पत्थर की होदें और अगन फूल (कहानी : पंकज सुबीर)

पत्थर की होदें और अगन फूल
(कहानी : पंकज सुबीर)
भारत में जितने भी सर्किट हाउस, रेस्ट हाउस, डाक बँगले, विश्राम गृह आदि पाए जाते हैं, वो अधिकांश अंग्रेज़ों के बनाए हुए हैं। इनमें से भी अधिकतर शहर से दूर एकांत में बनाए गए हैं। कुछ-कुछ तो घने जंगल के अंदर भी हैं। बहुत से कारण होते थे इनके एकांत में होने के। अंग्रेज़ तो वैसे भी एकांतप्रिय होते थे। एकांत की तलाश में जाने कहाँ-कहाँ निकल जाया करते थे। ऐसा ही कोई अंग्रेज़ शायद डोडी में भी पहुँच गया होगा और नैसर्गिक सुंदरता पर रीझ कर डाक बँगला बनवा दिया होगा। डोडी का डाक बँगला। जाने कौन सी भवन सामग्री उपयोग करते थे अंग्रेज़ कि बरसों बीतने के बाद भी पूरे देश में डाक बँगले जस के तस खड़े हैं। दरार तक नहीं पड़ी है। डोडी का डाक बँगला भी अंग्रेज़ों का ही बनाया हुआ है। मटमैले-पीले और सफ़ेद रंग से पुता हुआ भवन, और उस पर लाल-कत्थई कवेलुओं की ढलवाँ छत। पूरे भवन के चारों तरफ़ लोहे के खम्बों का बरामदा। बरामदे पर छाई हुई बोगनबेलिया और रंगून क्रीपर की लतरें। घनी लतरें। बरामदे से अंदर झाँकती हुईं और कहीं-कहीं ज़मीन से बरामदे की छत तक जाकर वापस ज़मीन पर लौटी हुईं।  बरामदे में भवन की चारों दिशाओं में सीढ़ियाँ, भवन में जाने के लिए। पत्थर की सीढ़ियाँ। भवन के चारों तरफ़ बग़ीचे में कुछ फूलदार पौधे और कुछ फलदार पेड़। चारों तरफ़ आड़ी-तेढ़ी लकड़ियों की डिज़ाइनर फेंसिंग। फेंसिंग के किनारे-किनारे लगे नीलगिरी, अमलतास, वनचम्पा, शीशम और गुलमोहर के दरख़्त। पीछे की फेंसिंग से सटा हुआ डाक बँगले के चौकीदार का छोटा-सा मकान। डाक बँगलों के चौकीदार वास्तव में पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर होते हैं। सब कुछ इनको ही करना होता है। बँगले की साफ-सफाई, आने वालों के लिए चाय-नाश्ता, खाना-पीना, और बाकी का सारा काम भी।
सड़क से कुछ अंदर को है डोडी का डाक बँगला या रेस्ट हाउस, अगर आपको वहाँ जाना है तो मुख्य मार्ग को छोड़ कर नीचे उतरना होता है और क़रीब एक-डेढ़ किलोमीटर कच्चे-पक्के रास्ते पर चलने के  बाद आता है डाक बँगला। आस-पास कहीं कोई आबादी नहीं है, फिर भी डोडी डाक बँगला कहते हैं। ज़ाहिर-सी बात है डोडी उस गाँव के नाम पर होगा, जहाँ रेस्ट हाउस स्थित है। सारे डाक बँगलों के नाम इसी प्रकार तो रखे गए हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि आस-पास इस नाम का कोई गाँव नहीं फिर क्यों रखा गया होगा नाम डोडी डाक बँगला ? चारों तरफ़ जंगल है, कम घना और छोटे पेडों, झाड़ियों का जंगल। जहाँ जंगल ख़त्म होता है, वहाँ से पहाड़ शुरू हो जाते हैं। काले, नीले, धूसर पहाड़, दिशाओं की धुंध में खोए हुए पहाड़। डोडी का डाक बँगला बरसों-बरस तक शिकार खेलने के काम आता रहा। अंग्रेज़ों और नवाबों के शिकार खेलने के। पहाड़ों के पार जंगल बहुत ज़्यादा घना हो जाता है। उसी जंगल में शिकार खेला जाता था। पहाड़ों के पार जंगल में आदिवासियों के गाँव हैं। उन्हें गाँव भी क्या कहें, बस इधर-उधर बिखरे हुए टप्पर हैं। जंगल के बीच-बीच में जहाँ जगह मिली वहीं टप्पर बना कर ये आदिवासी बस गए हैं। आज़ादी के पहले तक जँगली जानवर बहुतायत में थे लेकिन अब बस नाम को ही हैं। शिकार पर रोक लगने के बाद भी हुआ यह कि उस जंगल को रिज़र्व फॉरेस्ट नहीं घोषित किया गया, तो अंग्रेज़ों के जाने के बाद भारतीय काले अंग्रेज़ों ने शिकार कर-कर के जंगली जानवरों का सफाया कर दिया।
अरे....! मैं यह तो आपको बताना ही भूल गया कि यह सब कुछ जो आपको बता रहा हूँ, यह एक फ़्लैश-बैक है। शायद आठ या दस वर्ष पूर्व का फ़्लैश-बैक। मेरी अपनी स्मृतियों का एक छोटा-सा अध्याय। मैं....? मैं कौन...? मैं जो आपको यह कहानी सुना रहा हूँ। मैं पीताम्बर गुदेनिया.... साल भर पहले तक जब मैं सरकारी नौकरी में था, मुझे पीजी बाबू कह कर बुलाया जाता था। पीताम्बर गुदेनिया का शॉर्ट फार्म। अब बाबूगिरी तो नहीं रही, बस पीजी ही बचा हूँ मैं। बहुत से लोगों के लिए पेइंग गेस्ट। पेइंग गेस्ट, क्योंकि सरकारी पेंशन तो मिल ही रही है न मुझे। जब रिटायर हुआ, तब ज़िला कलेक्टर या डीएम के ऑफ़िस में उनका पीए कम बड़ा बाबू कम स्टेनो सब कुछ ही था मैं। सामान्यतः पीए का काम ऑफ़िस तक ही सीमित होता है, लेकिन यह भी कुर्सी पर बैठे अधिकारी पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकार का है। कुछ अधिकारी ज़िले के दौरों में पीए को साथ ले जाना पसंद करते हैं, तो कुछ गोपनीयता के चलते अकेले ही चलना पसंद करते हैं। तो होता यह था कि मैं कभी कार्यालय में रहता था, तो कभी साहब के साथ उनकी गाड़ी में बैठ कर दौरे करता था। जब गाड़ी में बैठ कर दौरे करता था, तो कहावत के अनुसार अपने आप को नाक का बाल महसूस करता था। प्रशासनिक व्यवस्था की नाक का बाल।
