कहानी को समाप्त कर देता है'' लंबी बात कह कर सांस लेने के लिए रुकी कुसुम।    &lt;br /&gt;प्रोफेसर आनंद की मुस्कुराहट कुछ गहरी हो गई, बोले ''हूं ठीक है इसके बाद क्या हुआ।''    &lt;br /&gt;''उसके बाद'' कुसुम ने बात फिर शुरू की ''उसके बाद यह हुआ होगा कि महुआ तो चूंकि घटवारिन है, अत: वह तो नदी में धार के विपरीत भी तैरती रही लेकिन वह सौदागर का नौकर लड़का डूबने लगा, उसे डूबता देख महुआ उसे भी बचाकर किनारे पर ले आई जहां वे दोनों महुआ की&amp;#160; सौतेली मां और सौदागर से छिप कर साथ रहने लगे।'' कुसुम कुछ देर के लिए रुकी।    &lt;br /&gt;''और फिर वे दोनों सुखमय जीवन व्यतीत करते रहे'' हंसते हुए कहा प्रोफेसर आनंद ने ''लेकिन ये तो फिल्मी सुखांत है, तुम तो दुखांत कह रहीं थीं।''    &lt;br /&gt;''कहानी यहां समाप्त नहीं होती है सर'' कुसुम ने विरोध के स्वर में कहा ''बल्कि कहानी तो यहां शुरू होती है। दोनों साथ-साथ जीवन व्यतीत करते हैं कि एक दिन वह लड़का महुआ को काफी पैसा कमा कर लाने का वादा करके किसी नौटंकी कंपनी के साथ चला जाता है, और फिर कभी नहीं लौटता महुआ उसकी प्रतीक्षा में परमार नदी के घाटों पर बावरी होकर दिन-दिन भर बैठी रहती है। पागलों की तरह दौड़-दौड़ कर हर आने वाले से उस लड़के के बारे में पूछती है, लेकिन कोई कुछ नहीं बताता ऐसे ही घाटों पर प्रतीक्षा में दौड़-दौड़ कर घाटों की पुत्राी महुआ घटवारिन एक दिन उन्हीं घाटों पर गिर जाती है। थककर, टूटकर और मरकर। हवा में गूंजते रह जाते हैं केवल उसके गीत जो आज भी रात को लोगों को घाट पर सुनाई दे जाते हैं। रात बे रात...!'' कुसुम की आवाज में पीड़ा के कारण कंपन आ गई, उसने देखा कि प्रोफेसर आनंद कांत के चेहरे के भाव कुछ बिगड़ गये हैं, तथा उनके माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई हैं। कुसुम को अपनी ओर ग़ौर से देखता पाकर प्रोफेसर आनंद बोले ''ऐसा तुम कैसे कह सकती हो? यह भी तो हो सकता है, कि वह लड़का लौट आया हो, या यह भी हो सकता है कि नौटंकी कंपनी के साथ वह लड़का अकेला न गया हो, वो दोनों ही गए हों'', कुछ अटकते-अटकते कहा प्रोफेसर आनंद ने।    &lt;br /&gt;''नहीं सर'' प्रोफेसर आनंद की बात का विरोध करते हुए कुसुम ने कहा ''ऐसा नहीं हो सकता, महुआ तो घाटों की पुत्राी है, अत: वो तो घाट छोड़ कर जा ही नहीं सकती और जहां तक उस लड़के का प्रश्न है, वह इसलिए नहीं लौटेगा क्योंकि वह पुरुष है, छल देना तो पुरुषों के स्वभाव में ही होता है। इस छल को वह एक सुंदर नाम देता है, 'प्रेम' लेकिन वस्तुत: तो वह स्त्राी को छलता ही है और यह भी सत्य है, कि एक बार पुरुष को उड़ने के लिए विस्तृत आकाश मिल जाए तो वह फिर भूल जाता है, कि कहीं कोई है, जो उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है,'' कुसुम ने अपनी बात ख़त्म करके देखा कि प्रोफेसर आनंद के चेहरे के भाव काफी बिगड़ गये हैं, वे रुमाल निकाल कर माथे पर छलक आया पसीना पोंछने लगे।    &lt;br /&gt;''क्या बात है, सर आपकी तबीयत तो ठीक है'' कुसुम ने चिंतित स्वर में पूछा।    &lt;br /&gt;''हां कुछ असहज लग रहा है, अब मैं आराम करूंगा'' प्रोफेसर आनंद ने कहा।    &lt;br /&gt;''ठीक है सर अब मैं चलती हूं, आप आराम कीजिए'' कुसुम ने अपनी किताबें और कागज़ात समेटते हुए कहा। किताबें वगैरह समेटने के बाद कुसुम चली गई। प्रोफेसर आनंद अकेले रह गये। रीडिंग टेबल से उठ कर वे खिड़की के पास रखी आराम कुर्सी पर आकर बैठ गए, उनके कानों में कुसुम द्वारा कहे गऐ शब्द गूंज रहे थे ''वह फिर भूल जाता है कि कहीं कोई है, जो उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।'' सुधियों के दृश्य पटल पर उभरने लगा नर्मदा नदी के किनारे बसा वह छोटा सा क़स्बा जिसे लगभग पैंतीस वर्ष पूर्व वे इस तरह छोड़कर आ गये कि फिर लौट कर देखा भी नहीं कि वह क़स्बा किस हालत में है।    &lt;br /&gt;प्रोफेसर आनंद के सामने पूरा जीवन वृत्ता स्मृति कोष से निकल कर आ गया, वह जीवन वृत्ता जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सोचा, नर्मदा के किनारे बसे उस छोटे से क़स्बे शाहगंज के विद्यालय में उनके पिता हिन्दी&amp;#160; के अध्यापक थे, उसी छोटे क़स्बे से इस महानगर इन्दौर तक की यात्रा&amp;#160; वास्तव में एक ठहरे हुए झील के पानी की गाथा है। इस गाथा का सबसे विचारणीय पहलू यह है, कि यह उस जीवन के झील हो जाने की कथा है, जो पला बढ़ा उस चिर कुंवारी नर्मदा नदी के किनारे जिसे कोई नहीं बांध&amp;#160; पाया, जिसके पानी ने कभी थमना नहीं सीखा, वह वेगवती नदी जिसने कहा कि जो मुझे एक रात में बांधा देगा तो मैं उसी की हो जाऊंगी अन्यथा चिरकुवांरी ही रहूंगी। ऐसी सलिला के पट पर पला बढ़ा जीवन स्वयं तीस वर्षों से झील के पानी की तरह ठहर कर एक ही स्थान पर खड़ा है, विश्वास करना जरा मुश्किल है।    &lt;br /&gt;''वह फिर भूल जाता है, कि कहीं कोई है, जो उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है'' एक ही वाक्य रह रह कर सदियों से सूने और वीरान घर के दरवाज़े पर दस्तक की तरह गूंज रहा है। प्रोफेसर आनंद ने आराम कुर्सी की पुश्त से सर टिकाया और अपना पूरा शरीर ढीला छोड़ दिया, मानो युगों की थकान के बारे में अभी-अभी पता चला है, कि ''अरे कब से थका हुआ हूं मैं।''    &lt;br /&gt;शाहगंज के जिस विद्यालय में उनके पिता राम स्वरूप शर्मा हिन्दी पढ़ाते थे, उसी विद्यालय में संस्कृत पढ़ाते थे पंडित पृथ्वी बल्लभ दुबे, दोनों परिवारों में आपसी प्रगाढ़ता के काफी सारे सुखद कारण थे, दोनों का मालवा क्षेत्रा से संबंध, दोनों ब्राह्मण कुल और उस पर दोनों अध्यापन में, और अध्यापन में भी दोनों ही भाषा के शिक्षक एक संस्कृत का तो दूसरा हिन्दी का।    &lt;br /&gt;पंडित पृथ्वी बल्लभ दुबे की ही बेटी थी शारदा, आनंद की सहपाठिनी, मित्रा और हम दर्द। हमदर्द इसलिए कि पढ़ाई लिखाई में लगभग औसत दर्जे का होने के कारण आनंद की हमेशा शामत रहती थी, इधर राम स्वरूप शर्मा थे, तो उधर पंडित पृथ्वी बल्लभ दुबे, लेकिन आनंद के मन को, उसमें भरी हुई यायावरता को अगर कोई समझता था, तो वो थी शारदा। दोनों शिक्षकों के मन में आनंद के प्रति जो भावना थी उसको बदलने का कार्य शारदा का ही था, जिसे वो बखूबी करती रहती थी।    &lt;br /&gt;समय गुज़रता रहा, नर्मदा में पानी बहता रहा, आनंद के मन की नाव हवा के झौंके के साथ असीम की ओर निकल जाने को मचलती रही और शारदा उसे खींच कर वापस तट से बांधती रही। अगर रिश्ते की व्याख्या करना हो तो शायद अच्छे-अच्छे मीमांसकों को भी पसीना आ जाए कि शारदा और आनंद के बीच के इस रिश्ते को किस प्रकार परिभाषित किया जाए। एक तरफ आनंद था, घर, परिवार, शारदा यहां तक कि स्वयं से भी अजनबी, और दूसरी तरफ शारदा थी, जिसके लिए आनंद को सही दिशा में बढ़ जाने की प्रेरणा देना ही सब कुछ था। एक तरफ आनंद था शारदा के हर प्रयास को जानकर भी बेख़बर था, और दूसरी तरफ शारदा थी उस बेख़बरी को नगण्य मानते हुए अपने प्रयास में जुटी रही। दोनों ने स्वयं ही कभी अपने बीच के रिश्ते को कोई भी नाम देने का प्रयास नहीं किया। शायद इसलिए वो रिश्ता नर्मदा के जल की तरह प्रवाहमान था दोनों के बीच।    &lt;br /&gt;आनंद को आज तक याद है शारदा का वो उत्तार जो उसने आनंद को उसके प्रश्न के जबाव में दिया था। शाम का समय था, नर्मदा के किनारे दोनों बैठे थे, आनंद ने कहा ''शारदा अगर मैं स्वयं को नर्मदा में समर्पित कर दूं, तो ये मुझे डुबाएगी या पार लगा देगी?'' डूबते सूरज की लालिमा में आनंद ने देखा कि शारदा के चेहरे पर दृढ़ता आ गई है। बोली ''यकीनन डुबो देगी क्योंकि नर्मदा ने कभी भी कायरता को स्वीकार नहीं किया उसका तो कहना है, कि अगर कायरता को स्वीकार कर लिया होता, तो आज मैं चिर कुंवारी नहीं होती, समर्पण चाहे जिस भी रूप में हो लेकिन समर्पण हमेशा कायरता ही कहलाता है। ईश्वर ने हमें जूझने के लिए भेजा है पलायन के लिए नहीं, ज़िम्मेदारियों से मुंह फेर कर किया गया त्याग, वैराग्य नहीं पलायन कहलाता है'' अपनी बात ख़त्म करते-करते शारदा के चेहरे पर एक विचित्रा सी आभा आ गई थी। उस दिन के पश्चात फिर आनंद ने इस तरह की कोई बात पूछने का साहस नहीं किया था शारदा से, शारदा का बिल्कुल अलग ही रूप था वह।    &lt;br /&gt;यूं तो पंडित रामस्वरूप शर्मा काफी समय से अपने गृह नगर महू स्थानान्तरण चाह रहे थे लेकिन आनंद के वीतरागपन के चलते और नर्मदा तट की इस उक्ति के चलते कि चिर कुंवारी नर्मदा का सानिध्य मानव मन में वैराग्य भाव को पुष्ट करता है, वे अब स्थानान्तरण के लिए पूरी शक्ति से प्रयासरत हो गए थे। मैट्रिक की परीक्षा में आनंद के परिणाम ने उनके माथे की लकीरें गहरी कर दी थीं। पुश्तैनी घर और जमीन भी महू में रख-रखाव के अभाव में ख़राब हो रही थीं। इन्हीं सब कारणों के चलते अंतत: एक दिन पंडित रामस्वरूप शर्मा ने अपने महू स्थानातंरण का आदेश लाकर पत्नी के हाथ पर रख दिया था। एक तरह इतने वर्षों के साथ के बिछोह का दुख था, तो दूसरी ओर अपने घर लौटने का सुख, जहां सेवा निवृत्ता के बाद वैसे भी लौटना ही था।    &lt;br /&gt;विदाई के एक दिन पूर्व अंतिम बार आनंद और शारदा नर्मदा के तट पर बैठे थे वही संध्या का समय था, सूर्य अपनी प्रखरता को त्याग सौम्यता के साथ कल्पित क्षितिज के उस तरफ प्रस्थान कर रहा था, चारों तरफ मौन था, नि:स्तब्धता थी, कोई स्वर था तो नर्मदा की लहरों का स्वर था। दोनों के बीच कोई संवाद नहीं हुआ जब रात गहराने लगी तो शारदा ने मौन तोड़ते हुए कहा ''अब घर चलें?''। आनंद कुछ देर मौन रहा फिर बोला ''मैं तुमसे मिलने आता रहूंगा।'' शारदा ने आनंद की बात सुनी और बोली ''आनंद तुमने आम्रपाली की कथा पढ़ी है? उसमें अब आम्रपाली को वैशाली द्वारा जबरदस्ती नगरवधु बना दिया जाता है, तब एक दिन उसका पूर्व प्रेमी हर्ष सारे बंधन तोड़ते हुए आम्रपाली तक पहुंच जाता है, और उसे अपने साथ&amp;#160; भाग चलने को कहता है, तब आम्रपाली उसे कहती है, कि ऐसे नहीं, सारे वैशाली में आग लगा कर आना मेरे पास, तब मैं चलूंगी तुम्हारे साथ, अभी नहीं।''    &lt;br /&gt;आनंद ने कहा ''तो...? इस कथा को सुनाने का अभी क्या प्रयोजन है?''    &lt;br /&gt;''है'' शारदा ने कहा था ''प्रयोजन यह है, कि तुम्हारे परिवार की यहां से विदाई के कई सारे कारणों में, मैं स्वयं को भी एक महसूस करती हूं। यह अपराध बोध है मेरे अंदर, जो तुम्हारे बार-बार आने से और गहरा होगा, इसीलिए मैं भी वही कहती हूं, कि इस तरह मत आना मेरे पास, कुछ बन जाओ तब आना मेरे पास, मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा कर लूंगी, पर इस आधो-अधूरे पलायनवादी अस्तित्व के साथ तुम्हारा बार-बार आना स्वीकार नहीं कर पाऊंगी।''    &lt;br /&gt;दोनों के बीच यह अंतिम वार्तालाप था, दूसरे दिन शर्मा परिवार बिछोह और विरह के पानी से भीगी कई सारी आंखों से विदा लेता हुआ शाहगंज से महू की ओर प्रस्थान कर गया, अपनी कई सारी स्मृतियां वहां छोड़कर और वहां की कई सारी स्मृतियां अपने साथ लेकर।    &lt;br /&gt;कालेज की पढ़ाई के लिए महू से इन्दौर आना जाना भी किया जा सकता था, लेकिन आनंद ने इन्दौर में ही होस्टल में रहकर आगे की पढ़ाई करने का निर्णय लिया था। समय फिर अपने कार्य में लग गया, और स्मृतियां पर विस्मृतियों की परत बिछाता गया गुज़रता गया, गुज़रता गया, गुज़रता गया।    &lt;br /&gt;स्नातक होने के पश्चात् जब हिन्दी में स्नातकोत्तार उपाधि लेने के लिए आनंद ने एम.ए. में प्रवेश लिया, तब वह प्रोफेसर विश्वेश्वर दीक्षित के संपर्क में आया था। वास्तव में प्रोफेसर विश्वेश्वर दीक्षित के रूप में आनंद को शारदा के पश्चात जीवन में दूसरा गुरू मिला था। शारदा के छोड़े हुए अधूरे कार्य को प्रोफेसर दीक्षित ने ही पूरा किया। आनंद को तराशने, मन के वीतरागीपन को साहित्य की समृध्दता की ओर मोड़ने, और आनंद को प्रोफेसर आनंद कांत शर्मा बनाने में प्रोफेसर दीक्षित के गुरु गंभीर व्यक्तित्व की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण रही। शारदा ने जिस पत्थर को आधा गढ़ा था उसे पूरा गढ़ कर प्रतिमा बना दी प्रोफेसर दीक्षित ने।    &lt;br /&gt;स्नातकोत्तार उपाधि लेने के पश्चात जब आनंद प्रोफेसर दीक्षित के मार्गदर्शन में पीएचडी कर रहा था तभी एक दिन श्री और श्रीमती दीक्षित महू पहुंच गए थे, अपनी पुत्राी सरिता के लिए आनंद का हाथ मांगने। आनंद के लिए यह बात स्तब्ध कर देने वाली थी किन्तु फिर भी वह अस्वीकार करने वाली स्थिति में नहीं था। जब परिवार के लोगों ने आनंद की राय जाननी चाही तो अपनी स्वीकृति प्रदान करते हुए केवल उसने एक ही इच्छा रखी थी, कि शादी अत्यन्त सादगी पूर्वक होगी इसमें केवल दोनों परिवारों के लोग ही सम्मिलित रहेंगे। परिवार वालों के लिए आनंद की स्वीकृति ही बड़ी बात थी इसलिए शर्त के स्वीकृत होने में कोई बाधा नहीं आई। केवल दोनों परिवार की उपस्थिति में विवाह करके आनंद ने शारदा का सामना करने से अपने आप को बचा लिया था।    &lt;br /&gt;पीएचडी पूरी होने के बाद प्रोफेसर दीक्षित ने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए आनंद को भी प्राध्यापक के पद पर नियुक्त करवा दिया, और उसके बाद घर, परिवार, बच्चे, व्याख्यान, साहित्य सेवा सारा घटना क्रम चलता रहा। समय चक्र में फंसकर दिन, माह, वर्ष, अतीत का हिस्सा बनते रहे और आनंद को भी पता नहीं चला कि कब कल का वीतरागी आनंद, प्रोफेसर कांत शर्मा हो गया, एक सम्मानित प्रोफेसर और हिन्दी साहित्य का एक सशक्त हस्ताक्षर। पैंतीस वर्ष बीत गए, इस बीच आनंद ने साहित्यकार के रूप में देश के कोने-कोने की यात्राा की, नहीं जा पाए तो केवल नर्मदा तट पर बसे उस छोटे से कस्बे शाहगंज, जिसे पैंतीस वर्ष पूर्व छोड़ आए थे। अब तो दोनों बेटे भी सेटल हो गए हैं, और एक बार फिर सरिता और आनंद बड़े से घर में अकेले हैं, जैसे तब थे जब गृहस्थ जीवन की शुरूआत की थी दोनों ने, प्रोफेसर आनंद की निगाहें खिड़की के पार किसी अदृश्य बिन्दु पर स्थिर थीं, शायद स्वयं को भुलावे में रखने के लिए। और मन में गूंज रही थीं दो बातें, पहली पैंतीस वर्ष पूर्व कही गई शारदा की बात ''कुछ बन जाओ तब आना मेरे पास, मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा कर लूंगी, और दूसरी आज कही गई कुसुम की बात ''वह फिर भूल जाता है कि कहीं कोई है जो उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।'' दोनों बातों के कहे जाने के बीच में पैंतीस वर्ष का कालांतर है, किन्तु लग रहा है जैसे दोनों बातें अभी की हैं आज ही की हैं।    &lt;br /&gt;''क्या बात है टहलने नहीं जाना है क्या...? शाम हो गई है'' सरिता ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा। ''हां...'' प्रोफेसर आनंद पैंतीस वर्ष पूर्व के ठिठके हुए अतीत से वर्तमान में लौट आए ''शाम हो गई क्या? पता ही नहीं चला'' सरिता ने पास रखे हुए स्टूल पर प्रोफेसर आनंद की चाय का कप रख दिया और स्वयं भी पास की कुर्सी पर बैठ गई।    &lt;br /&gt;''कुछ परेशान लग रह हो'' सरिता ने पूछा।    &lt;br /&gt;''नहीं तो... बस यूं ही सोच रहा था कि जब से शाहगंज छोड़ा तब से एक बार भी नहीं गया अपनी जन्मभूमि और नर्मदा की याद नहीं आई कभी।'' आनंद ने सरिता से नज़रे चुराते हुए कहा।    &lt;br /&gt;''वो इसलिए क्योंकि यहां इन्दौर में भी तो तुम नल चला कर नर्मदा के पानी से ही तो नहाते हो'' सरिता ने हंसते हुए कहा। आनंद ने कोई जवाब नहीं दिया, अपनी चाय का कप उठा कर पीने लगा।    &lt;br /&gt;कुछ देर बाद सरिता ने कहा ''जाना चाहो तो हो आओ, पुराने दोस्तों से मुलाकात भी हो जाएगी, और तुम्हारा अपराध बोध भी कम हो जाएगा।''    &lt;br /&gt;''दोस्त तो अब क्या मिलेंगे? हां जन्मभूमि को फिर से देखना हो जाएगा'' कह कर एक क्षण को आनंद ने रुककर सरिता की तरफ देखा और पूछा ''तुम चलोगी क्या?''।    &lt;br /&gt;''ना बाबा ना मैं क्यों जाऊंगी, तुम अकेले ही आओ मुझे साथ ले जाओगे तो खुलकर घूम फिर नहीं पाओगे, सबसे मिल नहीं पाओगे'' सरिता ने कुछ मीठे स्वर में कहा।    &lt;br /&gt;''हूं... देखते हैं क्या होता है'' कह कर आनंद ने चुप्पी साध ली।    &lt;br /&gt;एक सप्ताह बाद जब प्रोफेसर आनंद शाहगंज पहुंचे तो ऐसा लगा जैसे समय ठहर गया हो, जहां वे पैंतीस वर्ष पहले छोड़ गए थे। हां प्रगति नाम की प्रक्रिया ने अपना पूरा प्रभाव इन पैंतीस वर्षों में दिखाया था, किन्तु इस प्रगति के पीछे कहीं कहीं कुछ ऐसा झांक रहा था, निहार रहा था प्रोफेसर आनंद को पूरे अपनेपन के साथ मानो छूना चाह रहा हो कि, अरे..! इतने बड़े हो गए तुम...? कल जब यहां से गए थे तब तो....। आनंद ने लंबी सांस खींची वही सौंधापन वही सुगंध, इतने सारे बदलाव के बाद भी मानो कुछ भी नहीं बदला हो।    &lt;br /&gt;सबसे पहले नर्मदा के तट पर पहुंचे प्रोफेसर आनंद, नर्मदा को प्रणाम किया जल को आंखों से लगाया। कुछ घाट नए बन गए हैं, परंतु पुराने घाट अभी भी जस के तस हैं। अपने उसी पुराने घाट के पत्थर पर बैठ गए प्रोफेसर आनंद। वहीं बैठे-बैठे पूर्ववत नर्मदा की लहरों को निहारने लगे, ऐसा लग ही नहीं रहा था कि कई वर्ष बीच में गुज़र गए हैं, ऐसा लग रहा है मानो कल ही की बात है, जब वे शारदा के साथ यहां बैठे थे। शारदा...! शारदा की स्मृति आते ही प्रोफेसर आनंद उठ कर खड़े हो गए और बस्ती की ओर चल दिये।    &lt;br /&gt;चारों तरफ चेहरे ही चेहरे थे, कुछ चेहरे सर्वथा अपरिचित तो कुछ कहीं कहीं से परिचित होने का भाव लिये, लेकिन चूंकि दोनों तरफ समय ने अपनी छाप छोड़ रखी थी इसलिए पहचान के चिन्ह ढूंढना मुश्किल हो रहा था। कोई कोई चेहरा आनंद को देखकर ठिठकता, कुछ संशय में पड़ता फिर चल देता। जानी पहचानी गलियों से होते हुए प्रोफेसर आनंद पंडित पृथ्वी बल्लभ दुबे के घर पहुंचे, देखा कि वे बाहर ही आंगन में बैठे हुए कोई पुस्तक पढ़ रहे हैं।    &lt;br /&gt;काफी वृध्द हो चुके पंडित पृथ्वी बल्लभ दुबे के चहरे पर अभी भी वही तेज था। आनंद ने बढ़कर उनके चरण छू लिये। दुबे जी ने हाथों की पुस्तक बंद कर कुछ अपरिचित नज़रों से आनंद की ओर देखा और कुछ पूछना चाहा किन्तु उनके कुछ कहने के पूर्व ही आनंद ने कहा ''मैं आनंद हूं गुरूजी, राम स्वरूप जी का बेटा।''    &lt;br /&gt;आनंद के इतना कहते ही दुबे जी की ठोड़ी में कंपन सा हुआ, फिर आंखों में चमक सी आ गई उठकर उन्होंने आनंद को सीने से लगा लिया और भाव विह्वल होकर बोले ''अरे...! तू है बेटा।''    &lt;br /&gt;दो दिन तक दुबे जी के यहां मेहमान रहे आनंद, दिन भर घूमना फिरना, और रात को अतीत की चर्चा करना कि कौन कब क्या था? अब कहां है? और क्या हो गया? उस दौर के एक एक व्यक्ति से मिलाने ले गए आनंद को दुबे जी, एक ही वाक्य कह कर मिलाते ''अपने रामस्वरूप का बेटा है, हिंदी का बड़ा प्रोफेसर और साहित्यकार हो गया है'' प्रोफेसर आनंद ने देखा कि वाक्य का पहला हिस्सा बोलते समय दुबे जी का स्वर अपनेपन से भीगा होता था, किन्तु दूसरा हिस्सा बोलते समय उस स्वर में गर्व छलक आता था।    &lt;br /&gt;दुबे जी के बेटे बहुओं ने खूब सेवा की प्रोफेसर आनंद की। रात को भोजन वगैरह करके जब दोनों बातें करने बैठते तो समय का पता ही नहीं चलता, बातों में कुछ भी नहीं केवल अतीत की बातें, अतीत से किसी भी पात्रा को चुनना और उसको लेकर अपने प्रश्नों का समाधान करना। इसी दौरान पता चला कि शारदा की शादी भोपाल में हुई है, शारदा शादी के पहले ही शिक्षक हो गई थी, आजकल भोपाल के किसी विद्यालय में प्राचार्य है। पति भोपाल में ही चिकित्सक हैं। अपनी घर गृहस्थी में पूर्णत: ख़ुश है। शारदा के बारे में सुनकर अच्छा लगा आनंद को, ऐसा लगा कि कोई अपराध बोध उतर गया है मन से। शारदा के घर का पता और स्कूल का पता ले लिया आनंद ने, जाना तो भोपाल होकर ही है, और फिर आने का प्रमुख प्रयोजन तो शारदा से मिलना ही था।    &lt;br /&gt;दो दिन बाद प्रोफेसर आनंद रवाना हुए तो दुबे जी का पूरा परिवार बस तक छोड़ने आया था, साथ में वे कई लोग भी आए थे जो आनंद के पुराने परिचित थे सभी की आंखों में नमी थी जैसे कई वर्ष पूर्व विदाई के समय थी।    &lt;br /&gt;भोपाल पहुंचते पहुंचते ही दोपहर हो गई, आटो रिक्शा लेकर सीधे शारदा के स्कूल की ओर रवाना हो गए प्रोफेसर आनंद। तीन दिन हो गए इंदौर से निकले, जाने क्यों घर की याद आ रही है। जबकि ऐसा कभी नहीं हुआ। पहले भी साहित्यिक आयोजनों के सिलसिले में अक्सर घर से जाना हुआ था, लेकिन इस बार जाने क्यों सरिता को इतने दिनों के लिए छोड़ना कुछ अच्छा नहीं लग रहा, मन कर रहा है अब जल्दी वापस लौटा जाए। स्कूल पहुंचकर शारदा के बारे में पूछा तो ज्ञात हुआ मैडम अपने ऑफिस कक्ष में बैठी हैं। आनंद जैसे ही प्रिंसिपल कक्ष के बाहर पहुंचे कि परदा हटा कर शारदा बाहर निकली, निकलते ही आनंद को देखा कुछ चौंकी फिर हंसते हुए बोली ''अरे....! आनंद तुम....! आज कैसे याद आ गई?''    &lt;br /&gt;प्रोफेसर आनंद बोले ''तुमने मुझे पहचान लिया....!''    &lt;br /&gt;''आए दिन तो तुम्हारी कहानियों के साथ तुम्हारा फोटो छपता है पत्रिकाओं में, पहचानती कैसे नहीं'' उसी तरह हंसते हुए कहा शारदा ने ''चलो अंदर चलकर बैठते हैं।'' कहते हुए शारदा ने अपने कक्ष का परदा हटा कर आनंद को अंदर चलने का इशारा किया।    &lt;br /&gt;''हां अब बताओ क्या पियोगे चाय या काफी'' कुर्सी पर बैठते हुए शारदा ने पूछा।    &lt;br /&gt;''कुछ भी मंगवा लो, तुम्हें तो पता है कि खाने-पीने के मामले में मेरी कोई विशेष पसंद नहीं रही'' आनंद ने कहा, शारदा ने घंटी बजाकर चपरासी को बुलाया और दो चाय लाने को कहा।    &lt;br /&gt;''कहां से चले आ रहे हो...?'' शारदा ने पूछा।    &lt;br /&gt;''शाहगंज से।'' आनंद ने संक्षिप्त सा उत्तार दिया।    &lt;br /&gt;''शाहगंज से...!'' शारदा ने कुछ चौंकते हुए कहा ''वहां किस प्रयोजन से गए थे...?''    &lt;br /&gt;आनंद ने मुस्कुराते हुए कहा ''तुम से मिलने, तुमने कहा था ना कि कुछ बन जाओ तब आना मुझसे मिलने, लेकिन मैंने आते आते कुछ देर कर दी।''    &lt;br /&gt;इसी बीच चपरासी टेबल पर चाय का कप रख गया। चपरासी के जाने के बाद शारदा ने चाय का कप उठाते हुए कहा, ''नहीं आनंद तुमने देर कहां की, मैंने तुमसे कहा था कि कुछ बन जाओ तब आना मुझसे मिलने तब तक प्रतीक्षा करूंगी।''    &lt;br /&gt;''हां वही तो तभी तो कह रहा हूं कि मैं लेट हो गया'' आनंद ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा।    &lt;br /&gt;''नहीं आनंद कॉलेज में प्रोफेसर हो जाने से मेरा आशय तब नहीं था, वह तो हज़ारों लोग बन जाते हैं। मैं तो चाहती थी जो तुम आज हो, आज साहित्य में तुम जिस स्थान पर हो वह स्थान वही है जिसके बारे में मैंने कहा था, इसलिए तो मैं कह रहीं हूं कि तुम सही समय पर आये हो कुछ बन जाने के बाद'' शारदा ने कहा।    &lt;br /&gt;कुछ देर की चुप्पी के बाद आनंद ने कहा ''मुझे कुछ दिनों से यह अपराधा बोधा था कि मुझे तुम्हारे पास बरसों पूर्व आना चाहिए था तुम मेरी प्रतीक्षा में हो।''    &lt;br /&gt;''प्रतीक्षा तो मैंने की है लेकिन तुम्हारा अपराध बोध बरसों पुराना न होकर केवल एक ही वर्ष का होना चाहिए'' शारदा ने कहा।    &lt;br /&gt;''कैसे....?' आनंद ने कहा।    &lt;br /&gt;''वो ऐसे कि पिछले साल तुम्हें शिखर सम्मान मिला है, बस तभी से मुझे उम्मीद थी कि अब तुम्हें आना चाहिए क्योंकि अब तुम वो बन गए हो जो मैं चाहती थी'' शारदा ने कहा।    &lt;br /&gt;''तुम्हारी बातों ने मेरा बोझ हल्का कर दिया।'' आनंद ने चाय का कप रखते हुए कहा।    &lt;br /&gt;देर तक दोनों घर परिवार की बातें करते रहे। बातें करते करते आनंद ने घड़ी देखी चार बज गए थे ''अच्छा शारदा चलता हूं'' आनंद ने कहा।    &lt;br /&gt;''अरे ये क्या बात हुई? घर नहीं चलोगे क्या?'' शारदा ने उठते हुए कहा।    &lt;br /&gt;''नहीं शारदा आज नहीं, दस दिन बाद एक कार्यक्रम में भोपाल आना है। तब आऊंगा सरिता को भी साथ लेकर आऊंगा, तुम्हारे घर ही ठहरूंगा, अभी तीन दिन हो गए इंदौर छोड़े, सरिता वहां अकेली है'' आनंद ने कहा ''अच्छा लगा यह जानकर कि तुम्हें अपनों की परवाह है। तुम सचमुच वही बनकर आए हो जो मैं चाहती थी'' कहते हुए आनंद के कंधे पर धीरे से हाथ रख दिया शारदा ने, प्रोफेसर आनंद ने देखा कि शारदा की आंखों में एक चमक सी आ गई है, अपनी कंधे पर रखे शारदा के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और धीरे से मुस्कुरा दिये। प्रोफेसर आनंद को लगा अब वे कुसुम के साथ बहस कर सकते हैं, महुआ घटवारिन की कहानी के बारे में, क्योंकि अब वह कहानी पूरी जो हो गई है। &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-1831789263846486475</id><published>2010-02-28T13:11:00.001+05:30</published><updated>2010-02-28T13:11:26.828+05:30</updated><title type='text'>संधिकाल ( होली पर विशेष कहानी : पंकज सुबीर )</title><content type='html'>&lt;p&gt;पूर्णिमा का पूरा चांद प्रकृति के साथ अपनी चांदनी के रंगों से होली खेल रहा है । पीली ज़र्द चांदनी पेड़ों पर, पहाड़ों पर, हर तरफ बरस रही है । ये भी अपने ही तरह की एक होली है, चंद्रमा और पृथ्वी की होली । क्या आकर्षण है पृथ्वी में, जो ये चंद्रमा न जाने कितने युगों से इसकी परिक्रमा कर रहा है । रूप बदल बदल कर पृथ्वी को आकर्षित करने का प्रयास करता है । कभी छिप जाता है कभी पूर्ण आकार में सामने आ जाता है । पृथ्वी कितने युगों से परीक्षा ले रही है अपने इस मूक प्रेमी की ।    &lt;br /&gt;''सुषमा क्या देख रही हो इस तरह आसमान में ?'' पडोस की बालकनी से स्वर आया तो सुषमा की तंद्रा टूटी ।     &lt;br /&gt;''कुछ नहीं भाभी, आज चाँद बहुत सुंदर लग रहा है'' सुषमा ने पड़ोस में रहने वाली मंजुला भाभी को उत्तर दिया ।    &lt;br /&gt;''वो तो लगेगा ही आज पूर्णिमा जो है, और वो भी फागुन की पूर्णिमा ।&amp;#160; दो ही तो पूर्णिमाएं होती है जब चांद सुंदर हो जाता है एक शरद की पूर्णिमा दूसरी फागुन की पूर्णिमा'' मंजुला भाभी स्थानीय कालेज में हिंदी साहित्य पढ़ाती हैं, उनकी बातों में भी साहित्य का पुट नार आता है । हिन्दी साहित्य से हमेशा लगाव रहा है सुषमा को, इसीलिए मंजुला भाभी से उसकी खूब पटती है ।     &lt;br /&gt;''और पता है ऐसा क्यों&amp;#160; होता है ? इसलिए, क्योंकि ये संधिकाल होते हैं। शरद ऋतु संधिकाल है वर्षा और ठंड का तो फागुन संधिकाल है गरमी और ठंड का । संधिकाल हमेशा से ही मोहक होता है, चाहे वो ऋतुओं का हो या फिर उम्र का हो ।'' मंजुला भाभी ने अपनी बात को और बढ़ाते हुए कहा ।    &lt;br /&gt;''बच्चे तो पढ़ रहे होंगे '' सुषमा ने उत्तर में कहा ।     &lt;br /&gt;''आज.........! और पढ़ाई ......! कल होली है, आज तो उनकी धींगामस्ती की रात है। छोटे वाले देवर के बच्चे भी आए गए हैं, अभी तो कॉलोनी की होलिका दहन वाली जगह पर गए हैं, कह रहे थे इस बार शहर की उत्सव समिति ने सबसे अच्छी तरह से सजाई हुई होली&amp;#160; को पुरुस्कार देने का कहा है । शाम से ही लगे हैं सजाने में, जाने क्या क्या निकाल कर ले जा रहे हैं घर से चुपचाप-चुपचाप।'' हंसते हुए कहा मंजुला भाभी ने ।     &lt;br /&gt;''अरे.....! पर चार दिन बाद तो बच्चों के पेपर हैं ना....?'' सुषमा ने आश्चर्य से पूछा ।&amp;#160; &lt;br /&gt;''हां है, तो ....? बच्चों ने उसकी भी तैयारी पूरी कर रखी है&amp;#160; । और फिर होली के लिए तो मैंने बस आज शाम से कल शाम तक की छुट्टी दी है । कल रात से फिर पढ़ाई में जुट जाऐंगे ।'' मंजुला भाभी ने उत्तर दिया ।    &lt;br /&gt;''पर भाभी मेन एगाम है, अभी आपको ऐसा नहीं करना था, एक साल होली नहीं भी मनाते तो क्या हो जाता'' सुषमा का आश्चर्य कम नहीं हुआ था ।     &lt;br /&gt;''तुमने वो शेर सुना है सुषमा 'बच्चों के&amp;#160; छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे ।' बात इस साल या उस साल की नहीं है बात उम्र&amp;#160; की है । होलियां तो बहुत आएँगी पर ये उम्र फिर नहीं आएगी । और फिर तुम याद करके तो देखो कि तुम्हारी स्मृति में कौन सी होली आज तक सुरक्षित है । वही ना जो तुमने स्कूल के दिनों में सहेलियों के साथ मनाई थी । वो धींगामस्ती, वो अल्हड़पन आज भी गुदगुदा जाता होगा तुम्हें ।'' मंजुला भाभी ने हंसते हुए कहा।    &lt;br /&gt;''अरे हमारी तो पूछो ही मत भाभी । मुहल्ले में दस बारह लड़कियों की हमारी टोली थी । और होली तो हमारे सर पर ऐसी चढ़ती थी कि मुहल्ले के लड़के भी घबरा कर भागते थे । शाम को जब माँ रंग छुड़ाने बैठतीं तो पूरे समय उनके प्रवचन चलते रहते थे ।''&amp;#160; हंसते हुए कहा सुषमा ने ।&amp;#160; &lt;br /&gt;''वही तो..... बात तो वही है। जब हमारा समय था तब हमने तो खूब आनंद उठा लिया, पर आज जब बच्चों की बारी है तो हम उनको रोक रहे हैं । हम स्वार्थी तो नहीं हो गए हैं ।'' गंभीरता के साथ कहा मंजुला भाभी ने ।     &lt;br /&gt;''पर आज जो काम्पटीशन है .........'' कुछ उलझन भरे अंदाज मे बात को बीच में ही छोड़ दिया सुषमा ने ।     &lt;br /&gt;''हाँ&amp;#160; है ना, वो तो हमेशा रहा है और आगे भी रहेगा । मैं उसे भी खारिज थोड़े ही कर रही हूँ&amp;#160; । आज बच्चे रात बारह बजे के आस पास होली जला कर वापस आ जाएँगे । सुबह जब पढ़ने उठते हैं तभी उठेंगे, पढ़ाई करने के बाद दस बजे से चार बजे तक का समय होली का है । वो भी सूखे और खुशबूदार रंगों से होली । उसकी भी मैंने तैयारी करके रखी है । हल्दी, चंदन का लेप, अच्छी सुंगधित गुलाल सब मंगा कर रखी है । घर के आंगन में खूब मस्ती करो, दोस्तों को भी बुला लो ।'' मंजुला भाभी ने कहा । सुषमा ने कुछ उत्तर नहीं दिया, उसके दिमाग में थोड़ी देर पहले राहुल द्वारा की जा रही मिन्नतें याद आ रही थीं ।     &lt;br /&gt;''प्लीा मम्मी मैंने आज की पढ़ाई तो पूरी कर ही ली है । कल रिवीजन कर लूंगा, जाने दो ना प्लीज । प्रॉमिस&amp;#160; मैं ग्यारह बजे तक ही वापस आ जाऊँगा ।'' गिड़गिड़ाते हुए कहा था राहुल ने ।     &lt;br /&gt;''नहीं बिल्कुल नहीं, पढ़ाई को तमाशा समझ रखा है क्या । एक साल होली पर नहीं जाओगे तो कुछ नहीं हो जाएगा अगले साल चले जाना ।'' झिड़कते हुए तेज स्वर में कहा था सुषमा ने ।     &lt;br /&gt;''अगले साल तो बोर्ड है मम्मी, अगले साल तो मैं खुद ही नहीं जाऊँगा, प्लीज इस बार जाने दो ना'' रूऑंसे से स्वर में कहा था राहुल ने ।     &lt;br /&gt;''नहीं का मतलब नहीं, उसमें जिद करने की क्या बात है । तुम्हारे भले के लिए ही तो कह रही हूँ । तुम पढ़ लोगे तो तुम्हारी ही जिंदगी बन जाएगी हमारी नहीं समझे''&amp;#160; और तो स्वर में डाँटते हुए कहा था सुषमा ने ।     &lt;br /&gt;''सब बच्चे जा रहे हैं मम्मी , लड़कियाँ भी हैं,&amp;#160; रंगोली सजा रही हैं होली के आसपास । मेरे सारे दोस्त भी तो आए हैं ।'' राहुल की आंखों में आंसू आ गए थे ।     &lt;br /&gt;''सब बेवकूफ&amp;#160; हैं तो तुम भी हो जाओ, बाकियों से तुमको क्या लेना । तुमको कैरियर बनाना है तो पढ़ना तो तुमको ही पढेग़ा ना ।'' सुषमा ने निर्णायक रूप&amp;#160; से झिड़का था । राहुल चुपचाप अपने कमरे में चला गया था । उसे पता था कि अब कुछ नहीं होने वाला ।     &lt;br /&gt;''क्या हो गया ? क्या सोचने लगी'' मंजुला भाभी के स्वर ने फिर सुषमा को वर्तमान में खींच लिया ।    &lt;br /&gt;''कुछ नहीं भाभी बस वही सोच रही थी कि त्यौहार पर्व सब धीरे धीरे खत्म होते जा रहे हैं।'' सुषमा ने बात बदलते हुए कहा ।     &lt;br /&gt;''खत्म हो नहीं&amp;#160; रहे है, बल्कि हम ही कर रहे हैं । ये पर्व ये त्यौहार तो वास्तव में जीवन की एकरसता को तोड़ने के लिए आते हैं । जब हमको लगता है कि जीवन एक ढर्रे पर आ गया है तब&amp;#160; ये पर्व आकर हमें परिवर्तन दे जाते हैं , उल्लास दे जाते हैं और आगे पुन: काम करने की ऊर्जा दे जाते हैं । बात उल्लास की हो तो है । हम अपने मोबाइल की, लेपटाप की सबकी बैटरी को समय पर चार्ज करते हैं, पर अपने अंदर की बैटरी का कभी नहीं सोचते कि वो कबसे डिस्चार्ज पड़ी है । ये पर्व, थे पिकनिकें, ये आउटिंग, ये अपने को रीचार्ज करने का ही तो तरीका है । और इन बच्चों को तो यादा जरूरत है रीचार्ज होने की&amp;#160; ।'' समझाइश के अंदाज में कहा मंजुला भाभी ने । सुषमा कुछ नहीं बोली, उसे याद आ रहा था बचपन, जब उस छोटे से कस्बे का वो मोहल्ला होली, दीवाली के आते ही कैसा खिल उठता था ।     &lt;br /&gt;''अरी लड़कियों जरा भी शऊर नहीं है तुममें । लाला जी क्या तुम्हारी उम्र के हैं जो उन पर रंग डाल दिया,&amp;#160; इत्ती बडी बड़ी हो गई हैं पर अकल रत्ती भर नहीं है । पूरा मोहल्ला सर पर उठा रखा है चार दिनों से ।''&amp;#160; छत पर खड़ी माँ तेज तेज स्वर में चिल्लाती थीं जब उन लोगों को किसी पर रंग डालते देखतीं । इधर मां चिल्लातीं और उधर खी खी करती पूरी टोली गायब हो जाती और किसी कोने में दुबक कर शिकार की तलाश करने लगती ।     &lt;br /&gt;शाम को नहा धोकर सजी धजी प्लेटें लेकर मोहल्ले के घरों में होली की मिठाई पहुंचाने का जो काम शुरू&amp;#160; होता तो रात तक चलता रहा । गुझियों, बेसन की बरफी, सेव, मठरियों से भरी प्लेटें जिन पर क्रोशिए की जाली से बने रुमाल ढंके रहते । उसके बाद दो तीन दिनों तक सहेलियों में होली की बातें चलतीं किस पर चुपके से रंग डाल दिया था, किस के बालों में चुपचाप से गुलाल भर दिया था, बातें कर करके आनंद लिया जाता था ।     &lt;br /&gt;''क्या हो गया भई&amp;#160; कहां खो गई फिर से'' मंजुला भाभी&amp;#160; ने कहा।     &lt;br /&gt;''कुछ नहीं भाभी बस आपकी ही बातों पर विचार कर रही थी ।'' सुषमा ने उत्तर दिया ।     &lt;br /&gt;''देखो सुषमा रोकने से कुछ नहीं होगा । हां थोड़ा बदलाव लाने से होगा । मैंने भी तो वही किया है । पक्के रंग और बाहर जाने, दोनों पर रोक लगा दी है, लेकिन घर में सारी व्यवस्था की हैं । आज भी केवल बारह बजे तक की मोहलत दी है । उसके बाद घर वापस । तुम भी वही करो, यूं रोकने से काम नहीं चलेगा, ये उनकी उम्र का संधिकाल है उनको आनंद लेने दो इसका, ये संधिकाल फिर नहीं लौट के आने का उनके जीवन में । बड़े होने के बाद जो होलियाँ तुम्हारे जीवन में आईं वो तुमको याद नहीं पर वो आज तक याद है जो संधिकाल की होली थी ।'' मुस्कुराते हुए कहा मंजुला भाभी ने ।     &lt;br /&gt;''मैं .....।'' अटकते हुए कहा सुषमा ने ।     &lt;br /&gt;''हां तुम, मुझे पता है तुमने राहुल को रोक दिया है, जाओ उसे अपने हिस्से का आंनद बटोरने दो, जीने दो अपने जीवन के संधिकाल को । ताकि तुम्हारी तरह उसकी भी स्मृतियों की पुस्तक में ये अध्याय अंकित हो जाएँ।'' कहते हुए मंजुला भाभी अंदर चली गई ।     &lt;br /&gt;सुषमा अंदर आई तो देखा एक पोलीथीन के बैग में कुछ सजावट का सामान रखा हुआ है । शायद राहुल अपनी तरफ से होली सजाने के लिए लाया है ।     &lt;br /&gt;''राहुल.....।'' उसने आवाज़ लगाई । आवाज़ सुनकर राहुल कमरे से निकल कर आया ।     &lt;br /&gt;''ठीक है जाओ, मगर बारह बजे से पहले मंजुला भाभी के बच्चों के साथ वापस आ जाना, और इस घरघुस्सी को भी ले जाओ, वहाँ कॉलोनी की लड़कियाँ रंगोली बना रही हैं और ये यहाँ टीवी देख रही है । थोडी देर बाद मैं आऊँगी मंजुला भाभी के साथ होली की पूजा करने, तब ले आऊँगी इसे वापस ।'' सुषमा ने कहा । राहुल ने झपटते हुए सुषमा के हाथ से बैग छीना और अंदर की तरफ दौड ग़या, थोड़ी ही देर में अंदर टीवी बंद हो गया । बंद होते ही छोटी की आवाज आई ''मम्मी....''&amp;#160; और फिर अंदर से लडने झगड़ने के स्वर आने लगे । सुषमा हंसती हुए किचिन में चली गई, उसे कल की तैयारियां जो करनी थीं&amp;#160; । &lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-1831789263846486475?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/1831789263846486475/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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रहे सूरज को देख रहा है ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; आहिस्ता आहिस्ता सूरज क्षितिज की सीमा रेखा के नीचे उतर गया ,सूरज के अस्त होते ही अखिलेश ने एक ठंडी सांस छोड़ी ,और धीरे धीरे चलता हुआ छत के दूसरी तरफ आ गया । छत के इस कोने से विनीता के घर का पूरा ऑंगन साफ दिखाई देता है ,आंगन में ख़ामोशी और उदासी बिछी हुई है ,मानो समय का कोई क्षण आंगन की देहरी पार ना कर पाया हो और वहीं ठहर कर रह गया हो । उतरती सांझ के झुटपुटे में डूबा है पूरा आंगन ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अखिलेश ने उस सूने से आंगन से छत को जोड़ने वाली सीढ़ियों को देखा ,यूं लगा अभी बंदरों की तरह कूदती फांदती बिन्नी सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर आ जाएगी ,बालों में ढेर सारा तेल चुपड़े और उन्हें कस कर दो दो लाल रिबनों से बांधे ,ऑंखों में ढेर सा काजल लगाए और बैंगनी फूलों वाली फ्राक पहने हुए । आते ही कहेगी ''चल अक्कू चपेटे खेलें'' और वो प्रतिरोध करेगा '' चल हट्ट..... मैं कोई लड़की हूँ क्या ? '' ,उसके इतना कहते ही बिन्नी की ऑंखों से दो मोटे मोटे आंसू ढलक पड़ेंगे ,और कुछ ही देर बाद छत की पानी की टंकी के पास वो दोनों चपेटे खेलते नज़र आऐंगे । अखिलेश ने टंकी के पास के कोने पर नज़र डाली ,वहां पर भी एक मौन पसरा हुआ है ,मानो किसी अद्भुत शोक गीत की समाप्ति के बाद का सन्नाटा फैला हो । आहिस्ता आहिस्ता सीढ़ियां उतरता हुआ अखिलेश नीचे आ गया ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; घर में आया तो देखा वहाँ भी एक अजीब तरह की उदासी वातावरण में घुली है ,हवा तक थके पांवों से बोझिल-बोझिल चल रही है ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' कहाँ चला गया था .......?'' अखिलेश को चुपचाप आते हुए देखा तो मां ने पूछा ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' कहीं नहीं छत पर खड़ा था '' अखिलेश ने नज़रें चुराते हुए जवाब दिया ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; छत का सुनते ही सब्ज़ी काटते मां के हाथ एक पल को कांप गए । अखिलेश ने देखा तो चुपचाप अपने कमरे की तरफ चला गया । कमरे में चारों तरफ़ बिन्नी मौजूद है । टेबल पर रखा बिन्नी के हाथों बना रूई का गदबदा सा जोकर&amp;#160; और दीवार पर टंगी ढलते सूरज की पेंटिंग जिसके एक कोने पर बिन्नी लिखा है , सब के सब अपनी सृजनकर्ता के इंतज़ार में स्तब्ध से लग रहे हैं । अखिलेश कुछ देर तक तो सब को देखता रहा ,फिर अचानक ही उसके अंदर का बाँध टूट गया ,वह पलंग पर गिर गया और फूट फूट कर रोने लगा ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ''अक्कू .... नहीं बेटा इस तरह कमज़ोर होने से कुछ नहीं होगा ''अखिलेश के सर पर हाथ फेरते हुए मां ने कहा जो अखिलेश की तेज़ सिसकियों की आवाज़ सुनकर सब्ज़ी काटना छोड़ कर दौड़ती हुई आ गईं थीं।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' नहीं बेटा अब तो उसके बिना जीने की आदत डालनी पड़गी '' कहते हुए मां ने उसका सर उठा कर अपनी गोद में रख लिया ,मां की गोद में सर रखते ही अखिलेश फफक फफक कर रो पड़ा । मां कभी उसकी पीठ सहलाती ,कभी सर , और बीच में चुपके से आंचल से अपने आंसू भी पोंछ लेती ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' मां ...बिन्नी चली गई ...'' रोते रोते टूटती सी आवाज़ में अखिलेश ने कहा ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अखिलेश और बिन्नी की कहानी तब से ही शुरु होती है जबसे उनका जीवन शुरू होता है। दोनों के घर बिल्कुल लगे होने से ,और छतें एक होने से दोनों परिवारों में शुरू से ही अच्छी मित्रता रही । लगभग हम उम्र होने के कारण दोनों का जीवन क्रम भी एक सा ही चला ,दोनों ने एक साथ ही स्कूल जाना शुरु किया ,तो यह सिलसिला कालेज तक चलता रहा , टूटा तो केवल बिन्नी के चले जाने से ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; इस कहानी में अगर प्रेम के तत्वों की खोज की जाए ,मसलन पीली पीली चाँदनी से भरी रातें ,गुलमोहर के फूलों से लदे हुए पेड़ों के बीच से गुज़रती पगडंडियाँ ,और ऑंखों ही ऑंखों में होने वाली ख़ामोश सी बातें , तो ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। बिन्नी के चले जाने तक भी दोनों को यह पता नहीं चल पाया था कि उनका आपस में रिश्ता क्या है ?     