अब ज़रा आपको कहानी के वर्तमान कालखण्ड से भी परिचित करवा दूँ। अगर कहानी फ़्लैश-बैक में जा रही है, तो आपको पता भी तो होना चाहिए कि पीताम्बर गुदेनिया आज अचानक डोडी के उस रेस्ट हाउस को याद करके कहानी क्यों सुना रहा है। (अब हम इसे डोडी का रेस्ट हाउस या विश्राम गृह ही कहेंगे, डोडी डाक बँगले का अनुप्रास ज़रा टंग ट्विस्टर है।) याद बिना कारण तो आती नहीं। वह सब कुछ जो अब अतीत है, उसकी कोई घटना, या व्यक्ति, या स्थान, हमें तभी याद आता है, जब हम वर्तमान में कहीं उस विस्मृत का कोई संकेत पाते हैं। वरना तो हमें अब समय ही कहाँ है कि हम यूँ ही बस किसी दिन आँगन में लेट कर उस बीते हुए को याद करें। अरे.... फिर भटका.... ये पीताम्बर गुदेनिया इसी प्रकार विषय से भटक-भटक कर इधर-उधर घुसता रहेगा, आपको डोडी के रेस्ट हाउस की कहानी सुननी है, तो आपको इसे झेलना ही पड़ेगा। बात अचानक इस कहानी के याद आ जाने की चल रही है, तो लगे हाथों आपको यह भी बता दूँ कि मैं अभी एक कार में सवार हूँ। कार, जो मुझे लेकर भोपाल से इन्दौर लौट रही है। लौटना इसलिए क्योंकि मैं इन्दौर में रहता हूँ। यह कार एक टैक्सी है, जितनी पेंशन मुझे मिलती है, उतने में इतना तो अफोर्ड कर ही सकता हूँ कि टैक्सी से घूमूँ। जीवन भर बाबूगिरी की, तो कार चलाना सीख नहीं पाया। अब रिटायरमेंट के बाद कहीं जाना होता है, तो ट्रेवल्स की कार लेता हूँ और निकल पड़ता हूँ। तो मैं भोपाल से इन्दौर लौट रहा हूँ। लौट रहा हूँ अपने घर। भोपाल में बहन रहती हैं, आज रक्षाबंधन पर उनसे राखी बँधवाने गया था। बहन ने रात का खाना खाए बिना नहीं निकलने दिया, तो ये देर हो गई है। रात हो चुकी है।
पीताम्बर गुदेनिया फिर भटक गया है। असल में आज श्रावण की पूर्णिमा होने के बाद भी मौसम पूरी तरह से खुला हुआ है। श्रावण तो मूसलाधार बरसात, नदी-नालों के उफनने, बादलनों के गरजने-बरसने का महीना होता है। इस साल सावन कुछ सूखा बीत रहा है। दो-तीन दिन पहले तक तो हल्की-फुल्की बरसात हो भी रही थी मगर अब बिल्कुल बंद है। आसमान एकदम खुला हुआ है। कार से देखने पर हर तरफ़ तारे छिटके हुए दिखाई दे रहे हैं। और श्रावण पूर्णिमा का ज़र्द चाँद भी दूर आसमान पर टँका हुआ है। चाँद...? हाँ चाँद से ही तो याद आई थी मुझे डोडी के विश्राम गृह की। डोडी का विश्राम गृह इसी रास्ते पर तो पड़ता है। इसी रास्ते पर, मतलब डोडी के विश्राम गृह को जाने वाला रास्ता इसी हाइवे से फूटा है। थोड़ी देर बाद ही उल्टे हाथ पर एक पतली-सी सड़क इस मुख्य मार्ग को छोड़कर, दूर पहाड़ों में, अँधेरों में बिला जाएगी। वही सड़क डोडी विश्राम गृह को जाएगी। लेकिन पीताम्बर गुदेनिया को याद तो चाँद को देखकर आई थी, रास्ते के कारण नहीं ? हाँ... भई हाँ, चाँद को देखकर ही आई थी। तो चलिए एक बार फिर से हम फ़्लैश-बैक में चलते हैं। वहीं आपको पता चलेगा कि पीताम्बर गुदेनिया को चाँद देखकर डोडी की याद क्यों आई थी।
डोडी का विश्राम गृह जैसा कि बताया गया कि एकदम वीराने में है। न आदमी, न आदमी की ज़ात। भूतहा फ़िल्मों के लिए एकदम मुफ़ीद। बात आठ-नौ साल पहले की है। राकेश सक्सेना उस समय कलेक्टर थे। हँसमुख और आत्मीय स्वभाव के धनी थे राकेश सक्सेना। पीताम्बर गुदेनिया, यानी मुझको हमेशा साथ लेकर दौरे करते थे। रास्ते भर बातें करते रहते, नई-नई जानकारियाँ प्राप्त करते रहते। ऐसा लगता था जैसे दुनिया छोड़ने के पहले दुनिया के बारे में सब कुछ जानना चाहते थे। मानों मरने के बाद भी दुनिया के बारे में आई. ए. एस. की परीक्षा देनी हो। कोई भी नई जानकारी मिलती, तो खोद-खोद कर देर तक उसके बारे में पूछते रहते। जब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाते, पूछते रहते। दो ही शौक़ थे उनके, एक तो जानकारियाँ प्राप्त करना और दूसरा बाग़वानी। जब भी कलेक्टरी से फुरसत मिलती, तो खुरपी लेकर बँगले के बग़ीचे में काम करने जुट जाते। दो-तीन महीने पहले ही इस ज़िले में पदस्थ हुए थे। दो-तीन महीने में ही मुझसे अच्छी तरह से घुल-मिल गए थे। लगभग हमउम्र होना भी शायद इसका एक कारण था। मित्रतावत् व्यवहार करते थे मेरे साथ। पहला एक महीना तो ज़िले भर की राजनैतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक जानकारी प्राप्त करने में ही बीत गया था उनका। कौन क्या है ? कैसा है ? कहाँ है ? सब कुछ बताना पड़ा था मुझको। उत्तर में फिर एक प्रश्न और प्रश्न के उत्तर में फिर एक प्रश्न। जब किसी जानकारी से बहुत प्रसन्न हो जाते तो बस एक ही बात कहते -पीजी यू आर ग्रेट।
राकेश सक्सेना का परिवार उनके साथ नहीं आया था यहाँ। पत्नी भोपाल के निजी मकान में बच्चों के साथ रहती थीं। अमूमन सारे आई. ए. एस. अधिकारी यही करते हैं। पत्नी और बच्चों को राजधानी में मकान ख़रीद कर वहाँ रख देते हैं, और ख़ुद प्रदेश भर में स्थानांतरित होकर घूमते रहते हैं। राजधानी में इसलिए क्योंकि सात-आठ साल की कलेक्टरी के बाद तो राजधानी में ही सचिवालय, मंत्रालय में बैठना होता है। इसलिए ये पहले से ही अपने परिवार को राजधानी में रख देते हैं, बच्चों की पढ़ाई लिखाई डिस्टर्ब नहीं होती है और राजधानी में उनकी हैसियत के पाँच-सात सितारा स्कूल भी मिल जाते हैं। बाक़ी कलेक्टर को अकेले रहना होता है, तो कलेक्टर अकेला होता कब है, वो जब चाहे उसका अकेलापन तो दूर हो ही जाता है। राकेश सक्सेना भी कलेक्टर निवास के उस बड़े-से बँगले में अकेले ही रहते थे। रात को दौरे से लौटते समय जहाँ रेस्ट हाउस मिल जाता, वहीं खाना खा-पीकर बँगले को लौटते। मेरा तो परिवार था लेकिन अगर अफ़सर छड़े-सा हो तो मातहत को भी छड़ा होना ही पड़ता है और कोई ऑप्शन होता भी नहीं है।
बात उन्हीं दिनों की है जब राकेश सक्सेना को आए हुए दो-तीन महीने हो चुके थे और अब ज़िले में दौरे चल रहे थे। उन्हीं दौरों के क्रम में कहीं से किसी गाँव से लौटते हुए हम दोनों डोडी के उस रेस्ट हाउस में पहुँचे थे। जैसे ही रेस्ट हाउस के चौकीदार ने कलेक्टर की लाल बत्ती लगी (उस समय कलेक्टर की गाड़ी पर लाल बत्ती लगी होती थी।) गाड़ी को रेस्ट हाउस में प्रवेश करते देखा, वह पीछे के अपने मकान से नंगे पैर दौड़ता हुआ आ गया था। अधेड़, या यूँ कहें कि लगभग बूढ़ा-सा आदिवासी चौकीदार था वह। नाम था मोन्या। माँ-बाप ने नाम तो मोहन रखा था, पर अब वह मोन्या होकर रह गया था। राकेश सक्सेना कार से उतर कर रेस्ट हाउस के अंदर चले गए थे। पीछे-पीछे मोन्या भी चला गया था। मैं वहीं बरामदे में पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया था। कुछ ही देर में मोन्या भी अंदर से आया और बरामदे में नीचे बैठ गया। पूर्व के कलेक्टरों के साथ मैं वहाँ आता रहता था, इसलिए मोन्या से परिचित था। समय काटने के लिए मैं मोन्या से बातें करने लगा था।
अभी शाम का झुटपुटा होने में भी समय था। सूरज ढल रहा था लेकिन अभी उजाले की आँखों में इतना काजल नहीं लगा था कि उसे शाम कह सकें। बरसात का मौसम था, चारों तरफ़ रेस्ट हाउस में हरियाली की चादर बिछी हुई थी। मौसमी फूल भी खिल उठे थे बरसात का स्पर्श पाकर। राकेश सक्सेना बाथरूम से फ्रेश होकर बाहर आए, तो मैं और मोन्या दोनों उठ कर खड़े हो गए थे।
‘‘बहुत सुंदर जगह है पीजी यह तो...! एकदम शांत जगह और आसपास कितनी नेचुरल ब्यूटी बिखरी हुई है....। वाह.... सुंदर...!’’ राकेश सक्सेना के चेहरे पर प्रशंसा के भाव थे। वो मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए थे। उनके इशारे पर मैं भी सकुचाता हुआ बैठ गया था।
‘‘क्या नाम है तुम्हारा...?’’ राकेश सक्सेना ने मोन्या की तरफ़ देखते हुए कुछ मीठे स्वर में पूछा था।
‘‘जी मोन्या..... जी मोहन....।’’ कुछ हड़बड़ाते हुए उत्तर दिया था मोन्या ने। शायद पहली बार किसी अधिकारी ने उससे उसका नाम पूछा था।
‘‘हमें क्या खिलाओगे मोहन जी ...?’’ राकेश सक्सेना ने मोन्या की उमर को देखते हुए जी लगा दिया था नाम के आगे।
‘‘जो साहब जी कहें!’’ कहता हुआ मोन्या झुककर लगभग दोहरा हो गया था।
‘‘हम क्या बताएँ..? तुम बताओ, हम तो तुम्हारे मेहमान हैं, जो खिलाओगे खा लेंगे हम तो।’’ राकेश सक्सेना ने कुछ मुस्कुराते हुए कहा था।
‘‘तीतर पका लूँ साहब ?’’ मोन्या ने प्रश्न किया था।
‘‘तीतर....? वह तो प्रतिबंधित है, क़ानूनन जुर्म है तीतर का शिकार करना..।’’ राकेश सक्सेना का स्वर एकदम अधिकारियों वाला हो गया था।
‘‘सारे साहब लोग तो यहाँ तीतर खाने ही आते हैं साहब जी।’’ मोन्या ने घबराते हुए बहुत ही अदब के साथ उत्तर दिया था।
‘‘नहीं... नहीं... वो ग़लत है, ग़ैरक़ानूनी है, तीतर संरक्षित पक्षी है। कुछ और बनवा लो, कुछ भी वेज बनवा लो, नानवेज नहीं।’’ राकेश सक्सेना ने सामान्य होते हुए कहा था।