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; गुलमोहर का फूल उन दोनों के लिए प्रेम का प्रतीक ना होकर बॉटनी का प्रेक्टिकल होता था ,और वही गुलमोहर का फूल ,चर्चा से बहस और फिर बहस से अच्छे खासे युध्द का कारण बन जाता था। जब छोटे थे तब बाकायदा गुत्थम गुत्था होकर लड़ते थे ,चपेटे की बेईमानी या दूसरी किसी बात पर शुरु हुई लड़ाई ,हाथा पाई में बदल जाती ,और पता चलता इसके हाथ में उसकी चोटियाँ हैं ,तो उसके हाथ में इसके बाल। वही रिश्ता बाद में भी बना रहा ,अंतर केवल इतना हुआ था कि हाथापाई की जगह जुबानी युध्द होने लगा था।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; घर में आकर अखिलेश गुस्से में किताबें टेबिल पर फैंकता ,और माँ पूछतीं '' आज किस बात पर लड़ाई हुई '' जवाब पड़ोस के ऑंगन से बिन्नी का आता '' चाची साइंस पढ़ना हर किसी के बस की बात नही , यहां रटने से काम नही चलता , सब पता होना चाहीए ।''    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; पिछले साल वैलेन्टाइन डे पर रुई का गदबदा जोकर बनाकर लाई थी बिन्नी ,सुर्ख लाल रंग का जोकर जिसके सर पर पीली फूलदार टोपी लगी थी ,और सीने पर एक छोटा सा दिल जिस पर ''अक्कू '' लिखा था। सुबह सुबह वह सो ही रहा था ,जब शोर शराबा करते हुए बिन्नी जोकर को लेकर उसके कमरे मे घुसी । उसे झंझोड़कर उठा दिया ,और उसके उठते ही हाथों में जोकर देकर बोली '' हैप्पी वेलेन्टाइन डे '' कुछ&amp;#160; आश्चर्य से कहा था अखिलेश ने ''मुझे .....? ''     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ''नहीं तो क्या दीवार से कह रही हूँ , इत्ती मेहनत से तुम्हारा पुतला बनाया है ,उसको तो देखो , '' गुस्से में बोली थी बिन्नी ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' समझती भी हो यह वेलेन्टाइन डे क्या होता है '' अखिलेश ने उसकी तरफ़ देखते हुए पूछा था ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' में समझती हूँ&amp;#160; ,तुम नहीं समझते '' फिर अखिलेश के सिर पर हाथ रखते हुए बोली '' तुम्हारा ये ऊपर का माला खाली जो पड़ा है क्या समझोगे ''।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' अच्छा तुम क्या समझती हो '' मुस्कुरा कर तकिये को गोद में रखते हुए कहा था अखिलेश ने ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ''जो रिश्ता नाम की सीमाओं से ऊपर उठ गया हो ,जिसके लिए कोई नाम नहीं सूझ रहा हो ,उस रिश्ते को एक नाम देने का दिन है । या कोई हो ,जो आपका दोस्त हो ,जो आपके साथ हो ,जो ना आपका रिश्तेदार हो ,ना प्रेमी हो ,ना और कुछ हो । एक रिश्ता जो आपके जीवन में उस तरह से फैला हो ,जैसे वादियों में कोहरे की चादर फैली होती है ,जिसके होने का अहसास तो किया जा सके पर जिसे छुआ नहीं जा सके '' कहते कहते बिन्नी की दोनो ऑंखो में दो सितारे चमक गए थे ,अखिलेश चुपचाप उसकी तरफ देखता रहा ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' तुमने गुनाहों का देवता पढ़ा है ..?'' कुछ उत्सुकता से पूछा था बिन्नी ने ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अखिलेश के इन्कार में सर हिलाने पर बोली '' फिर तुम क्या समझोगे ,कोई होता है ,जिससे आप सारी बातें&amp;#160; कर सकते हैं ,और.......।'' कह कर रुक गई थी बिन्नी ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ''और क्या...?'' अखिलेश ने उत्सुकता से पूछा था।&amp;#160; &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; '' और जिससे यह भी कहा जा सके '' कह कर बिन्नी फिर चुप हो गई थी ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ''क्या ...?'' फिर से पूछा था अखिलेश ने ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; ''यह कि गुलमोहर के फूल की पाँचवी पंखुड़ी के बारे में तुम्हारा बॉटनीकल नालेज बिलकुल गलत है बेवकूफ कहीं के '' कह कर हंसती हुई उठ कर चली गई थी बिन्नी , हाथों में जोकर को थामे देर तक बैठा रहा था वो।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; सेमेस्टर एग्ज़ाम के बीच में ही बिन्नी की तबीयत खराब हो गई थी । यहां के डाक्टरों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि बीमारी क्या है । जब बिन्नी के घर वालों ने उसे मुंबई इलाज के लिए ले जाने की तैयारी की ,तो अखिलेश ने भी अपनी तैयारी कर ली थी ,लेकिन बिन्नी ने ही उसे रोक दिया था ,यह कहकर कि तुम सेमेस्टर देकर आ जाना ,अपना साल मत खराब करो । बिन्नी को लेकर जब ट्रेन धीरे धीरे प्लेटफार्म से आगे बढ़ी थी ,तब उसने बिन्नी की ऑंखों में वही मोटे मोटे आंसू देखे थे ,जैसे बचपन में होते थे । वो दो बूंद आंसू उसे अंदर तक चीर गए थे।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; अखिलेश आख़िरी पेपर देकर घर लौटा तो बिन्नी के घर लगी भीड़ ने उसके पैरों को बाँध दिया था । बिन्नी वापस आ चुकी थी ,लेकिन जा चुकी थी । एक रोज़ पहले ही&amp;#160; मुंबई में बिन्नी की सांसें थम गई थीं ,लेकिन अखिलेश का आखिरी पेपर होने के कारण उसको ये खबर घर वालों ने नहीं दी थी । कहते हैं किसी के चले जाने के बाद पता चलता है ,कि वो आपके लिए क्या था ,बिन्नी के जाने के बाद अखिलेश को उस रिश्ते का अहसास हुआ । बिन्नी के जाने के बाद पत्थर हो गया अखिलेश ,एक बार भी फूटफूट कर नहीं रोया ,मानो अंदर से ऑंसुओं का सोता ही सूख गया हो । बिन्नी को गए भी दो महीने हो गए ,उसके जाने के बाद पहला वेलेन्टाइन डे है ,पिछले वर्ष की स्मृतियों के कारण अखिलेश सुबह से ही उदास था और आठ नौ माह का रुका हुआ दर्द अब ऑंसुओं के रूप में फूट कर बह रहा है ।     &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; मां ने देखा अखिलेश का रोना कम हुआ है तो बोलीं '' चल मुंह धो ले , मैं चाय बना लाती हूँ '' अखिलेश आंसू पोंछता हुआ उठ गया ,मां भी चली गयीं । बोझिल कदमों से चलता हुआ अखिलेश टेबिल के पास आया ,देखा जोकर हाथों को खोले मुस्कुरा रहा है उसने जोकर को हाथों में उठाया और उसे लेकर ऑंगन में आ गया ,बाहर फरवरी की गुलाबी रात बिखरी हुई है । जोकर को लेकर वो छत पर चला गया ,आसमान टिमटिमाते हुए छोटे बड़े सितारों से भरा है ,और उनके बीच खिला हुआ है चाँद ,अखिलेश ने जोकर को सीने में भींच लिया और आसमान की और मुंह करके धीरे से बोला '' हैप्पी वेलेन्टाइन डे बिन्नी '' उसने देखा उसके कहते ही दूर कोने में एक छोटा सा सितारा अचानक ज़ोर से झिलमिला उठा है ,ठीक उसी तरह जिस तरह से&amp;#160; बिन्नी की ऑंखों में दो सितारे झिलमिला गए थे पिछले बरस ,आज ही के दिन ।    &lt;br /&gt;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160;&amp;#160; -समाप्त-&lt;/p&gt;  &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-5908903208288243730?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/5908903208288243730/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=5908903208288243730&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/5908903208288243730'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/5908903208288243730'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='मुठ्ठी भर उजास'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16918539411396437961</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/-sC_NwkqpE14/Th_TsuJPyCI/AAAAAAAAFCo/qZ4A0_ZS3w0/s220/DSC_37802.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7792071990936624753.post-8351745876570839629</id><published>2010-01-09T07:51:00.001+05:30</published><updated>2010-01-09T07:51:18.188+05:30</updated><title type='text'>पंकज सुबीर की कहानियां</title><content type='html'>कहानीकार के रूप में पंकज सुबीर की कहानियाँ बहुचर्चित हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, कादम्बिनी, लफ्ज, आधारशिला जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। दैनिक भास्‍कर, नव भारत, नई दुनिया आदि समाचार पत्रों में 100 से भी अधिक कहानियाँ, व्यंग्य, ग़ज़ल और कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं मप्र उर्दू अकादमी के मुशायरों में ग़ज़ल पाठ तथा कहानी पाठ कई बार किया है। पेशे से पत्रकार और कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर इंजीनियर है। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के लिये फ्रीलांसिंग करते हैं। ग़ज़ल के व्‍याकरण पर कार्य कर रहे हैं और आम बोल चाल की भाषा में ग़ज़ल का व्‍याकरण लाना चाहते हैं। गज़ल के पिंगल शास्‍त्र पर कार्यरत तथा उसको हिंदी में किताब के रूप में लाने पर कार्य कर रहे हैं । कवि के रूप में कई अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन के मंचों पर ओज के कवि के रूप में काव्‍य पाठ कर चुके हैं तथा मंच संचालन भी। अपने ब्‍लाग सुबीर संवाद सेवा पर वर्तमान में पिछले छ: सात माह से ग़ज़ल सिखाने का काम कर रहे हैं जिससे कई सारे सीखने वाले लाभान्वित हुए हैं । अपना स्‍वयं का कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर तथा ग्राफिक्‍स प्रशिक्षण केंद्र चलाते हैं । एक प्रकाशन शिवना प्रकाशन के प्रकाशक जो कि साहित्यिक पुस्‍तकों के प्रकाशन का कार्य करता है जिसके तहत आज तक तीन काव्‍य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा दो काव्‍य संग्रह पर कार्य च‍ल रहा है । कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं कविताएँ कादम्बिनी, हँस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, समर लोक, संवेद वराणसी, जज्बात, आधारशिला, समर शेष है, लफ जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। भारतीय भाषा परिषद ने लगातार दो वर्षों तक (2005 एवं 2006) युवा कथाकारों के विशेषांक में शामिल किया। तथा देश के प्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ ने वर्ष 2007 की युवा लेखकों के विशेषांक में स्थान दिया । ''हँस'' में प्रकाशित कहानी ''और कहानी मरती है .....'' के लिये प्रेमचंद सम्मान से सम्मानित । वर्ष 2003 में सुकवि पंडित जनार्दन शर्मा पुरुस्कार प्राप्त हुआ । इटारसी की साहित्यिक संस्था सलिला द्वारा सम्मानित । जल रोको आयोजन के तहत पत्रिका संकल्प के संपादन पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विशेष पुरुस्कार दिया गया । प्रतिष्ठित समाचार पत्रों दैनिक भास्कर, नई दुनिया, नव भारत आदि में समय समय पर सौ से भी अधिक कहानियाँ, व्यंग्य लेख एवं कविताएँ तथा सामयिक लेख प्रकाशित। वर्तमान में ''सुबीर संवाद सेवा'' के नाम से एक इंटरनेट आधारित समाचार एजेंसी के चीफ एडीटर हैं जिसके समाचार देश के सभी प्रमुख समाचार चैनलों में लिये जाते हैं । ''शिवना प्रकाशन'' के माध्यम से पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य । प्रकाशन से अभी तक तीन पुस्तकों ''झील का पानी'', ''बंजारे गीत'' तथा ''गुलमोहर के तले'' का प्रकाशन। ओज के कवि के रूप में कई अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों से काव्य पाठ तथा मंचों का संचालन किया है । तीन कहानियों ''घेराव'' का तेलगू , ''तुम लोग'' का उर्दू में तथा ''ऑंसरिंग मशीन'' का पंजाबी में अनुवाद ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज सुबीर के कहानी संग्रह ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी को भारतीय ज्ञानपीठ ने वर्ष 2009 में ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्‍कार के लिये अनुशंसित किया । मार्च 2009 में ये कहानी संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित होकर आया ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7792071990936624753-8351745876570839629?l=premkathayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://premkathayen.blogspot.com/feeds/8351745876570839629/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7792071990936624753&amp;postID=8351745876570839629&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/8351745876570839629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7792071990936624753/posts/default/8351745876570839629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://premkathayen.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='पंकज सुबीर की कहानियां'/><author><name>पंकज सुबीर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12892444318837806408</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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