मोन्या हाथ जोड़ घबराया हुआ खड़ा था। हैरत में भी था कि आज तक तो जो भी अधिकारी यहाँ आता है, वह तीतर खाने ही आता है। यहाँ उसके अलावा और है ही क्या। यहाँ से तो तीतर राजधानी भोपाल तक भेजा जाता है। ये कौन आ गया जो यहाँ तीतर खाने नहीं आया है। मैंने मोन्या की उलझन समझ ली थी और उससे पूछताछ करके मैंने तिक्कड़ रोटी, आलू-भटे का कच्चा भुरता, टमाटर-हरीमिर्च  का झोल और धनिये की हरी चटनी बनाने को कह दिया था। मेरे कहते ही उसने एक बार राकेश सक्सेना की तरफ़ देखा था। मुतमईन होने के लिए कि पीताम्बर गुदेनिया ने जो घास-फूस पकाने को कहा है, उसे आप खाएँगे भी? राकेश सक्सेना की तरफ से सकारात्मक संकेत पाकर वह हाथ जोड़े जाने लगा था।
‘‘सुनो...।’’ राकेश सक्सेना की आवाज़ पर ठिठक गया था मोन्या ‘‘जा कहाँ रहे हो, ये पैसे तो लेकर जाओ, सब्ज़ी और दूसरा सामान भी तो लाना होगा।’’ कहते हुए राकेश सक्सेना ने अपनी जेब से पर्स निकाला और उसमें से कुछ नोट निकाल कर मोन्या की तरफ़ बढ़ा दिए थे। मोन्या ने झिझक कर मेरी तरफ़ देखा था, मेरे इशारे पर उसने बढ़कर पैसे ले लिए थे।
‘‘तुम ख़ुद बनाओगे या कोई और बनाएगा ?’’
‘‘साहब जी बेरा मानस बनाएगी खाना...।’’ मोन्या के उत्तर पर राकेश सक्सेना ने अचरज से मेरी तरफ़ देखा था।
‘‘बेरा मानस मतलब इसकी घरवाली...।’’ मैंने उत्तर दिया था।
‘‘ठीक है... तो उनको खाना तैयार करने का कह कर आ जाओ। हमें ज़रा आसपास का इलाक़ा दिखाओ।’’
‘‘जी साहब जी।’’ इतना कह कर मोन्या मेरी तरफ़ मुड़ गया था ‘‘और भी कुछ लाना है क्या साहब ? या कुछ और भी व्यवस्था करनी है क्या ?’’ यह प्रश्न उसने मुझसे किया था।
‘‘नहीं कुछ और नहीं, बस तुम जल्दी जाओ और जल्दी से सामान की व्यवस्था करके जल्दी से आओ, साहब को घूमने जाना है।’’ मेरे आदेश पर मोन्या हैरत में डूबा चला गया था।
उसके जाने के बाद राकेश सक्सेना के पूछने पर मैंने बताया था कि मोन्या के ‘और कुछ’ का मतलब आदिवासियों की बनाई हुई शराब और ‘और कुछ व्यवस्था’ का मतलब आदिवासियों की कन्याएँ। राकेश सक्सेना का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा था मेरी बात सुनकर।
कुछ देर बाद हम तीनों रेस्ट हाउस के पीछे के झुरमुट में टहल रहे थे। शाम होने में अभी भी समय था। रेस्ट हाउस की सीमा के बाहर आते ही बरसाती जँगली फूल चारों तरफ़ खिले हुए मिल रहे थे। हर तरफ़ हरियाली की सब्ज़ चादर बिछी हुई थी। आज मैं राकेश सक्सेना के लिए अनुपस्थित-सा था, वे आज मोन्या से जानकारी प्राप्त करते हुए चल रहे थे। आदिवासियों के बारे में, उनकी संस्कृति के बारे में, रीति-रिवाज़, पर्व-त्योहार। जंगल के बारे में, जँगली जानवरों के बारे में, शिकारियों के बारे में। मतलब सब कुछ जानने की जो जिज्ञासा उनके स्वभाव में थी, उसके अनुसार जानने की कोशिश कर रहे थे। मोन्या भी उत्साह के साथ उनको जानकारी दे रहा था। वह ख़ुद भी आदिवासी था, इसलिए उसके पास तो देने की लिए बहुत जानकारी थी। झाड़ियों के किनारे से होकर एक बरसाती नदी बह रही थी। बरसात होने के कारण उसमें भरपूर पानी था। ऊपर पहाड़ से उतर कर रेस्ट हाउस के पीछे से बहती हुई जा रही थी वह। नदी के किनारे-किनारे पत्थर की बड़ी-छोटी चट्टानें बिखरी हुई थीं। पहाड़ वहाँ से शुरू हो रहा था। राकेश सक्सेना ने नदी को देखा और वे उन चट्टानों की तरफ़ बढ़ गए थे। ज़ाहिर-सी बात है कि उनके पीछे-पीछे मैं और मोन्या भी बढ़ गए थे। अब हम नदी के किनारे-किनारे पत्थरों पर सँभलते हुए चल रहे थे। इस बीच यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि राकेश सक्सेना ने मोन्या से नदी का नाम जान लिया था कि इस नदी का नाम कमानी नदी है।
हम लोग नदी से अब पहाड़ की तरफ़ बढ़ रहे थे कि एक बड़ी चट्टान की ओट में कुछ मानव निर्मित आकृतियाँ देखकर राकेश सक्सेना रुक गए थे।
‘‘ये क्या है...?’’ उन्होंने मोन्या की तरफ़ प्रश्नवाचक नज़रों से देखते हुए पूछा था।
‘‘ये होदें हैं साहब जी..। पत्थर की होदें...।’’ मोन्या ने उत्तर दिया था।
चट्टान की ओट में समतल ज़मीन पर पत्थर की दो होदें बनी हुई थीं। आजकल के बाथटब जैसी और लगभग उतनी ही बड़ी थीं वो होदें।
‘‘वो तो मुझे भी दिख रही हैं, पर ये यहाँ क्यों बनी हैं ? यहाँ जंगल में इनका क्या काम, जो इनको यहाँ बनवाया गया। पास में ही तो नदी है फिर ये होदें किसलिए।’’ राकेश सक्सेना ने पूछा था।
‘‘वो साहब जी....।’’ कुछ कहते हुए मोन्या रुक गया था और सिटपिटा भी गया था।
‘‘क्या हुआ ? ’’ मोन्या की सिटपिटाहट को देखकर राकेश सक्सेना की उत्सुकता और बढ़ गई थी।
‘‘थोड़ी ख़राब बात है साहब जी।’’ मूल्या ने झिझकते हुए और मेरी तरफ़ देखते हुए उत्तर दिया था।
‘‘अच्छा....? फिर तो सुनना और ज़रूरी है। चलो सुनाओ पूरी कहानी। आओ पीजी यहाँ पत्थर पर बैठ कर सुनते हैं इनकी कहानी।’’ कहते हुए वो ख़ुद एक पत्थर पर बैठ गए थे और पास के दूसरे पत्थर पर मुझे बैठने का इशारा कर दिया था। मैं ख़ुद भी इन होदों को पहली बार देख रहा था। आश्चर्यचकित था कि आज तक तो इन होदों के बारे में कभी सुना नहीं। होदें देखने में बहुत पुरानी लग रही थीं, युगों पुरानी। मैं आश्चर्यचकित-सा कुछ दूर के एक छोटे पत्थर पर बैठ गया था।
बरसात की उस खुली और धुली शाम में मैंने और राकेश सक्सेना ने मोन्या उर्फ़ मोहन से जो कहानी सुनी थी, उसका लब्बा-लुआब अब आप संक्षिप्त में मेरी ही ज़बानी सुनें। मोन्या की भाषा में कहानी यहाँ सुनाई नहीं जा सकती क्योंकि वह बहुत असंसदीय हो जाएगा। मोन्या ने अपने ठेठ आदिवासी लहजे में कहानी राकेश सक्सेना को सुनाई थी, उसीमें सारी क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ कही गईं थीं। ठेठ देशी अंदाज़ में। ख़ैर मोन्या ने जो कहानी सुनाई, उसका साहित्यिक भाषा में रूपांतरण यहाँ प्रस्तुत है (आप अनुमान लगा सकते हैं कि जहाँ मैंने किसी कठिन साहित्यिक शब्द का उपयोग किया है, वहाँ असल में मोन्या ने किस शब्द का उपयोग किया होगा।)-     

सैंकड़ों साल पहले वहाँ पहाड़ के पीछे आदिवासियों के टप्परों से कुछ दूर पर एक साधु का आश्रम था। साधु गृहस्थ साधु थे। कुछ शिष्यों की कुटियाएँ आसपास थीं और बीच में साधु की कुटिया थी। साधु और उनकी पत्नी दोनों रहते थे वहाँ। कोई आस-औलाद नहीं थी दोनों को। साधु की नामर्दी के कारण औलाद नहीं हुई थी। कहा ये भी जाता था कि नामर्दी के कारण ही साधु जवानी में घर से भागकर साधु हो गए थे। बाद में जब आश्रम बनाया तो चूल्हे-चौके के लिए पत्नी की ज़रूरत पड़ी और गृहस्थी के कामों के लिए एक ग़रीब महिला को पत्नी बना लिया उन्होंने। पत्नी वही काम करती थी, जिसके लिए उसको लाया गया था। कहानी में मोड़ तब आया, जब एक दिन साधु दिशा-मैदान से लौट रहे थे। भोर के तारे का झुटपुटा अभी था ही। साधु जब लौटे तो उन्होंने अपनी पत्नी को किसी आदिवासी शिष्य के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया। साधु के तन-बदन में आग लग गई मगर फिर तुरंत अपनी कमी, अपनी कमज़ोरी का ध्यान आया। साधु उल्टे पैरों लौटे और यहाँ इस चट्टान पर आकर तप करने बैठ गए। नामर्दी दूर करने के लिए तप। बैठे रहे, बैठे रहे, बरसों तप पर बैठे रहे। बरसों के तप के बाद एक श्रावण की पूर्णिमा को अचानक यहाँ ये पत्थर की दो हौदें प्रकट हुईं और साथ ही आसपास चारों तरफ़ अगन फूल के पौधे अपने आप ही उग आए। उसके बाद आकाशवाणी हुई ‘‘श्रावण पूर्णिमा की रात को जब आसमान पर पूरा चाँद खिला हो, तब नामर्द पुरुष अपने हाथों से पास से बहती कमानी नदी से पानी ला-लाकर इन हौदों को भरे। फिर चाँद के महीनों के दिनों बराबर संख्या अर्थात तीस अगन फूल के पौधों को जड़ सहित उखाड़ कर लाए और उनको धोकर अच्छी तरह से पीस ले। लेप बना ले उनका। इसके बाद लेप को चार हिस्से कर ले बराबर-बराबर। दो हिस्सों को एक-एक करके दोनों हौदों में घोल दे। बचे हुए दो हिस्सों में से एक हिस्सा पूरी तरह से नग्न होकर अपने पूरे शरीर पर लगा ले। चौथे और अंतिम हिस्से को किसी अक्षत यौवना वन कन्या के शरीर पर अपने हाथों से लगाए। यह सारा काम उसे स्वयं ही करना है, किसी की मदद इसमें नहीं लेना है। उसके बाद दोनों मिलकर पत्थर का चूल्हा बना कर आग जलाएँ और उस आग पर तीतर का माँस पकाएँ। वन कन्या पकाए और पुरुष चूल्हे की आग का सेंक ले। पकने के बाद दोनों आधा-आधा बाँटकर वहीं आग के पास बैठकर खाएँ। खाने के बाद दोनों अलग-अलग हौदों में बैठ जाएँ। चंद्रमा की किरणों, तीतर का माँस और अगन फूल के रस से पुरुष के शरीर में धीरे-धीरे पुरुषत्व पैदा होना शुरू होगा। जब उसके शरीर में पूर्ण पुरुषत्व आ जाए, तो वह उठकर जाए और दूसरी हौद में बैठी वन कन्या के साथ रमण करे। उसकी नपुंसकता हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। उसकी उम्र भले ही कुछ भी हो, वह रमण के लिए नौजवान हो जाएगा।’’ साधु ने उसी रात आकाशवाणी में बताए अनुसार सब कुछ किया और उसी रात पूर्ण पुरुष बन कर अपने आश्रम लौट गया। तब से ये दोनों पत्थर की हौदें यहीं हैं। और ये अगन फूल के पौधे भी आसपास तभी से लगे हुए हैं।
कहानी सुनकर राकेश सक्सेना कुछ देर तक ख़ामोश रहे थे फिर बोले थे ‘‘क्या मूर्खतापूर्ण कहानी है...? ऐसा भी होता है कहीं...?’’
मोन्या चुप हो गया था सुनकर। मैं हैरत से पत्थर की उन हौदों को देख रहा था कि कहाँ छिपी थीं ये अब तक?
‘‘ये अगन फूल को पौधा कौन सा है, बताओ ज़रा।’’ कुछ देर की ख़ामोशी के बाद कहा था राकेश सक्सेना ने।
उनके कहते ही मोन्या उठकर चला गया था। कुछ देर बाद लौटा, तो उसके हाथ में एक टहनी थी, जिसमें कुछ फूल खिले हुए थे। आग की लपटों के समान फूल। लाल, पीले, नारंगी फूल। उनकी आकृति भी आग की लपट जैसी ही थी। पंखुड़ियाँ लपटों के समान मुड़ी हुई थीं जगह-जगह से। अंदर के पराग तंतु इस फूल में उल्टे थे, सारे फूलों में बाहर पंखुड़ियाँ और अंदर पराग तंतु होते हैं, इसमें बाहर तंतु और अंदर पंखुरियाँ थीं। दूर से देखने में ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने लकड़ियाँ इकट्ठी करके उनमें आग लगा दी है। अगन फूल, शायद इसी कारण इसका नाम अगन फूल था।
‘‘ये.....? ये तो ग्लोरियोसा लिली है। ग्लोरियोसा सुपर्बा। ये अफ्रीका के जंगलों का पौधा है, हमारे देश में भी कहीं-कहीं मिलता है... लेकिन ये यहाँ ? स्ट्रेंज़... आजकल नर्सरी वाले इसे बेचते हैं हमारे यहाँ, लेकिन यहाँ जंगल में लाकर किसने लगाया इसको।’’ राकेश सक्सेना टहनी हाथ में लेकर अचरज में डूब गए थे।
‘‘यहाँ तो बरसात शुरू होते ही इतने इलाक़े में अपने आप इसके पौधे उगने लगते हैं। सावन लगते तक तो इसमें फूल भी आ जाते हैं। बरसात ख़त्म होते ही पौधा भी ख़ुद ही ख़त्म हो जाता है। अगली बरसात में फिर उसी जगह से फूट आता है।’’ मोन्या ने राकेश सक्सेना को हैरत में डूबा देखकर कहा था।
‘‘ये लिली है, बल्ब से निकलती है। बरसात ख़त्म होते ही पौधा सूख जाता है और बल्ब ज़मीन में ही रह जाता है। अगली बरसात में फिर फूट निकलता है। इसकी मेडिसनल वेल्यू तो है, बहुत सी दवाएँ बनती हैं इसकी जड़ से। और हाँ यह पेड़ और इसके फूल तो ज़हरीले होते हैं, बहुत ज़हरीले। कुछ इलाक़ों में इस झगरा फूल भी कहते हैं, कहा जाता है कि इसके फूलों को जिसक घर रख दो उसके घर झगड़ा शुरू हो जाता है, इसीलिए इसे झगरा फूल कहते हैं। लेकिन ये कहानी....। यह तो बहुत अजीब कहानी है। यहाँ कितने इलाक़े में खिलता है ये?’’ राकेश सक्सेना ने उत्तर भी दिया और प्रश्न भी किया था।

     ‘‘बस पहाड़ी के इस तरफ़, इन होदों के चारों तरफ़ आधा-आधा कोस में ही मिलता है ये, उसके बाद इसका नाम-निशान भी नहीं है।’’ मोन्या ने उत्तर दिया था।
‘‘तुमने जो कहानी सुनाई उसमें जो करने को कहा गया है, वह तो कोई भी कर लेगा और ऐसे में दुनिया में कोई नामर्द ही नहीं रहेगा।’’ राकेश सक्सेना ने कुछ झुँझलाहट भरे स्वर में कहा था।
‘‘नहीं कर सकता साहब जी। एक तो ये अगन फूल बस महीने दो महीने ही खिलता है बरसात में। और दूसरा ये कि ऐसा होना भी बहुत मुश्किल होता है कि सावन की पूनम को आसमान पर चाँद पूरा खिला हो। बरसात में ऐसा होना नसीब की बात होती है।’’ मोन्या ने अदब के साथ उत्तर दिया था।
राकेश सक्सेना हाथ में अगन फूल उर्फ़ ग्लोरियोसा सुपर्बा लिली की टहनी लिए अचरज में डूबे थे और मैं उर्फ़ पीताम्बर गुदेनिया उसे अचरज के अचरज में डूबा था।
‘‘बड़े-बुज़ुर्ग बताते हैं कि पहले नवाब और फिर अंग्रेज़ों में से बमुश्किल एक-दो की ही क़िस्मत से चाँद की पूरी पूनम मिल पाई थी यहाँ। ये रेस्ट हाउस यहाँ बनाया ही इन होदों के कारण गया था। पहले नवाब के समय यहाँ एक झोंपड़ी-सी थी, किसी अंग्रेज़ को इन होदों के बारे में पता चला, तो उसने यहाँ ये रेस्ट हाउस बनवा दिया था। नवाबों के समय नवाब और अंग्रेज़ों के समय अंग्रेज़ यहाँ हर साल सावन की पूनम पर अकेले आते थे। एक आदिवासी लड़की भी उस रात रेस्ट हाउस में बुलाई जाती थी। बुज़ुर्ग बताते हैं कि चार-पाँच साल मे एकाध बार किसीको क़िस्मत से चाँद की रात मिल पाती थी। नहीं तो कभी-कभी तो यह भी होता था कि मूसलाधार बरसात होती रहती थी और चढ़ी हुई नदी में पत्थर की होदें भी डूबी रहती थीं।’’ मोन्या की आवाज़ गहरे रहस्य से भरी थी।
‘‘तीतर के माँस के बारे में तो कहा जाता है कि उसमें पुरुषत्व बढ़ाने की तासीर होती है और ग्लोरियोसा लिली की जड़ें भी दवाई के काम आती हैं, इन फ़ैक्ट इट इज़ ए मेडिसनल प्लांट.... मगर ये सब.....!’’ राकेश सक्सेना की आवाज़ में अभी भी अचरज घुला हुआ था।
शाम अब गहरा गई थी। राकेश सक्सेना उठकर एक बार उन पत्थर की होदों के पास गए थे। उन पर हाथ फेरते रहे। देर तक हाथ फेरते रहे थे। उनके जैसे व्यक्ति के पास बहुत से अनुत्तरित सवाल थे उस दिन।
फिर हम वापस रेस्ट हाउस आ गए थे। मोन्या की बेरा-मानस ने बहुत अच्छा खाना बनाया था। हमने खाया और छककर खाया था। रेस्ट हाउस से चलते समय राकेश सक्सेना ने मोन्या और उसकी पत्नी दोनों को ईनाम में पैसे दिए थे। फिर हम लौट आए थे उस रहस्य को साथ लेकर।
उसके बाद समय की तेज़ हवा ने बीच के आठ-नौ बरसों को अपने साथ तिनके की तरह उड़ा दिया। सब कुछ विस्मृत हो गया पीताम्बर गुदेनिया को। मैं एक साल पहले रिटायर हो चुका हूँ।
मैं पीताम्बर गुदेनिया अब उस फ़्लैश बैक से वापस आ चुका हूँ। कार अब रात के अँधेरे को चीरते हुए सड़क पर दौड़ी जा रही है। कुछ ही देर में डोडी रेस्ट हाउस का जोड़ आने वाला है। पीताम्बर गुदेनिया ने आसमान में खिले पूरे चाँद को देखा, तो उसे याद आया कि ढलती उम्र और डायबिटीज़ के कारण वह भी तो धीरे-धीरे......। एक-दो बार कोशिश भी की थी, तो असफलता हाथ लगी थी। शर्मिंदगी और लिहाफ़ को चेहरे पर ओढ़कर चुपचाप करवट करके सोना पड़ा था। आज ये श्रावण पूर्णिमा का चाँद उसकी क़िस्मत से ही तो नहीं खिला है?
‘‘सुनो दिनेश.... थोड़ा आगे चलेंगे तो लेफ़्ट पर एक बोर्ड आएगा डोडी रेस्ट हाउस का, उस तरफ़ मोड़ लेना। रेस्ट हाउस होते हुए चलते हैं।’’ मैंने अपने ड्रायवर दिनेश से कहा। उसने सिर हिला कर स्वीकृति प्रदान कर दी। ट्रेवल्स में दिनेश मेरा फेवरेट ड्रायवर है, कहीं भी जाना होता है तो ट्रेवल्स के मालिक को पता होता है कि गुदेनिया साहब केवल दिनेश को ही लेकर जाएँगे।
कुछ ही देर में कार मुख्य मार्ग को छोड़कर डोडी रेस्ट हाउस की कच्ची-पक्की सड़क पर दौड़ रही थी। मेरे अंदर जाने क्या-क्या ठाठें मार रहा था। क्या सचमुच यह हो सकता है ? साठ-बासठ की उमर में भी क्या यह होना संभव है? यदि हो जाए तो..!
अचानक रुक गई कार के कारण उत्सुकता की एक लहर किनारे से टकरा कर बिखर गई।
‘‘क्या हुआ ?’’ मैंने पूछा।
‘‘टायर पंचर हो गया है साहब। बस ज़रा देर में बदल देता हूँ। आप बैठे रहिए कार में, उतरिए मत।’’ कहता हुआ दिनेश कार का हेंड ब्रेक खींच कर नीचे उतर गया।
दिनेश के उतरने के बाद मैं आसमान में खिले चाँद को कार के काँच से देखने लगा। सड़क के किनारे अगन फूल के पौधे दिखाई दे रहे थे। हवा में धीरे-धीरे हिलते हुए।
काफी देर बाद भी जब टायर खुलने की आवाज़ नहीं आई तो मैं नीचे उतर गया। दिनेश असमंजस में खड़ा था डिक्की खोलकर।
‘‘क्या हो गया अब ?’’ मैंने पूछा।
‘‘साहब डिक्की में जैक नहीं है, शायद ट्रेवल्स की किसी दूसरी गाड़ी के ड्रायवर ने निकाल लिया और वापस नहीं रखा।’’ दिनेश ने कुछ झिझकते हुए कहा।
‘‘अब...?’’ मैं असहज हो गया।
‘‘करता हूँ कुछ व्यवस्था, माँगता हूँ किसी से।’’ दिनेश ने उत्तर दिया।
‘‘यहाँ...? यहाँ किससे माँगोगे ?’’ मैंने कुछ झुँझलाते हुए पूछा। उत्तर दिया दूसरी तरफ़ मतलब रेस्ट हाउस की तरफ़ से आ रही किसी कार की हैड लाइट ने।
कार पास आई तो दिनेश ने लगभग सड़क पर खड़े होकर उसे रुकने का इशारा किया। कार रुक गई। उस कार में बस एक आदमी ही था, जो गाड़ी चला रहा था। दिनेश ने अपनी परेशानी बताई तो उसने कार साइड में लगाकर रोक दी। डिक्की से जैक निकाल कर वह दिनेश की मदद करने लगा। वह भी ड्रायवर ही है शायद। गाड़ी भी किसी ट्रेवल्स की ही गाड़ी थी। गाड़ी की नंबर प्लेट से तीन जानकारियाँ मिल रही थीं, पहली ये कि गाड़ी प्राइवेट है सरकारी नहीं, दूसरी ये कि गाड़ी टैक्सी कोटे की है और तीसरी ये कि गाड़ी भोपाल की है। अब मेरे मन में कुलबुलाहट होने लगी थी, कौन है ये और कहाँ से आ रहा है ?
‘‘इतनी रात को कहाँ से आ रहे हो भाई ?’’ मैंने उसकी टोह लेते हुए पूछा। उत्तर मिलने की संभावना कम ही थी। ट्रेवल्स के ड्रायवर इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर नहीं देते हैं। उनको सिखाया जाता है कि अपनी पार्टी के बारे में कोई भी जानकारी किसी को न दें। कहाँ से आ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, यह भी किसी को नहीं बताया जाए।
‘‘रेस्ट हाउस तक गया था साहब।’’ उसने उत्तर दिया।
‘‘तो इतनी रात को वापस क्यों जा रहे हो, वहीं रुक जाते ?’’ मैंने और टोह ली। सीधे बात पर आ गया, तो फिर यह कुछ भी जवाब नहीं देगा।
‘‘किसी काम से जा रहा हूँ।’’ उसने उत्तर दिया। पक्का झूठ बोल रहा है, किसी काम से नहीं जा रहा है, साहब को रेस्ट हाउस पर छोड़कर वापस जा रहा है, सुबह लेने आएगा। रात को वहाँ नवाब भी अकेले ही रुकते थे और अंग्रेज़ भी। जो करना है वह अकेले को ही तो करना है।
‘‘भोपाल जा रहे हो वापस ?’’ मैंने पूछा।
‘‘जी साहब।’’ उसने बहुत ही संक्षिप्त-सा उत्तर दिया और टायर बदलने में व्यस्त हो गया। मानों बातचीत को विराम देना चाहता हो। मेरी उत्सुकता अब नाम जानने में बढ़ गई थी। उत्सुकता या शायद अकुलाहट। मुझे लगा कि अब एक तुक्का लगाना ही पड़ेगा, नहीं लगाया तो दिक़्क़त हो जाएगी, या तो मुझे या किसी और को। अगला प्रश्न पूछने के लिए बहुत ज़्यादा आत्मविश्वास की आवश्यकता थी। इस प्रकार पूछना था कि वह पूछना नहीं लगे, बल्कि यूँ लगे कि मुझे तो पता ही है ये।
‘‘राकेश सक्सेना जी को लाए हो भोपाल से?’’ मैंने बहुत आत्मविश्वास अपने आवाज़ में भरते हुए अँधेरे में तीर छोड़ा। तीर निशाने पर लगा। उसने आश्चर्य से पलट कर मुझे देखा और फिर रहस्यमय तरीक़े से मुस्कुराते हुए सिर को स्वीकारोक्ति में हिलाया और मुड़कर टायर में लग गया। काटो तो ख़ून नहीं, शायद यही मुहावरा अब मेरे लिए प्रयोग किया जा सकता है या शायद हाथों के तोते उड़ना।
कुछ देर बाद वो उठा और जैक अपनी डिक्की में रखकर, कार स्टार्ट करके चला गया।
‘‘चलिए सर बैठिए।’’ दिनेश ने मुझे असमंजस में खड़ा देखा तो बोला। मैं अकबकाया-सा डोडी रेस्ट हाउस की दिशा में देखे जा रहा था।
‘‘हाँ.... पहले गाड़ी मोड़ लो।’’ मैंने कहा।
‘‘मोड़ लूँ ? पर आप तो रेस्ट हाउस जा रहे थे न ?’’ दिनेश ने उलझन भरे स्वर में पूछा।
‘‘नहीं... अब नहीं चलना वहाँ। आज का यह चाँद किसी और के नसीब में लिखा है।’’ दूसरा वाक्य मैंने बुदबुदाते हुए अपने आप से ही कहा। दिनेश कुछ नहीं समझा और कार में बैठ गया। मैंने सड़क के किनारे लगे एक अगन फूल के पौधे से कुछ फूल तोड़ लिए।
जहाँ मैं खड़ा हूँ, वहाँ से खिली हुई चाँदनी में दूर डोडी का रेस्ट हाउस एक धब्बे की तरह दिखाई दे रहा है। और मुझे दिखाई दे रहा है एक अधेड़ बूढ़ा, जो हाँफते हुए, थके क़दमों से, पहाड़ी नदी से बाल्टियों में भर-भर कर पानी ला रहा है, लाता जा रहा है होदों को भरने के लिए। होदों के पास रखे हैं कुछ ताज़ा कटे हुए तीतर और अगन फूल के पौधे। जिस पत्थर पर राकेश सक्सेना बैठे थे उस दिन, उस पत्थर पर एक आदिवासी कन्या बैठी है, बैठी है निर्वसन होकर। चाँदनी के कारण उसका काला शरीर साँप की तरह चमक रहा है। और चमक रही हैं उसकी आँखें, उदास-उदास आँखें। वह चुपचाप बैठी बूढ़े को पानी लाते और वापस नदी की ओर जाते देख रही है।
मेरी कार मुड़ गई है और अब पीताम्बर गुदेनिया कार में बैठा वापस जा रहा है हाइवे की तरफ़। पीताम्बर गुदेनिया के दिमाग़ में गूँज रहा है मोन्या का वाक्य ‘‘चार-पाँच साल में एकाध बार किसी की क़िस्मत से चाँद की रात मिल पाती थी।’’
कार हाइवे पर आ गई है और पीताम्बर गुदेनिया सोच रहा है कि नवाबों से अंग्रेज़ और अंग्रेज़ों से अफ़सर, ये चाँद रातें केवल इन्हीं लोगों के हिस्से में क्यों लिखी हुई हैं। क्या कभी कोई आम आदमी उन पत्थर की होदों में चाँद रात गुज़ार पाएगा? कार हाइवे पर पूरी रफ़्तार से दौड़ रही है। पीताम्बर गुदेनिया को अब नींद आ रही है, वह गोद में रखे अगन फूलों को सहलाते हुए धीरे-धीरे , धीरे-धीरे नींद के आग़ोश में बढ़ रहा है।

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